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राजा के गांव में है तालीम का मुकम्मल इंतजाम
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02- गांव हमारी ताकत सिंगरामऊ गांव में राजा हरपाल सिंह की नई हवेली।
- फोटो : JAUNPUR
सिंगरामऊ। जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर पश्चिमी छोर पर सुल्तानपुर जिले की सीमा से लगे सिंगरामऊ गांव की अलग पहचान है। राजा हरपाल सिंह की हवेली से इस गांव के वैभवशाली अतीत की झलक मिलती है। राजा हरपाल सिंह को तालीम से लगाव था और उन्होंने गांव में शिक्षा की ऐसी व्यवस्था की है कि दूरदराज से विद्यार्थी पढ़ने आते हैं।
वाराणसी-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों किनारों पर बसे सिंगरामऊ गांव की आबादी 2300 और क्षेत्रफल 0.67 वर्ग किलोमीटर है। सिंगरामऊ गांव के उत्तर कबेली, दक्षिण में रेलवे लाइन, पूरब में रजनीपुर और पश्चिम में हरिहरपुर बछुआर गांव है। हरिहरपुर के बाद से ही सुल्तानपुर जिले की सीमा शुरू हो जाती है। यह कभी राज्य हुआ करता था। राजा हरपाल सिंह यहां के लोकप्रिय शासक थे। वाराणसी-सुल्तानपुर रेल मार्ग पर सिंगरामऊ के पास उनके नाम पर रेलवे स्टेशन है। उनकी स्मृति में बने राजा हरपाल सिंह इंटर और डिग्री कालेज का भी शानदार इतिहास है। उनके बाद उनकी विरासत राजा श्रीपाल सिंह ने संभाली थी। वह अपने जमाने के नामचीन पहलवान थे। राजा श्रीपाल सिंह ने देहरादून में रोमानिया के पहलवान की चुनौती स्वीकार कर उसे अखाड़े में चित कर दिया था। रोमानिया के उस पहलवान ने देश के किसी भी पहलवान को लड़ने की चुनौती दी थी। अंग्रेजों के जाने के बाद जब राज्य समाप्त हुए तो श्रीपाल सिंह राजनीति में आ गए। अलग-अलग दलों से तीन बार विधायक चुने गए। उनके पुत्र कुंवर जयसिंह बाबा राजा हरपाल सिंह डिग्री कालेज के प्रबंधक हैं और उनकी भी रुचि खेल में हैं। वह डिस्कस थ्रो में थाईलैंड में कांस्य पदक जीत चुके हैं।
गांव में 21 हैंडपंप लगे हैं। चार कुएं हैं जो सूख चुके हैं। सभामणि मिश्र गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति हैं। उनकी उम्र 80 वर्ष है। गांव की जमीन पूरी तरह से समतल है। यहां की बलुई दोमट मिट्टी काफी उपजाऊ है। वैसे तो गेहूं, धान, मक्का, आलू, उड़द, बाजार, चना, मटर और दलहन तिलहन की खेती भी गांव में होती है। मौर्य समाज के लोग नकदी फसल उगाते हैं। प्रमुख रूप से सब्जी की खेती करते हैं। गांव में क्षत्रिय, ब्राह्मण, मौर्य, सोनी, जायसवाल, बरनवाल, मुस्लिम, कहार आदि जाति के लोग रहते हैं। अधिकतर परिवार के आय का साधन कृषि है। गांव में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, दो प्राथमिक विद्यालय, एक जूनियर विद्यालय, इंटर कालेज, एक डिग्री कालेज और एक आईटीआई कालेज भी है।
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राजा की हवेली में छात्रावास
सिंगरामऊ। राजा सिंगरामऊ के पास दो हवेलियां है। एक हवेली का निर्माण राजा हरपाल सिंह के समय में हुआ था जबकि दूसरी का निर्माण राजा श्रीपाल सिंह ने कराया था। नई हवेली में राज के परिवार के लोग रहते हैं जबकि पुरानी हवेली में छात्रावास बना दिया गया है। जिसमे राजा हरपाल सिंह डिग्री कालेज में दूर-दूर से पढ़ने आने आने वाले बीएड के छात्र रहते हैं।
आस्था का केंद्र है बाबा गूदरनाथ धाम
सिंगरामऊ। सिंगरामऊ गांव में स्थित बाबा गूदरनाथ का प्राचीन मंदिर है। जो लोगों की गहरी आस्था और विश्वास का केंद्र है। सावन में पूरे एक महीने तक यहां मेला लगता है। शनिवार व सोमवार को तो भक्तों का तांता लगा रहता है। गांव के बुजुर्ग राम लाल जायसवाल बताते हैं कि सिंगरामऊ कभी स्टेट हुआ करता था। यहां के राजा रहे स्वर्गीय कुंवर श्रीपाल सिंह तीन बार विधायक रहे। वर्ष 1957 में खुटहन से निर्दल विधायक बने थे। 1962 में जनसंघ से चांदा सीट से तो 1967 में रारी से विधायक चुने गए थे।
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वाराणसी-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों किनारों पर बसे सिंगरामऊ गांव की आबादी 2300 और क्षेत्रफल 0.67 वर्ग किलोमीटर है। सिंगरामऊ गांव के उत्तर कबेली, दक्षिण में रेलवे लाइन, पूरब में रजनीपुर और पश्चिम में हरिहरपुर बछुआर गांव है। हरिहरपुर के बाद से ही सुल्तानपुर जिले की सीमा शुरू हो जाती है। यह कभी राज्य हुआ करता था। राजा हरपाल सिंह यहां के लोकप्रिय शासक थे। वाराणसी-सुल्तानपुर रेल मार्ग पर सिंगरामऊ के पास उनके नाम पर रेलवे स्टेशन है। उनकी स्मृति में बने राजा हरपाल सिंह इंटर और डिग्री कालेज का भी शानदार इतिहास है। उनके बाद उनकी विरासत राजा श्रीपाल सिंह ने संभाली थी। वह अपने जमाने के नामचीन पहलवान थे। राजा श्रीपाल सिंह ने देहरादून में रोमानिया के पहलवान की चुनौती स्वीकार कर उसे अखाड़े में चित कर दिया था। रोमानिया के उस पहलवान ने देश के किसी भी पहलवान को लड़ने की चुनौती दी थी। अंग्रेजों के जाने के बाद जब राज्य समाप्त हुए तो श्रीपाल सिंह राजनीति में आ गए। अलग-अलग दलों से तीन बार विधायक चुने गए। उनके पुत्र कुंवर जयसिंह बाबा राजा हरपाल सिंह डिग्री कालेज के प्रबंधक हैं और उनकी भी रुचि खेल में हैं। वह डिस्कस थ्रो में थाईलैंड में कांस्य पदक जीत चुके हैं।
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गांव में 21 हैंडपंप लगे हैं। चार कुएं हैं जो सूख चुके हैं। सभामणि मिश्र गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति हैं। उनकी उम्र 80 वर्ष है। गांव की जमीन पूरी तरह से समतल है। यहां की बलुई दोमट मिट्टी काफी उपजाऊ है। वैसे तो गेहूं, धान, मक्का, आलू, उड़द, बाजार, चना, मटर और दलहन तिलहन की खेती भी गांव में होती है। मौर्य समाज के लोग नकदी फसल उगाते हैं। प्रमुख रूप से सब्जी की खेती करते हैं। गांव में क्षत्रिय, ब्राह्मण, मौर्य, सोनी, जायसवाल, बरनवाल, मुस्लिम, कहार आदि जाति के लोग रहते हैं। अधिकतर परिवार के आय का साधन कृषि है। गांव में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, दो प्राथमिक विद्यालय, एक जूनियर विद्यालय, इंटर कालेज, एक डिग्री कालेज और एक आईटीआई कालेज भी है।
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राजा की हवेली में छात्रावास
सिंगरामऊ। राजा सिंगरामऊ के पास दो हवेलियां है। एक हवेली का निर्माण राजा हरपाल सिंह के समय में हुआ था जबकि दूसरी का निर्माण राजा श्रीपाल सिंह ने कराया था। नई हवेली में राज के परिवार के लोग रहते हैं जबकि पुरानी हवेली में छात्रावास बना दिया गया है। जिसमे राजा हरपाल सिंह डिग्री कालेज में दूर-दूर से पढ़ने आने आने वाले बीएड के छात्र रहते हैं।
आस्था का केंद्र है बाबा गूदरनाथ धाम
सिंगरामऊ। सिंगरामऊ गांव में स्थित बाबा गूदरनाथ का प्राचीन मंदिर है। जो लोगों की गहरी आस्था और विश्वास का केंद्र है। सावन में पूरे एक महीने तक यहां मेला लगता है। शनिवार व सोमवार को तो भक्तों का तांता लगा रहता है। गांव के बुजुर्ग राम लाल जायसवाल बताते हैं कि सिंगरामऊ कभी स्टेट हुआ करता था। यहां के राजा रहे स्वर्गीय कुंवर श्रीपाल सिंह तीन बार विधायक रहे। वर्ष 1957 में खुटहन से निर्दल विधायक बने थे। 1962 में जनसंघ से चांदा सीट से तो 1967 में रारी से विधायक चुने गए थे।