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Jalaun News: हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का जमानत आदेश किया निरस्त

Wed, 27 May 2026 12:35 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Wed, 27 May 2026 12:35 AM IST
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The High Court set aside the bail order of the trial court.
उरई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट से जुड़े एक मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए जमानत आदेश को निरस्त कर दिया। स्पष्ट कहा है कि पीड़ित पक्ष को सूचना और सुनवाई का अवसर दिए बिना आरोपी को राहत देना कानून के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन है।
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न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकलपीठ ने जालौन जिले के कोंच कोतवाली क्षेत्र स्थित आशीर्वाद होटल में हुई कुक की हत्या के मामले में पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सुमन देवी निरंजन के पुत्र हिमांशु निरंजन को दी गई जमानत रद्द कर दी। साथ ही आरोपी को 10 जून 2026 तक ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है।
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फैसला नंदनी देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य से संबंधित है। अपीलकर्ता और विपक्षी द्वारा न्यायालय को बताया कि कोंच कोतवाली क्षेत्र के आशीर्वाद होटल में एक हत्या के मामले में आरोपी हिमांशु निरंजन के खिलाफ हत्या व एससी-एसटी सहित अन्य धाराओं में आरोपी बनाया था। इसको न्यायिक हिरासत में जेल भेजा गया था, लेकिन रिमांड आदेश में संबंधित धाराओं का उल्लेख नहीं हो सका था। बाद में कोंच क्षेत्राधिकारी द्वारा ट्रायल कोर्ट में प्रार्थना पत्र देकर उक्त धाराओं में रिमांड स्वीकृत कराया गया।
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इसके बाद 14 नवंबर 2025 को क्षेत्राधिकारी कोंच ने दोबारा न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर कहा कि सीसीटीवी फुटेज की जांच में आरोपी के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट एवं अन्य गंभीर धाराओं से संबंधित पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले हैं। इस आधार पर ट्रायल कोर्ट ने गंभीर धाराएं हटाते हुए आरोपी को आर्म्स एक्ट की धारा में जमानत दे दी थी।

अपीलकर्ता पक्ष ने दलील दी कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 15ए(3) और 15ए(5) के तहत पीड़िता या उसके आश्रितों को प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्रवाई की सूचना देना तथा सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। इसके बावजूद भी ट्रायल कोर्ट ने जमानत पर सुनवाई के दौरान पीड़िता को नोटिस जारी नहीं किया।
इसके बाद न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने अपने आदेश में कहा कि एससी-एसटी एक्ट के मामलों में पीड़ित पक्ष को सूचना देना अनिवार्य कानूनी प्रावधान है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हरिराम भांभी बनाम सत्यानारायण एवं अन्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि बिना नोटिस पारित आदेश विधिसम्मत नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने 14 नवंबर 2025 को पारित ट्रायल कोर्ट के जमानत आदेश को निरस्त करते हुए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिए हैं कि सभी पक्षों को सुनने के बाद मामले में नए सिरे से निर्णय लिया जाए। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़िता स्वयं या अपने अधिवक्ता के माध्यम से सुनवाई में उपस्थित रह सकती है।
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