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भाजपा के कई नेताओं की साख को लगा बट्टा, धनंजय की बढ़ी राजनीतिक ताकत
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जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में सफलता हासिल कर पूर्व सांसद धनंजय सिंह ने एक बार फिर अपनी राजनीतिक ताकत को साबित किया है। वर्ष 2012 से 2019 के बीच तीन बार विधानसभा और दो बार लोकसभा के चुनाव में असफल होने के चलते धनंजय सिंह के राजनीतिक भविष्य के लिए जिला पंचायत अध्यक्ष का यह चुनाव काफी अहम था। शासन सत्ता की ओर से कसे गए तमाम शिकंजों के बीच उन्होंने अपनी पत्नी श्रीकला धनंजय सिंह को निर्दल प्रत्याशी के रूप में जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचाकर एक बार फिर अपनी खोई हुई राजनीतिक ताकत को साबित किया है।
जिला पंचायत अध्यक्ष के इस चुनाव में भाजपा के कई नेताओं की प्रतिष्ठा जुड़ी थी। भाजपा ने जौनपुर जिला पंचायत अध्यक्ष की सीट को सहयोगी दल अपना दल एस के कोटे में दी थी, लेकिन भाजपा की नीलम सिंह बागी उम्मीदवार के रूप में मैदान में थी। नीलम सिंह को महज 28 मतों से ही संतोष करना पड़ा। वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में पहली बार रारी से निर्दल विधायक चुने गए धनंजय सिंह वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में दोबारा रारी से चुनकर विधानसभा पहुंचे थे। वर्ष 2009 में जौनपुर सदर सीट से बसपा के टिकट पर सांसद चुने गए थे और उसी साल उप चुनाव में रारी से अपने पिता राजदेव सिंह को विधायक बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। सांसद रहते हुए 2010 में हुए ब्लाक प्रमुख के चुनाव में कई ब्लाकों में उन्होंने अपने करीबियों को ब्लाक प्रमुख बनवाकर एक अलग राजनीतिक ताकत साबित किया था। बाद में 2012 और 2017 का विधानसभा चुनाव और 2020 में विधानसभा उप चुनाव , 2014 और 2019 के लोकसभा के चुनाव में उन्हें लगातार असफलता मिली थी।
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जिला पंचायत अध्यक्ष के इस चुनाव में भाजपा के कई नेताओं की प्रतिष्ठा जुड़ी थी। भाजपा ने जौनपुर जिला पंचायत अध्यक्ष की सीट को सहयोगी दल अपना दल एस के कोटे में दी थी, लेकिन भाजपा की नीलम सिंह बागी उम्मीदवार के रूप में मैदान में थी। नीलम सिंह को महज 28 मतों से ही संतोष करना पड़ा। वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में पहली बार रारी से निर्दल विधायक चुने गए धनंजय सिंह वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में दोबारा रारी से चुनकर विधानसभा पहुंचे थे। वर्ष 2009 में जौनपुर सदर सीट से बसपा के टिकट पर सांसद चुने गए थे और उसी साल उप चुनाव में रारी से अपने पिता राजदेव सिंह को विधायक बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। सांसद रहते हुए 2010 में हुए ब्लाक प्रमुख के चुनाव में कई ब्लाकों में उन्होंने अपने करीबियों को ब्लाक प्रमुख बनवाकर एक अलग राजनीतिक ताकत साबित किया था। बाद में 2012 और 2017 का विधानसभा चुनाव और 2020 में विधानसभा उप चुनाव , 2014 और 2019 के लोकसभा के चुनाव में उन्हें लगातार असफलता मिली थी।
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