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Hapur News: वन गमन पर भक्तों की आंखें भर आईं, केवट ने भगवान को गंगा पार कराई
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ब्रजघाट के श्रीकृष्ण आश्रम में श्रीराम कथा सुनाते व्यास। संवाद
ब्रजघाट। गंगानगरी के श्रीकृष्ण आश्रम में चल रही नौ दिवसीय श्रीराम कथा में पांचवे दिन अयोध्या धाम से पधारे व्यास राष्ट्रीय संत अवधेश महाराज ने भक्तों को भगवान राम और माता जानकी के विवाह की कथा सुनाई। वहीं, वन गमन का प्रसंग सुनकर भक्तों की आंखे नम हो गई। केवट ने श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को गंगा पार कराई। भगवान और भक्त की वार्ता का प्रसंग सुनकर भक्त भाव विह्वल हो गए।
कथा आरंभ होने से पूर्व सुबह के समय आश्रम परिसर में सोम यज्ञ में आहुति दी गईं। इस दौरान श्रद्धालुओं ने विश्व में सभी के मंगल, देश और क्षेत्र की खुशहाली की कामना भी की। कथा आरंभ करते हुए व्यास ने कहा कि गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से राजा जनक के दरबार में श्रीराम ने भगवान शिव के धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाई, तो धनुष टूट गया। जिसकी जानकारी मिलने पर परशुराम जनकपुरी पहुंच गए। जहां उनके और लक्ष्मण के बीच विवाद हुआ। लेकिन, श्रीराम को पहचान कर परशुराम का क्रोध दूर हो गया। विवाह के उपरांत चारों भाई और उनकी पत्नियां अयोध्या पहुंची तो पूरी नगरी में हर्ष छा गया। राजा दशरथ ने श्रीराम के राज्यभिषेक की घोषणा की, जिस पर समस्त राजदरबारी और प्रजा हर्षित हो उठे।
अयोध्या नगरी में मंगल गीत गाए जाने लगे। लेकिन, दासी मंथरा के बहकावे में आकर रानी कैकयी ने राजा दशरथ से दो वचन मांगे। जिनमें राम को 14 वर्ष का वनवास और भरत को राजगद्दी सौंपने की हठ की। पिता के वचन को पूरा करने के लिए भगवान राम ने वनवासी का वेश धारण कर वन जाने का निश्चय किया। माता सीता और लक्ष्मण भी उनके साथ चल दिए। वनगमन के दौरान श्रीराम, सीता, लक्ष्मण गंगा घाट पहुंचे। जहां केवट से गंगा पार करने के लिए नाव मांगी। इस दौरान श्रीराम-केवट के बीच हुए संवाद को भजन के माध्यम से भक्तों के सामने रखा। जिसे सुनकर श्रद्धालु भाव विभोर हो गए। इस दौरान सुरेश चंद शर्मा, निशांत, सुमित, शंभू दयाल शर्मा, सेवक राम, विष्णु दत्त शर्मा, विनोद शर्मा आदि मौजूद रहे।
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कथा आरंभ होने से पूर्व सुबह के समय आश्रम परिसर में सोम यज्ञ में आहुति दी गईं। इस दौरान श्रद्धालुओं ने विश्व में सभी के मंगल, देश और क्षेत्र की खुशहाली की कामना भी की। कथा आरंभ करते हुए व्यास ने कहा कि गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से राजा जनक के दरबार में श्रीराम ने भगवान शिव के धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाई, तो धनुष टूट गया। जिसकी जानकारी मिलने पर परशुराम जनकपुरी पहुंच गए। जहां उनके और लक्ष्मण के बीच विवाद हुआ। लेकिन, श्रीराम को पहचान कर परशुराम का क्रोध दूर हो गया। विवाह के उपरांत चारों भाई और उनकी पत्नियां अयोध्या पहुंची तो पूरी नगरी में हर्ष छा गया। राजा दशरथ ने श्रीराम के राज्यभिषेक की घोषणा की, जिस पर समस्त राजदरबारी और प्रजा हर्षित हो उठे।
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अयोध्या नगरी में मंगल गीत गाए जाने लगे। लेकिन, दासी मंथरा के बहकावे में आकर रानी कैकयी ने राजा दशरथ से दो वचन मांगे। जिनमें राम को 14 वर्ष का वनवास और भरत को राजगद्दी सौंपने की हठ की। पिता के वचन को पूरा करने के लिए भगवान राम ने वनवासी का वेश धारण कर वन जाने का निश्चय किया। माता सीता और लक्ष्मण भी उनके साथ चल दिए। वनगमन के दौरान श्रीराम, सीता, लक्ष्मण गंगा घाट पहुंचे। जहां केवट से गंगा पार करने के लिए नाव मांगी। इस दौरान श्रीराम-केवट के बीच हुए संवाद को भजन के माध्यम से भक्तों के सामने रखा। जिसे सुनकर श्रद्धालु भाव विभोर हो गए। इस दौरान सुरेश चंद शर्मा, निशांत, सुमित, शंभू दयाल शर्मा, सेवक राम, विष्णु दत्त शर्मा, विनोद शर्मा आदि मौजूद रहे।
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