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हां, मुझे उमा भारती से मोहब्बत थी: गोंविदाचार्य
लखनऊ/अखिलेश वाजपेयी
Updated Mon, 12 Aug 2013 11:58 AM IST
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संघ परिवार व भाजपा की रीति-नीति व राजनीति के लंबे समय तक शिल्पकार रहे कोणिपक्कम नीलमेघाचार्य गोविंदाचार्य (केएन गोविंदाचार्य) ने प्रेम के लिए जिस शख्स की तस्वीर उन्होंने अपने दिल में बैठाई थी, वह और कोई नहीं अब साध्वी हो चुकीं उमा भारती ही थीं।
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गोविंदाचार्य ने स्वीकार किया कि उनके दिल में प्रेम की लहर कुछ वैसी ही उठी थी, जैसी सामान्य मनुष्य के भीतर उठती है। लेकिन बाद में इस प्रसंग ने जब संघ व भाजपा के रंग में भंग डाल दिया और बखेड़ा खड़ा हो गया।
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तब संगठन के अनुशासन और संघ के संस्कार को प्राथमिकता देते हुए गोविंदाचार्य ने अपने ही हाथ अपने प्रेम को सूली पर टांग दिया। हालांकि इसके पीछे उमा भारती की असहमति भी एक वजह रही।
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लगभग एक दशक बाद लखनऊ में ‘अमर उजाला’ से खास बातचीत में गोविंदाचार्य ने ईमानदारी से स्वीकारा और कहा, ‘उमाजी के लिए मेरे दिल में एक समय प्रेम का भाव था।’
इस बात से यह संकेत भी निकलते हैं कि इन रिश्तों के चर्चा में आने के बाद ही उमा भारती ने संन्यास का मार्ग चुन लिया था।
गोविंदाचार्य कहते हैं, ‘यह बात 1992 से पहले की है। उमा को लेकर मेरे भीतर भी प्रेम की लहर उठी। कोई देवता व ऋषि तो हूं नहीं। मनुष्य ही तो हूं। रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए हमने अपने मन की बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारियों के सामने रखी। पर, न संघ के अधिकारियों ने अनुमति दी और न उमा जी सहमत हुई। उमा जी ने 1992 में संन्यास का फैसला ले लिया। मुझे अध्यात्म से प्रेम की प्रेरणा दी। मैने भी अपनी भूमिका बदल ली। संन्यास के साथ उमा मेरे लिए गुरु हो गई।’
गोविंदाचार्य ने भले ही अपने दिल में उमा भारती के लिए प्रेम-भाव पनपने की बात स्वीकार कर ली हो। मगर, उमा आज तक इस तथ्य को स्वीकार करने से कतराती रही हैं। यहां तक कि जब कभी सवाल भी हुआ, तो उन्होंने इसे बकवास तक करार दे दिया।
भले ही उमा भारती ने गोविंदाचार्य के प्रेम को स्वीकार न किया हो, लेकिन गोविंद जी के दिल में उमा को लेकर सम्मान जरा भी कम नहीं हुआ।
उनके अनुसार वह बेहतरीन राजनेता हैं। उनकी स्मरणशक्ति और वक्तृत्व शैली बेमिसाल है। उनके भीतर भी गैर बराबरी व गरीबी के खिलाफ संघर्ष की तड़प है।