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मालगुजारी बंद कर फूंका था स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल 

Tue, 09 Aug 2016 01:32 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, जौनपुर
ब्यूरो, अमर उजाला, जौनपुर Updated Tue, 09 Aug 2016 01:32 AM IST
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Bugle was blown off revenue of freedom
खुटहन के मुबारकपुर में स्थित राजा इजारत जहां और उनके हाथी और महावत की मजार।
 वर्ष 1856 में जिले में पहली बार स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत मुबारकपुर खुटहन से हुई थी। मालगुजारी बंद करने पर राजा सैयद इजारत जहां और उनके 40 साथियों को अंग्रेजों ने आम के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी थी।
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वह पेड़ तो अब नहीं रहा, लेकिन राजा, उनके हाथी और महावत की मजार जिले के पहले स्वतंत्रता सेनानी और उनके 40 साथियों की कुर्बानी को आज भी बयां कर रही है। राजा सैयद इजारत जहां के जिम्मे जौनपुर, आजमगढ़, वाराणसी और बलिया की रियासत थी।
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वह वर्ष 1856 में नाजिम इलाका-ए-जौनपुर और आजमगढ़ के मकबूल बनाए गए। इसी दौरान अवध सूबा ब्रिटिश हुकूमत में शामिल कर लिया गया। इस खबर से तालुकदार, राजघराने, जमींदार और नवाब बेचैन हो उठे।
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फिरंगियों को सबक सिखाने के लिए बांदा, फर्रूखाबाद, गोरखपुर, बुंदेलखंड, लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, गोंडा आदि जगहों पर आयोजित जलसों में उनको दी जा रही मालगुजारी बंद करने का निर्णय लिया गया। इसके कुछ दिनों बाद अंग्रेज अधिकारियों ने राजा इजारत जहां से मालगुजारी देने को कहा तो उन्होंने इनकार कर दिया।

इससे गुस्साए अंग्रेजों ने शाही किले पर हमला बोल दिया। उस वक्त चेहल्लुम के मौके पर राजा अपने गांव मुबारकपुर आए थे। किले में मौजूद रियासत के दीवान महताब राय को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया। 27 दिसंबर, 1856 को फिरंगियों की फौज नदी के रास्ते मुबारकपुर गांव पहुंची।

राजा की सेना ने उनका जमकर मुकाबला किया। यह युद्ध कई महीने चला। इसी बीच अंग्रेजों ने धोखे से राजा इजारत जहां को उस वक्त गिरफ्तार कर लिया जब वह अपने बाग में नमाज पढ़ रहे थे। इसके बाद फिरंगियों ने उनके हाथी, महावत और 40 साथियों को भी कब्जे में ले लिया।


10 मई, 1857 को सभी को गांव में स्थित आम के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गई। मुबारकपुर गांव स्थित राजा के किले में कुछ हिस्सों को छोड़ बाकी सब ढह चुका है। किले के बचे अवशेष अतीत की तमाम कहानियां अपने अंदर संजोए है। राजा इजारत जहां के प्रपौत्र राजा अंजुम जहां और उनका परिवार जौनपुर के रिजवी खां मोहल्ले में रहता है।
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