{"_id":"7-21814","slug":"Hathras-21814-7","type":"story","status":"publish","title_hn":"सरकारी दवा का नमूना भी आया फेल ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सरकारी दवा का नमूना भी आया फेल
Hathras
Updated Wed, 01 Oct 2014 05:30 AM IST
विज्ञापन
हाथरस। जब सरकारी अस्पतालों की दवा ही ठीक न हों तो आखिर किस पर भरोसा किया जाए। सरकारी अस्पतालों में रोगियों को दिए जाने वाले एक कैप्सूल का नमूना प्रयोगशाला से फेल आया है। एक साल बाद इस नमूने की रिपोर्ट प्रयोगशाला से औषधि विभाग को मिली है। ऐसे में अब औषधि विभाग के डीआई ने रिपोर्ट मिलने के इसके प्रयोग पर रोक लगाने को लिखा है। साथ ही शासन से इस कैप्सूल की निर्माता कंपनी के खिलाफ मुकदमा कायम कराने की अनुमति भी मांगी है। अक्सर प्राइवेट मेडिकल स्टोरों पर जब दवाओं को नमूने लिए जाते हैं तो इस आशंका के चलते छापेमारी की जाती है कि दवा कहीं मिलावटी या नकली न हो लेकिन अगर यही स्थिति सरकारी अस्पतालों की दवा में हो तो फिर मरीज आखिर किस पर भरोसा करे, यह अपने आप में गंभीर सवाल है। पिछले साल अक्टूबर माह में यहां स्वास्थ्य विभाग के सीएमएसडी स्टोर से एएनडी कैप्सूल का नमूना लिया गया था। औषधि विभाग ने इसे जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा। वहां से अब जो रिपोर्ट आई है वह चौंकाने वाली है। यह सरकारी दवा जांच में फेल पाई गई है। इनकी निर्माता कंपनी एनरोर है। कैप्सूल का बैच नंबर एडी5-23-05 है। इसमें विटामिन ए की मात्रा महज 53 फीसदी पाई गई है। यह अति अधोमानक की श्रेणी में पाया गया है। रिपोर्ट आने के बाद ही यहां के डीआई पूरनचंद ने अपनी कार्रवाई शुरू कर दी। उन्होंने इस बैच नंबर की उक्त दवा के वितरण व निर्माण पर रोक लगाने के आदेश दे दिए। यही नहीं जहां भी यह दवा वितरण को गई, वहां से वापस मंगवाने को भी कहा। कार्रवाई की संस्तुति करते हुए डीआई ने इस बारे में राजकीय विश्लेषक से वाद दायर करने की अनुमति मांगी है। इस पूरे मामले में सबसे खेदजनक पहलू यह भी है कि इस कैप्सूल का नमूना एक साल पहले लिया गया था और यह अब फेल आया है। इतने समय में इस फेल कैप्सूल को लाखों लोगों ने दवा के रूप में इस्तेमाल किया होगा और हो सकता है कि यह पूरा खप भी गया हो। प्रयोगशाला से महीनों और सालों रिपोर्ट नहीं मिलती और ऐसे में नकली, मिलावटी व अधोमानक दवाएं भी मार्केट में आसानी से खप जाती हैं। यही स्थिति सरकारी अस्पतालों में होती है।
विज्ञापन