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Jalaun News: सिनेमा हॉल को कागजों में दिखा दिया वृद्धाश्रम
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उरई। समाज कल्याण विभाग की योजनाओं के नाम पर फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है। यहां सिनेमा हॉल को कागजों पर वृद्धाश्रम दिखा दिया गया और लाभ लिया गया। प्रयागराज निवासी सभाकांत मिश्र ने शुक्रवार को डीएम को शिकायती पत्र दिया है। उनका दावा है कि उनके पास कई सबूत हैं, जिसमें अधिकारियों की मिलीभगत साफ दिख रही है।आरोप है कि जिला एटा की महिला व मानव कल्याण शिक्षा प्रसार समिति ने फर्जी दस्तावेजों व कूटरचना के सहारे ई-अनुदान पोर्टल पर गलत सूचनाएं अपलोड कर लाखों रुपये का लाभ उठाने की साजिश रची।
शिकायत में कहा गया है कि संस्था ने फर्जी किरायेदारी अनुबंध लगाकर भवन का स्वामी उदयवीर सिंह दर्शाया, जबकि वास्तविक भवन मोहनी पत्नी अवधकिशोर का है। इतना ही नहीं, मात्र 175 वर्गमीटर के छोटे से भवन में 44 वृद्धजन रहने का दावा किया गया। वहीं सरकार की गाइडलाइन के अनुसार प्रति वृद्धजन 7.5 वर्गमीटर स्थान अनिवार्य है। इस हिसाब से कम से कम 600 वर्गमीटर क्षेत्रफल की आवश्यकता होती, लेकिन संस्था ने नियमों की खुली धज्जियां उड़ाईं।
उन्होंने बताया कि यह मामला स्वयं एसडीएम की जांच में सामने आया। उन्होंने आरोप लगाया कि पहली जांच जिला समाज कल्याण अधिकारी प्रवीण कुमार सिंह व एसडीएम सदर नेहा ब्याडवाल ने की। रिपोर्ट में 44 वृद्धजन दिखाए गए, जबकि मौके पर यह भी पाया गया कि कई लोगों को कुछ रुपये देकर केवल जांच के दिन बुलाया गया था।
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शिकायतकर्ता का आरोप है कि जांच में खानापूरी हुई। दोबारा शिकायत पर डीएम के आदेश पर 10 फरवरी 2025 को एसडीएम जालौन व सहायक निदेशक मत्स्य ने संयुक्त जांच की। इस जांच में पाया गया कि 13 दिसंबर 2024 को दी गई 31 बिंदुओं वाली रिपोर्ट में अधिकांश तथ्य गलत थे और संस्था को आगे अनुदान न देने की संस्तुति की गई। बावजूद इसके शासन को सही रिपोर्ट नहीं भेजी गई और संस्था को सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय से लाभ मिल गया।
इसके बाद एक जुलाई 2025 को जिलाधिकारी ने पुनः जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की, जिसकी अध्यक्षता एडीएम न्यायिक ने की। समिति ने 28 जुलाई 2025 को अपनी रिपोर्ट में कई खुलासे किए।
रिपोर्ट में कहा गया कि संस्था ने दो बार बिना अनुमति के स्थल परिवर्तन किया और ई-अनुदान पोर्टल पर यह कार्य स्वयं जिला समाज कल्याण अधिकारी प्रवीण कुमार सिंह द्वारा किया गया। यह पूरी तरह नियम विरुद्ध और शासनादेश के विपरीत है, क्योंकि किसी संस्था को पांच वर्ष से पहले स्थल परिवर्तन की अनुमति नहीं दी जा सकती। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि संस्था ने जिस स्थल पर वृद्धाश्रम दिखाया है, वह वास्तव में एक सिनेमा हॉल है। शासनादेश के अनुसार सिनेमा हॉल या चलचित्र भवन में किसी भी प्रकार की अन्य गतिविधियां बिना शासन की अनुमति के संचालित नहीं की जा सकतीं। इसके बावजूद नियमों को ताक पर रखकर यहां वृद्धाश्रम चलाने का कागजों में दावा किया गया।
शिकायतकर्ता सभाकांत मिश्र ने आरोप लगाया है कि यह पूरा खेल जिला समाज कल्याण कार्यालय के कर्मियों की मिलीभगत से हुआ है। संस्था को फायदा पहुंचाने के लिए पहले फर्जी अनुबंध उदयवीर सिंह का अपलोड कराया गया, फिर जांच में फर्जीवाड़ा कर शासन को गुमराह किया गया। जबकि दोबारा हुई जांचों में साफ पाया गया कि संस्था नियमों के मुताबिक पात्र ही नहीं है। उन्होंने मांग की है कि 10 फरवरी और 28 जुलाई 2025 की जांच रिपोर्टों के आधार पर संस्था का प्रस्ताव निरस्त कर शासन को अवगत कराया जाए, ताकि संस्था को केंद्र सरकार से कोई अनुदान प्राप्त न हो सके। चेतावनी दी है कि कार्रवाई नहीं की गई तो वह हाईकोर्ट की शरण लेने को बाध्य होंगे।
वर्जन-
मानकों के हिसाब से वृद्धाश्रम ठीक चल रहा था। मैंने और एसडीएम उरई ने जांच की थी। इसके बाद रिपोर्ट शासन को भेज दी गई। उसके बाद संचालक ने पता बदल दिया। इसका पता दूसरी जांच में चला। उसके खिलाफ भी रिपोर्ट शासन को भेजी जा रही है। यह योजना जिला समाज कल्याण की नहीं केंद्र सरकार की है। सिर्फ उनके स्तर से जांच की जाती है।
प्रवीण कुमार सिंह, समाज कल्याण अधिकारी
जब वृद्धा आश्रम की जांच की थी तो उस समय वह संचालित था। दोबारा जांच होने के बाद उन्हें जानकारी हुई थी कि किरायानामा खत्म होने के बाद संचालक ने दूसरी जगह संचालित कर लिया है। इसकी जानकारी नहीं है कि वर्तमान में स्थिति क्या है।
नेहा ब्याडवॉल, एसडीएम, उरई
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शिकायत में कहा गया है कि संस्था ने फर्जी किरायेदारी अनुबंध लगाकर भवन का स्वामी उदयवीर सिंह दर्शाया, जबकि वास्तविक भवन मोहनी पत्नी अवधकिशोर का है। इतना ही नहीं, मात्र 175 वर्गमीटर के छोटे से भवन में 44 वृद्धजन रहने का दावा किया गया। वहीं सरकार की गाइडलाइन के अनुसार प्रति वृद्धजन 7.5 वर्गमीटर स्थान अनिवार्य है। इस हिसाब से कम से कम 600 वर्गमीटर क्षेत्रफल की आवश्यकता होती, लेकिन संस्था ने नियमों की खुली धज्जियां उड़ाईं।
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उन्होंने बताया कि यह मामला स्वयं एसडीएम की जांच में सामने आया। उन्होंने आरोप लगाया कि पहली जांच जिला समाज कल्याण अधिकारी प्रवीण कुमार सिंह व एसडीएम सदर नेहा ब्याडवाल ने की। रिपोर्ट में 44 वृद्धजन दिखाए गए, जबकि मौके पर यह भी पाया गया कि कई लोगों को कुछ रुपये देकर केवल जांच के दिन बुलाया गया था।
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शिकायतकर्ता का आरोप है कि जांच में खानापूरी हुई। दोबारा शिकायत पर डीएम के आदेश पर 10 फरवरी 2025 को एसडीएम जालौन व सहायक निदेशक मत्स्य ने संयुक्त जांच की। इस जांच में पाया गया कि 13 दिसंबर 2024 को दी गई 31 बिंदुओं वाली रिपोर्ट में अधिकांश तथ्य गलत थे और संस्था को आगे अनुदान न देने की संस्तुति की गई। बावजूद इसके शासन को सही रिपोर्ट नहीं भेजी गई और संस्था को सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय से लाभ मिल गया।
इसके बाद एक जुलाई 2025 को जिलाधिकारी ने पुनः जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की, जिसकी अध्यक्षता एडीएम न्यायिक ने की। समिति ने 28 जुलाई 2025 को अपनी रिपोर्ट में कई खुलासे किए।
रिपोर्ट में कहा गया कि संस्था ने दो बार बिना अनुमति के स्थल परिवर्तन किया और ई-अनुदान पोर्टल पर यह कार्य स्वयं जिला समाज कल्याण अधिकारी प्रवीण कुमार सिंह द्वारा किया गया। यह पूरी तरह नियम विरुद्ध और शासनादेश के विपरीत है, क्योंकि किसी संस्था को पांच वर्ष से पहले स्थल परिवर्तन की अनुमति नहीं दी जा सकती। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि संस्था ने जिस स्थल पर वृद्धाश्रम दिखाया है, वह वास्तव में एक सिनेमा हॉल है। शासनादेश के अनुसार सिनेमा हॉल या चलचित्र भवन में किसी भी प्रकार की अन्य गतिविधियां बिना शासन की अनुमति के संचालित नहीं की जा सकतीं। इसके बावजूद नियमों को ताक पर रखकर यहां वृद्धाश्रम चलाने का कागजों में दावा किया गया।
शिकायतकर्ता सभाकांत मिश्र ने आरोप लगाया है कि यह पूरा खेल जिला समाज कल्याण कार्यालय के कर्मियों की मिलीभगत से हुआ है। संस्था को फायदा पहुंचाने के लिए पहले फर्जी अनुबंध उदयवीर सिंह का अपलोड कराया गया, फिर जांच में फर्जीवाड़ा कर शासन को गुमराह किया गया। जबकि दोबारा हुई जांचों में साफ पाया गया कि संस्था नियमों के मुताबिक पात्र ही नहीं है। उन्होंने मांग की है कि 10 फरवरी और 28 जुलाई 2025 की जांच रिपोर्टों के आधार पर संस्था का प्रस्ताव निरस्त कर शासन को अवगत कराया जाए, ताकि संस्था को केंद्र सरकार से कोई अनुदान प्राप्त न हो सके। चेतावनी दी है कि कार्रवाई नहीं की गई तो वह हाईकोर्ट की शरण लेने को बाध्य होंगे।
वर्जन-
मानकों के हिसाब से वृद्धाश्रम ठीक चल रहा था। मैंने और एसडीएम उरई ने जांच की थी। इसके बाद रिपोर्ट शासन को भेज दी गई। उसके बाद संचालक ने पता बदल दिया। इसका पता दूसरी जांच में चला। उसके खिलाफ भी रिपोर्ट शासन को भेजी जा रही है। यह योजना जिला समाज कल्याण की नहीं केंद्र सरकार की है। सिर्फ उनके स्तर से जांच की जाती है।
प्रवीण कुमार सिंह, समाज कल्याण अधिकारी
जब वृद्धा आश्रम की जांच की थी तो उस समय वह संचालित था। दोबारा जांच होने के बाद उन्हें जानकारी हुई थी कि किरायानामा खत्म होने के बाद संचालक ने दूसरी जगह संचालित कर लिया है। इसकी जानकारी नहीं है कि वर्तमान में स्थिति क्या है।
नेहा ब्याडवॉल, एसडीएम, उरई