फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Jaunpur News ›   A success story built on the strength of courage ..

हौसलों के बल पर गढ़ी सफलता की कहानी..

Mon, 08 Mar 2021 12:25 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 08 Mar 2021 12:25 AM IST
विज्ञापन
A success story built on the strength of courage ..
हौसलों के बल पर गढ़ी इन महिलाओं ने सफलता की कहानी
विज्ञापन

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस...
-जिले में बन चुकी हैं नारी सशक्तिकरण की मिसाल
अमर उजाला ब्यूरो
जौनपुर। अब नारी न तो अबला है और न ही कमजोर। महिलाओं के प्रति समाज की सोच बदलने लगी है। यह बदलाव उन महिलाओं के दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर आया है, जिन्होंने अपने हौसलों के बल पर मुश्किलों से लड़कर अपने रास्ते खुद बनाए हैं। यही कारण है कि वे महिला सशक्तीकरण की जिले में मिसाल बन चुकी हैं। वह चाहे मीना हों या मुन्नी, विजयलक्ष्मी हों या राधा। इनके सामने भी हालात अनुकूल नहीं थे। सामाजिक रुढ़ियों की बेड़ियों ने उनके भी पांव जकड़ रखे थे, मगर उन्हें खुले आसमान में उड़ना था। तरक्की का सफर तय करना था। सफलता की नई कहानी लिखनी थी। दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा बनना था। लिहाजा उन्होंने बेड़ियों को तोड़ दिया। समाज से लड़ीं और फिर आगे बढ़ीं। आज वह उसी परिवार, समाज और गांव का मान बनी हुई है। लोग उन पर फख्र करते हैं। उनकी नजीरें देते हैं। महिला दिवस पर हौसलों की धनी ऐसी ही कुछ महिलाओं से हम रुबरू करा रहे हैं। आशा है कि अन्य महिलाओं को उनसे प्रेरणा मिलेगी और खुद की पहचान बनाने में वह सफल होंगी।
---
मीना ने पति की शहादत के बाद पहनी वर्दी
केराकत के अकबरपुर निवासी सत्यनारायण सिंह ने जब अपने छोटे बेटे जगदीश सिंह का विवाह किया तो मीना बेहद साधारण और शर्मीली लड़की थीं। लाड-प्यार से पली बढ़ी मीना के पति सीआरपीएफ में लांस नायक के पद पर थे। अगस्त 1999 में कारगिल में तैनाती के दौरान वह शहीद हो गए। मुश्किल घड़ी में जब लोग खुद को संभालने में जुटे थे, तब मीना ने आंसुओं को पोंछ कर पति के नक्शेकदम पर चलकर देश सेवा का प्रण लिया। वर्ष 2003 में वह सीआरपीएफ में भर्ती हुईं। वर्तमान समय इंफाल में सेवा दे रही हैं। मीना सिंह अपने दो पुत्रों व दो पुत्रियों को भी उसी राह पर ले जाना चाहती हैं। नारी सशक्तिकरण पर उनका कहना है कि नारी अपने आप में एक शक्ति है। बस उसे एक हौसला और साहस चाहिए। वह जो ठान लेगी तो उसे कोई भी ताकत मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।
विज्ञापन

कुख्यात कैदियों की पहरेदार हैं मुंगरा की विजयलक्ष्मी
मुंगराबादशाहपुर के गल्ला मंडी के एक सामान्य परिवार की बेटी विजय लक्ष्मी सीतापुर जेल में डिप्टी जेलर हैं। जेल में बंद कई कुख्यात बंदियों की पहरेदारी वह निडरता से कर रही हैं। गरीबी और अभावों के बीच उन्होंने शिक्षा को सशक्तिकरण का हथियार बनाया। प्रतियोगी परीक्षा पास कर डिप्टी जेलर बनीं। विजयलक्ष्मी को याद है कि कई बार एक वक्त को भोजन भी नहीं मिलता था। परिवार में तमाम दिक्कतें थीं, लेकिन मां मीना देवी और पिता माता प्रसाद लगातार उनका हौसला बढ़ाते रहे। विजयलक्ष्मी का कहना है कि जेल में अक्सर अपराधियों से सामना होता है, लेकिन कभी विचलित नहीं होती। वह कहती हैं कि मौके सीमित हों और महत्वाकांक्षाएं बड़ी तो संघर्ष बड़ा हो जाता है। महिलाओं के सामने अवसर बहुत हैं। बस उन्हें हौसलों को बढ़ाने की जरूरत है। महिला दिवस तभी सार्थक है कि जब हम यह प्रण करलें कि बेटियों को भी बेटों के बराबर ही मान सम्मान और दर्जा देंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन

पहले खुद ली तालीम, अब दूसरों को मुन्नी बना रही हैं साक्षर
महराजगंज ब्लाक के हटियारामनाम गांव निवासी मुन्नी बेगम के संघर्षों की कहानी भी प्रेरणास्पद है। नारी चेतना फाउंडेशन की डायरेक्टर मुन्नी अनपढ़ थीं। 15 वर्ष में ही उनकी शादी हो गई। ससुराल में आने के बाद उन्हें पढ़ाई का महत्व समझ में आया। घर की चौखट के अंदर ही रहते हुए छिपकर पढ़ना शुरू किया। उन्होंने घर के दरवाजे और द्वार पर जमीन और लकड़ी की पटरी पर कोयले से ककहरा सीखा। पढ़ाई में रुचि देख पति अब्दुल वहीद ने भी प्रोत्साहित किया। धीरे-धीरे समाजशास्त्र से एमए तक की पढ़ाई की। इसके बाद वह अपने जैसी दूसरी महिलाओं को साक्षर और सशक्त बनाने में जुटी हैं। वर्ष 2011 में नारी चेतना फाउंडेशन का गठन कर वह इस कार्य में लग गईं। प्रतापगढ़ व जौनपुर के सीमावर्ती इलाके में वह बाल श्रम उन्मूलन, दहेज और घरेलू हिंसा आदि के प्रति महिलाओं को जागरूक कर रही हैं। वह महिला जागरूकता समिति महराजगंज की अध्यक्ष भी हैं। इसके लिए उन्हें कई संगठनों से सम्मान भी मिल चुका है।

ससुराल में पढ़कर राधा बनीं शिक्षक, बेटियों को बनाया अफसर
शाहगंज कस्बा निवासी राधा यादव की शादी महज 14 वर्ष की उम्र में सुभाष यादव के साथ हो गई थी। मायके में उन्होंने कक्षा 8 तक की पढ़ाई की थी। ससुराल में आकर पढ़ाई आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने इसे जारी रखा। उनका लगन देख परिवारवालों ने भी प्रोत्साहित किया। एमए, बीएड के बाद वह वर्ष 2006 से कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय बदलापुर में वार्डन के पद पर तैनात हैं। उन्होंने अपने बच्चों को भी उच्च शिक्षा दिलाई। बड़ी बेटी शुभ्रा कोलकाता के ईसीएस कंपनी में परियोजना प्रबंधक हैं तो दूसरी बेटी श्वेता वर्ष 2012 में सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण कर कस्टम कमिश्नर के पद पर मुंबई मेें सेवा दे रही हैं। छोटी बेटी अंकिता हैदराबाद में एक कंपनी में बड़े पद पर हैं। सबसे छोटा बेटा अभिनव आईआईएम लखनऊ में पढ़ाई कर रहा है। राधा यादव का कहना है कि शादी के बाद सारे सपने एक झटके में टूट गए थे, लेकिन ससुरालवालों का सहयोग मेरा संबल बना।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed