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टैक्स की मार से फीका पड़ रहा हाथरसी रंग-गुलाल
हाथरस/ब्यूरो
Updated Sun, 10 Mar 2013 03:21 PM IST
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हर बार हाथरस का रंग-गुलाल फिल्मी दुनिया तक जाता है और वहां भी अपना रंग बिखेरता है। हालांकि टैक्स की मार, ट्रांसर्पोटेशन की समस्या और लेबर की कमी ने इस कारोबार को प्रभावित कर दिया है।
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होली पर हाथरस का गुलाल और रंग फिर पूरे देश में बरसेगा। दीपावली के बाद से ही यहां रंग, गुलाल की फैक्ट्रियों में काम चल रहा है और दूर-दूर तक माल की सप्लाई हो रही है।
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हाथरस में इस समय करीब दो दर्जन रंग और गुलाल की फैक्ट्रियां हैं। यहां रंग और गुलाल का कारोबार करीब नौ दशक पुराना है। करीब पांच हजार लोगों की रोजी-रोटी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस कारोबार से जुड़ी हुई है। जानकारों की माने तो डेढ़ दशक पहले तक पूरे देश में गुलाल केवल हाथरस में ही बनता था।
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यहां के रंग-गुलाल की दूर-दूर तक डिमांड है। स्टार्च को रंग और अन्य केमिकल में मिलाकर गुलाल बनाया जाता है। यहां मुख्य रूप से गुलाबी, हरा, लाल, पीला, केसरिया रंग का गुलाल बनता है। इसके लिए कच्चा माल मध्यप्रदेश, मद्रास, उत्तराखंड आदि से आता है।
यहां हालांकि रंग का उत्पादन तो नहीं होता, लेकिन अहमदाबाद, दिल्ली, पंजाब आदि से मंगाकर इसकी क्वालिटी सुधारी जाती है और फिर इसे यहां के उद्यमी अपना मार्का देते हैं। जहां-जहां होली खेली जाती है, वहां-वहां हाथरसी गुलाल और रंग जाता है।
मुंबई के भी काफी बड़े दुकानदार यहां फैक्ट्रियों से रंग-गुलाल की सप्लाई मंगाते हैं और फिर यह गुलाल और रंग फिल्मी दुनिया तक होली पर बरसता है। यूपी से लेकर पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा आदि प्रदेशों के अलावा विदेश में भी जाता है।
इस उद्योग के सामने फिलहाल काफी समस्याएं भी खड़ी हो गई हैं। सबसे पहले तो यहां के व्यापारी टैक्स से परेशान हैं। यूपी में गुलाल और रंग पर टैक्स है, जबकि आसपास के प्रदेशों में टैक्स नहीं है। इसकी वजह से अब इन प्रदेशों में यह कारोबार फल-फूल रहा है।
इसके अलावा यहां लेबर की भी समस्या है। यह सीजनेवल काम है। जब रंग-गुलाल की फैक्ट्रियों में काम होता है, तभी आलू की खुदाई का सीजन होता है। ऐसे में लेबर का अभाव भी इस धंधे पर विपरीत असर डालता है।
इसके अलावा ट्रांसर्पोटेशन की समस्या भी इस कारोबार को पतन की ओर ले जा रही है। यहां ट्रांसर्पोटेशन के उचित साधन नहीं है। चार-चार बार माल को ट्रकों आदि में उतारा-चढ़ाया जाता है। समय से माल की डिमांड पूरी नहीं हो पाती। ऐसे में निकट के प्रांतों में हाल में ही जिन उद्यमियों ने यह कारोबार किया है, वहां यह उद्योग यहां के मुकाबले ज्यादा विकसित हो रहा है।
'इस उद्योग से टैक्स खत्म होना चाहिए। सिंदूर पर कोई टैक्स नहीं है, लेकिन गुलाल पर यूपी में टैक्स है। राजस्थान में इस पर कोई टैक्स नहीं है। इसलिए यह उद्योग यहां से उजड़ रहा है। इसके अलावा ट्रांसर्पोटेशन की भी यहां पर्याप्त सुविधा नहीं है।'
- विनोद मित्तल, रंग उद्यमी
'गुलाल को कर मुक्त करना चाहिए। यह पूजा-अचर्ना के काम आता है। ट्रांसर्पोटेशन की समस्या भी यहां इस उद्योग की मुख्य समस्या है। इसके अलावा यहां इसकी क्वालिटी जांचने के लिए प्रयोगशाला भी स्थापित होनी चाहिए। इसके लिए भी कभी किसी ने प्रयास नहीं किए।'
- मनोज अग्रवाल, रंग उद्यमी
'जिस समय रंग-गुलाल का सीजन होता है। उसी समय आलू की खुदाई का सीजन होता है। ऐसे में लेबर की समस्या भी आती है। टैक्स से सबसे ज्यादा यह उद्योग प्रभावित है। आसपास के प्रदेशों में टैक्स नहीं है और इसकी वजह से वहां यह कारोबार सफल है।'
- अशोक वार्ष्णेय, रंग उद्यमी