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इस बाग में मसालों में की खेती, फलों की खुशबू और फलों का स्वाद भी
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ेराकत के कुसौली गांव में अपनी खेती दिखाते किसान लालचंद मौर्य।
- फोटो : JAUNPUR
केराकत। पूर्वी उत्तर प्रदेश में कृषि में तरह-तरह के प्रयोग हो रह हैं लेकिन कुसैला गांव के लालचंद मौर्य ने जो प्रयोग किया है वह सबसे जुदा है। उन्होंने दो एकड़ में ऐसा बाग लगाया है, जिसमें फूलों व मसालों की सुगंध आती तो फलों का रस टपकता है। उनके इस विविधता भरे बाग को देखने के लिए दूर-दूर से किसान आते हैं।
केराकत इलाके में धान, गेहूं और मक्का की खेती पारंपरिक रूप से होती रही है। मगर लालचंद मौर्य शुरू से ही पारंपरिक खेती करने के पक्ष में नहीं थे। वह लीक से हटकर कुछ करना चाहते थे। काफी विचार-विमर्श के बाद उन्होंने बागवानी शुरू की। पहले उन्होंने फल लगाए। आम की तरह-तरह की प्रजातियां लगाईं। उसके बाद दूसरे तरह के फल लगाए। बाद में फूल, मसाले और जड़ी-बूटियों की खेती की। उनके बागीचे में स्टीविया (चीनी का विकल्प) है, जिसकी 2-3 पत्तियों को डालने से चाय मीठी हो जाती। इससे मधुमेह का भी खतरा नहीं रहता। बाग में गुड़मार का पौधा है, जिसे खाने के बाद मिठाई फीकी लगने लगती है। तेजपत्ता, लवंग, काली मिर्च, अजवाइन, इलायची, चंदन, पिपली, अश्वगंधा, एलोवेरा, सतावर, शंखपुष्पी के भी पौधे उन्होंने लगाए हैं।
आम-अमरूद की तमाम प्रजातियां
लालचंद मौर्य के बाग में आम और अमरूद की तमाम प्रजातियां है। उनके यहां ऐसे आम भी हैं जो बारहोमास फल देते हैं। आम की मलिका, स्वर्ण रेखा, हिमसागर, केसर, रत्नागिरी, आम्रपाली, अल्फांसो, दशहरी, बनारसी लंगड़ा, चौसा, सफेदा, नीलम, बारहमासी, रामकेड़ा, लालबादशाह, कृष्ण भोग, 365-डे, माल्दह जैसी किस्में हैं और अमरूद की इलाहाबादी सफेदा, लखनऊ-49, बरफखाना, काला अमरुद, इलाहाबादी सुरखा, ताइवान पिंक, थाईलैंड जैसी प्रजातियां भी हैं। थाईलैंड का बेर, पिंक कटहल, थाइलैंड एपल, लीची, नाशपाती, चीकू, सेब, अनानास , मुसम्मी , संतरा, अंगूर, नींबू, चेरी, अनार, बेल, पपीता, जामुन, नारियल, शहतूत, अंजीर, सुपारी के पेड़ भी लगे हैं। इसके अलावा क्रोटन, चाइना पाम, बेबी, चुनरी, रेड एग्लो नसीमा, क्रिसमस (एरोपेरिया), सन आफ इंडिया, पीस लिली, फोनिसपाम, फास्टल पाम, बाटल पाम, रेक्सोना पाम, सैंपियम पाम, रीका पाम, रबर प्लांट, काला बांस, सफेद बांस, पीला बांस जैसे सजावटी पौधे और गुलाब, ग्लैडियोलस, कलेंडुला, ब्रिजल फ्लावर, आर्किड जैसे फूलों के पौधे भी हैं।
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कई प्रांतों का भ्रमण कर जुटाई जानकारी
लालचंद ने बागवानी को समृद्ध करने के लिए देश भर में भ्रमण किया। असम, बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक में जाकर प्रशिक्षण लिया। उनका कहना है कि खेती का शौक शुरू से रहा है। वह अपनी जरूरत भर के लिए धान और गेहूं की खेती भी करते हैं लेकिन पहचान तो फूल, फल और मसालों की खेती से है। वह तीन वर्षों से यह बागवानी कर रहे हैं। उनके काम के लिए मंडलायुक्त वाराणसी ने सम्मानित भी किया था। आजमगढ़, गाजीपुर और वाराणसी से भी किसान उनकी बागवानी देखने आते हैं।
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केराकत इलाके में धान, गेहूं और मक्का की खेती पारंपरिक रूप से होती रही है। मगर लालचंद मौर्य शुरू से ही पारंपरिक खेती करने के पक्ष में नहीं थे। वह लीक से हटकर कुछ करना चाहते थे। काफी विचार-विमर्श के बाद उन्होंने बागवानी शुरू की। पहले उन्होंने फल लगाए। आम की तरह-तरह की प्रजातियां लगाईं। उसके बाद दूसरे तरह के फल लगाए। बाद में फूल, मसाले और जड़ी-बूटियों की खेती की। उनके बागीचे में स्टीविया (चीनी का विकल्प) है, जिसकी 2-3 पत्तियों को डालने से चाय मीठी हो जाती। इससे मधुमेह का भी खतरा नहीं रहता। बाग में गुड़मार का पौधा है, जिसे खाने के बाद मिठाई फीकी लगने लगती है। तेजपत्ता, लवंग, काली मिर्च, अजवाइन, इलायची, चंदन, पिपली, अश्वगंधा, एलोवेरा, सतावर, शंखपुष्पी के भी पौधे उन्होंने लगाए हैं।
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आम-अमरूद की तमाम प्रजातियां
लालचंद मौर्य के बाग में आम और अमरूद की तमाम प्रजातियां है। उनके यहां ऐसे आम भी हैं जो बारहोमास फल देते हैं। आम की मलिका, स्वर्ण रेखा, हिमसागर, केसर, रत्नागिरी, आम्रपाली, अल्फांसो, दशहरी, बनारसी लंगड़ा, चौसा, सफेदा, नीलम, बारहमासी, रामकेड़ा, लालबादशाह, कृष्ण भोग, 365-डे, माल्दह जैसी किस्में हैं और अमरूद की इलाहाबादी सफेदा, लखनऊ-49, बरफखाना, काला अमरुद, इलाहाबादी सुरखा, ताइवान पिंक, थाईलैंड जैसी प्रजातियां भी हैं। थाईलैंड का बेर, पिंक कटहल, थाइलैंड एपल, लीची, नाशपाती, चीकू, सेब, अनानास , मुसम्मी , संतरा, अंगूर, नींबू, चेरी, अनार, बेल, पपीता, जामुन, नारियल, शहतूत, अंजीर, सुपारी के पेड़ भी लगे हैं। इसके अलावा क्रोटन, चाइना पाम, बेबी, चुनरी, रेड एग्लो नसीमा, क्रिसमस (एरोपेरिया), सन आफ इंडिया, पीस लिली, फोनिसपाम, फास्टल पाम, बाटल पाम, रेक्सोना पाम, सैंपियम पाम, रीका पाम, रबर प्लांट, काला बांस, सफेद बांस, पीला बांस जैसे सजावटी पौधे और गुलाब, ग्लैडियोलस, कलेंडुला, ब्रिजल फ्लावर, आर्किड जैसे फूलों के पौधे भी हैं।
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कई प्रांतों का भ्रमण कर जुटाई जानकारी
लालचंद ने बागवानी को समृद्ध करने के लिए देश भर में भ्रमण किया। असम, बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक में जाकर प्रशिक्षण लिया। उनका कहना है कि खेती का शौक शुरू से रहा है। वह अपनी जरूरत भर के लिए धान और गेहूं की खेती भी करते हैं लेकिन पहचान तो फूल, फल और मसालों की खेती से है। वह तीन वर्षों से यह बागवानी कर रहे हैं। उनके काम के लिए मंडलायुक्त वाराणसी ने सम्मानित भी किया था। आजमगढ़, गाजीपुर और वाराणसी से भी किसान उनकी बागवानी देखने आते हैं।