{"_id":"640f32b16a05520626d80a970e55e7b6","slug":"is-contained-in-the-environmental-culture-and-civilization-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"पर्यावरण में समाहित है संस्कृति और सभ्यता ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पर्यावरण में समाहित है संस्कृति और सभ्यता
जौनपुर ब्यूराे
Updated Sun, 01 Nov 2015 01:17 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ डीम्ड विश्वविद्यालय दिल्ली के कुलपति प्रो. रमेश कुमार पांडेय ने कहा कि पर्यावरण में ही देश की संस्कृति और सभ्यता समाहित है। यदि पर्यावरण को निकाल दिया जाए तो संस्कृति साहित्य का
कोई मतलब ही नहीं है।वह शनिवार को मोहम्मद हसन पीजी कालेज सभागार में संस्कृत विभाग की ओर से आयोजित संस्कृत साहित्य में पर्यावरणीय रचना विषयक सेमिनार में बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों को पता था कि आने वाली पीढ़ी पर्यावरण के प्रति उदासीन हो जाएगी। इसी लिए वेद, पुराण, रामायण, महाभारत में पेड़ -पौधो, नदियों, पर्वतो को धर्म से जोड़कर उसकी व्याख्या किया।
विज्ञापन
अध्यक्षता योगी देवनाथ ने की। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि पूर्वाचंल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. पीसी पातंजलि सभाजीत द्विवेदी ने विचार व्यक्त किया। प्राचार्य डा. अब्दुल कादिर खान ने कहा कि महान कवि कालीदास को यदि आज के
समय में अभिज्ञान शांकुतलम जैसी रचना करनी होती तो शायद नहीं कर पाते। क्योंकि उस काल की तरह आज का पर्यावरण नहीं रहा जिससे लोगों में अच्छे विचार आए। प्राचार्य सम्मानित किया। संचालन डा. अजय विक्रम सिंह ने किया।
विज्ञापन
कोई मतलब ही नहीं है।वह शनिवार को मोहम्मद हसन पीजी कालेज सभागार में संस्कृत विभाग की ओर से आयोजित संस्कृत साहित्य में पर्यावरणीय रचना विषयक सेमिनार में बोल रहे थे।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों को पता था कि आने वाली पीढ़ी पर्यावरण के प्रति उदासीन हो जाएगी। इसी लिए वेद, पुराण, रामायण, महाभारत में पेड़ -पौधो, नदियों, पर्वतो को धर्म से जोड़कर उसकी व्याख्या किया।
विज्ञापन
अध्यक्षता योगी देवनाथ ने की। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि पूर्वाचंल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. पीसी पातंजलि सभाजीत द्विवेदी ने विचार व्यक्त किया। प्राचार्य डा. अब्दुल कादिर खान ने कहा कि महान कवि कालीदास को यदि आज के
समय में अभिज्ञान शांकुतलम जैसी रचना करनी होती तो शायद नहीं कर पाते। क्योंकि उस काल की तरह आज का पर्यावरण नहीं रहा जिससे लोगों में अच्छे विचार आए। प्राचार्य सम्मानित किया। संचालन डा. अजय विक्रम सिंह ने किया।