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यहां 30 दिन में निपटाया जाता है रेप केस

Sat, 12 Jan 2013 10:28 AM IST
अखिलेश कुमार/फर्रुखाबाद
अखिलेश कुमार/फर्रुखाबाद Updated Sat, 12 Jan 2013 10:28 AM IST
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iranian tribal courts give verdict in rape cases within 30 days

ईरान से आकर देश में बसने वाले कबीलों में सदियों पुरानी रस्में आज भी कायम हैं। जुर्म के मामले थाना, कचहरी में नहीं जाते। कबीलाई अदालतें हत्या से लेकर चोरी, बलात्कार के जुर्म का फैसला करती हैं। बलात्कार के मामलों में 30 दिन में फैसला हो जाता है। इसे सबसे बड़ा जुर्म माना जाता है। दोषी के जुर्माना अदा न करने पर सरदार (कबीले का मुखिया) जेब से भरपाई करते हैं। देश में इनकी तादाद एक लाख के करीब है। फर्रुखाबाद शहर में 21 परिवार गुजर-बसर कर रहे हैं।

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कबीलाई अदालतों में गैंग रेप के जुर्म में सामाजिक दंड का रिवाज है। दोषी का हुक्का पानी कबीले से बंद कर दिया जाता है। पीड़िता को देने के लिए जुर्माना तय होता है। इसके लिए दोषी की हैसियत देखी जाती है। शादीशुदा मर्द के रेप करने पर उसे पीड़िता से निकाह की सजा भी मिलती है। प्रेम प्रसंग में फरार होने पर कबीला तिरस्कार कर देता है। दुष्कर्म या ऐसे प्रयास में नाकाम होने पर पीड़िता के साथ अत्याचार में देशभर का कोई कबीला शरण नहीं देता है। कबीले के निसार अहमद जाफार बताते हैं कि गैंग रेप के आरोपी को किसी के घर घुसने की इजाजत नहीं होती है।
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300 साल पहले घोड़ों का व्यापार करने के लिए ईरान से कबीलाई शिया सरदार आए थे। बाद में भारत में ही बस गए। अब यह यहीं के नागरिक हैं। इनकी प्रथाएं 300 साल पुरानी हैं। इनका दावा है कि कबीले से जुड़े किसी भी शहरवासी ने अभी तक कोई भी मामला कचहरी में नहीं पहुंचाया है। शहर कबीले के सरदार गुलशेर अली जाफरी 60 साल से सामाजिक अदालतों में न्याय कर रहे हैं।
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वह बताते हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तरांचल, मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा सहित देश के हर हिस्से में कबीले हैं। देश में इनकी आबादी एक लाख है। कबीले में ही न्याय होता है। रेप के मामलों में 30 दिन के भीतर फैसला कर दिया जाता है। मुखबिर व गवाह न्याय में सहयोग करते हैं। 3 से 7 सरदारों की ज्यूरी निर्णय देती है। पेचीदा केसों में बाहरी कबीलों के सरदारों को बुलवा लिया जाता है। पीड़ित को हर हाल में न्याय दिलाया जाता है। दोषी के जुर्माना न देने पर सरदार अपनी जेब से भरते हैं।


25 साल पहले फिरोज की हत्या का फैसला कबीले की अदालत ने ही दिया था। फैसला न मानने पर भी कबीले से नाता तोड़ने की सजा मुकर्रर होती है। वह कहते हैं कि कबीलों में जुर्म का प्रतिशत 7 से भी कम है।

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