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खेल दिवस पर खासः खुद के अधूरे सपने को बच्चों में कर रहे पूरा, जेवलिंग में तीनों बेटे रोशन कर रहे जौनपुर का नाम

Sun, 29 Aug 2021 10:26 AM IST
उत्पल कांत अमर उजाला नेटवर्क, जौनपुर
अमर उजाला नेटवर्क, जौनपुर Published by: उत्पल कांत Updated Sun, 29 Aug 2021 10:26 AM IST
सार

जौनपुर जिले के मछलीशहर तहसील क्षेत्र के अदारी ग्राम पंचायत के डभिया गांव निवासी सभाजीत यादव की पहचान इलाके में मैराथन धावक के रूप में है।उन्होंने  अपने बेटों को खेलों से जोड़ा और उन्हें ट्रेनिंग देकर नेशनल-इंटरनेशनल खेलने के लायक बना दिया। 

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National sports day 2021  marathon runner sabhajit yadav childrens are fulfilling their unfulfilled dreams all three sons are illuminating name of Jaunpur
मैराथन धावक सभाजीत के बेटों ने जेवलिंग में कमाया नाम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मैराथन धावक सभाजीत पारिवारिक जिम्मेदारियों और अभावों के कारण देश के लिए मेडल जीतने का सपना पूरा नहीं कर सके। ऐसे में निराश तो हुए लेकिन फिर भी हिम्मत नहीं हारी। अपने बेटों को खेलों से जोड़ा और उन्हें ट्रेनिंग देकर नेशनल-इंटरनेशनल खेलने के लायक बना दिया।

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जौनपुर जिले के मछलीशहर तहसील क्षेत्र के अदारी ग्राम पंचायत के डभिया गांव निवासी सभाजीत यादव की पहचान इलाके में मैराथन धावक के रूप में है। वह बताते हैं कि 1985 से मैराथन की तैयारी कर रहे थे। इसके लिए जिला स्टेडियम सिद्दीकपुर, पुलिस लाइन के परिसर में भी दौड़ लगा चुके हैं।
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दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु सहित कई शहरों में वह हाफ व फुल मैराथन में 70 पदक जीत चुके हैं। 65 की उम्र में भी खेलों के प्रति उनका जोश कम नहीं हुआ है। खुद 42 किमी. तक साढ़े तीन घंटे में दौड़ लगा लेते हैं। कोरोना काल के पहले तक वह 50 साल के ऊपर के खिलाड़ियों की आयोजित होने वाली मैराथन में हिस्सा लेते थे।
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सभाजीत बताते हैं कि गरीबी के चलते वह पांचवीं से आगे नहीं पढ़ सके थे और फिर पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण सपना भी छोड़ना पड़ा था। वह पूरी तरह से खेती-किसानी में जुट गए। लेकिन देश के लिए मेडल जीतने की तमन्ना मन में बनी रही। इसके लिए उन्होंने अपने बेटों को तराशना शुरू किया।

गांव में सुविधाएं सीमित थीं और शहर तक भेजने के लिए पैसे नहीं थे। शुरू में लाठी के सहारे तीन बेटों रोहन, रोहित और राहुल को एथलेटिक्स की ट्रेनिंग देनी शुरू की। संभावनाओं को देखते हुए  उन्हें जेवलिंग (भाला फेंक) से जोड़ा। पिता की लगन, मेहनत को सार्थक करने में बच्चों ने भी कसर नहीं छोड़ी।

शुरुआत में गांव-परिवार में विरोध भी हुआ, लेकिन वह डिगे नहीं। धीरे-धीरे बच्चे बड़े हुए और उनकी प्रतिभा निखरकर सामने आई तो उन्हें घर पर ही खेल के हर संसाधन उपलब्ध कराया। आज राहुल नेशनल, रोहित इंटरनेशनल और रोहन अंडर-16 के भाला फेंक में अलग पहचान बना चुका है। उम्मीद है कि तीनों बच्चे देश के लिए ओलंपिक में देश के लिए गोल्ड जीतकर लाएंगे।

रेलवे ने दी बेटे को नौकरी

सभाजीत अपने तीन बेटों को भाला फेंक में स्टेट, नेशनल और इंटरनेशनल तक पहुंचा चुके हैं। जिनमें इंटरनेशनल तक पहुंचे रोहित की निगाहें साल 2022 में होने वाले एशियन गेम और राष्ट्रमंडल और 2024 में होने वाले ओलंपिक पर है।

वहीं, रोहित की प्रतिभा को देखते हुए रेलवे ने भी अपना लिया। टीडी कालेज जौनपुर से प्राइवेट बीए कर रहे रोहित पिछले 11 महीने से बीएलडब्लू में सीनियर क्लर्क की नौकरी कर रहे हैं।
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