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Hardoi News: 300 साल पहले खुदाई में मिली थी मां मंगला की मूर्ति, भक्तों का करतीं मंगल
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संवाद न्यूज एजेंसी
सांडी। यहां पर मां मंगला अपने नाम के अनुसार भक्तों का मंगल करतीं हैं। मान्यता है कि मां मंगला की मूर्ति करीब 300 साल पुरानी है। माता की यह मूर्ति खुदाई करते समय निकली थी। कम ऊंचाई वाली माता मंगला की मूर्ति को पहले तो लोगों ने वहीं पर नीम-पीपल के पेड़ के पास रखकर पूजन-अर्चन शुरू कर दिया। इसके बाद उसी समय माता के भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया।
सांडी के मोहल्ला नवाबगंज में करीब 300 साल पहले मिट्टी की खुदाई करते समय कुछ लोगों को एक मूर्ति मिली थी। माता की मूर्ति होने के साथ ही कम ऊंचाई के चलते लोगों ने इसी परिसर में पीपल-नीम के पेड़ के नीचे रखकर पूजा पाठ किया। मान्यता है कि मां की पूजा-अर्चना करने वालों की मनोकामना पूरी होने के साथ ही मंगल होता है और माता का नाम मंगला गौरी पड़ गया। यहां पर मंगला माता के मंदिर में वैसे तो पूजन-अर्चन करने वाले साल भर आते ही हैं, नवरात्र में विशेष पूजा व अनुष्ठान के लिए भक्त जुटते हैं।
पुजारी गौरव तिवारी ने बताया कि जैसा कि उनके पूर्व के बुजुर्ग पुजारियों व लोगों ने बताया था कि माता की मूर्ति से जल निकलते देख लोगों को आश्चर्य हुआ। लोगों ने इस जल के आचमन के साथ ही आंखों के दर्द आदि में लगाना शुरू तो उन्हें आराम मिलने लगा। लोगों की शरीर की अन्य बीमारियां में उपयोग किया तो लाभ मिलने लगा। ऐसे में मंदिर निर्माण के समय मां की मूर्ति की स्थापना के समय माता के चरणों के पास ही एक छोटा सा कुंड भी निर्मित कराया गया है। यहां पर लोगों की मनोकामना पूरी होती है और भंडारा आदि का आयोजन चलता रहता है।
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माता के जल को भक्त प्रसाद स्वरूप ले जाते हैं
पुजारी ने बताया कि यहां पर माता की मूर्ति से निकलने वाले जल को भक्त अपने साथ प्रसाद स्वरूप ले जाते हैं। भक्तों का कहना है कि घर पर माता मंगला का जल होने से भगवान शिव की जटाओं से निकली मां गंगा के जल की भांति ही घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
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सांडी। यहां पर मां मंगला अपने नाम के अनुसार भक्तों का मंगल करतीं हैं। मान्यता है कि मां मंगला की मूर्ति करीब 300 साल पुरानी है। माता की यह मूर्ति खुदाई करते समय निकली थी। कम ऊंचाई वाली माता मंगला की मूर्ति को पहले तो लोगों ने वहीं पर नीम-पीपल के पेड़ के पास रखकर पूजन-अर्चन शुरू कर दिया। इसके बाद उसी समय माता के भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया।
सांडी के मोहल्ला नवाबगंज में करीब 300 साल पहले मिट्टी की खुदाई करते समय कुछ लोगों को एक मूर्ति मिली थी। माता की मूर्ति होने के साथ ही कम ऊंचाई के चलते लोगों ने इसी परिसर में पीपल-नीम के पेड़ के नीचे रखकर पूजा पाठ किया। मान्यता है कि मां की पूजा-अर्चना करने वालों की मनोकामना पूरी होने के साथ ही मंगल होता है और माता का नाम मंगला गौरी पड़ गया। यहां पर मंगला माता के मंदिर में वैसे तो पूजन-अर्चन करने वाले साल भर आते ही हैं, नवरात्र में विशेष पूजा व अनुष्ठान के लिए भक्त जुटते हैं।
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पुजारी गौरव तिवारी ने बताया कि जैसा कि उनके पूर्व के बुजुर्ग पुजारियों व लोगों ने बताया था कि माता की मूर्ति से जल निकलते देख लोगों को आश्चर्य हुआ। लोगों ने इस जल के आचमन के साथ ही आंखों के दर्द आदि में लगाना शुरू तो उन्हें आराम मिलने लगा। लोगों की शरीर की अन्य बीमारियां में उपयोग किया तो लाभ मिलने लगा। ऐसे में मंदिर निर्माण के समय मां की मूर्ति की स्थापना के समय माता के चरणों के पास ही एक छोटा सा कुंड भी निर्मित कराया गया है। यहां पर लोगों की मनोकामना पूरी होती है और भंडारा आदि का आयोजन चलता रहता है।
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माता के जल को भक्त प्रसाद स्वरूप ले जाते हैं
पुजारी ने बताया कि यहां पर माता की मूर्ति से निकलने वाले जल को भक्त अपने साथ प्रसाद स्वरूप ले जाते हैं। भक्तों का कहना है कि घर पर माता मंगला का जल होने से भगवान शिव की जटाओं से निकली मां गंगा के जल की भांति ही घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।