{"_id":"594d6eea4f1c1b2d1e8b461a","slug":"149824692710-jaunpur-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"बिना शिव कथा के राम कथा अपूर्ण","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बिना शिव कथा के राम कथा अपूर्ण
Updated Sat, 24 Jun 2017 01:11 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सतहरिया। चित्रकूट धाम की कथा वाचिका वैदेहि ने कहा सनातनधर्म में जीवन जीने की कला निहित है। समाज में व्याप्त अनाचार, दुराचार व पापाचार को दूर करने तथा भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए सनातनधर्म का प्रचार प्रसार ही सार्थक कदम होगा। उन्होंने मुंगराबादशाहपुर के बहोरिकपुर गांव में चल रही रामकथा के तीसरे दिन भक्तों के बीच प्रचवन में जीवन के रहस्य को समझाया।
सनातनधर्म की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस धर्म में सारे धर्मों को समाहित करने की क्षमता है। बिना शिव कथा के रामकथा अपूर्ण है। शिव विवाह प्रसंग पर उन्होंने प्रकाश डालते हुए बताया कि मानस में चार विवाह का वर्णन किया गया है। जिसमें शिव, नारद, राम व सुर्पणखा विवाह है। जिस विवाह में अगुवा नहीं होते है वह सफ ल नहीं होता है। भगवान राम के लिए मुनि वशिष्ट, भगवान भोलेनाथ के प्रभू श्री राम स्वंय अगुवा थे। देर्विष नारद तथा सुर्पणखा के विवाह में कोई अगुवा नहीं था। इस लिए वह सफ ल नहीं हुआ। वैदिक मंत्रों तथा रीत रिवाज से कराया गया विवाह स्थायी होता है। उन्होंने कहा भोले नाथ महादानी थे। जो उनके दरबार में भाव भक्ति व निर्मलमन से जाता है। वह खाली हाथ वापस नहीं लौटता है। जब भारतीय संस्कृति की बात आये तो मां सीता के रूप में अपने को प्रस्तुत करें। और जब उनके अस्मिता का सवाल आए तो मां काली, मां दुर्गा तथा रानी वीरंागना, लक्ष्मीबाई बनकर उसका संहार कर दे। इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी इस धराधाम पर धर्म की हानि हुई है तो उसे दूर करने के लिए भगवान को मानव के रूप में अवतार लेना पड़ा।
विज्ञापन
सनातनधर्म की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस धर्म में सारे धर्मों को समाहित करने की क्षमता है। बिना शिव कथा के रामकथा अपूर्ण है। शिव विवाह प्रसंग पर उन्होंने प्रकाश डालते हुए बताया कि मानस में चार विवाह का वर्णन किया गया है। जिसमें शिव, नारद, राम व सुर्पणखा विवाह है। जिस विवाह में अगुवा नहीं होते है वह सफ ल नहीं होता है। भगवान राम के लिए मुनि वशिष्ट, भगवान भोलेनाथ के प्रभू श्री राम स्वंय अगुवा थे। देर्विष नारद तथा सुर्पणखा के विवाह में कोई अगुवा नहीं था। इस लिए वह सफ ल नहीं हुआ। वैदिक मंत्रों तथा रीत रिवाज से कराया गया विवाह स्थायी होता है। उन्होंने कहा भोले नाथ महादानी थे। जो उनके दरबार में भाव भक्ति व निर्मलमन से जाता है। वह खाली हाथ वापस नहीं लौटता है। जब भारतीय संस्कृति की बात आये तो मां सीता के रूप में अपने को प्रस्तुत करें। और जब उनके अस्मिता का सवाल आए तो मां काली, मां दुर्गा तथा रानी वीरंागना, लक्ष्मीबाई बनकर उसका संहार कर दे। इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी इस धराधाम पर धर्म की हानि हुई है तो उसे दूर करने के लिए भगवान को मानव के रूप में अवतार लेना पड़ा।
विज्ञापन