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टूट सकता है केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने का ख्वाब

Sun, 19 Jun 2016 01:50 AM IST
डॉ. राकेश राय, अमर उजाला, गोरखपुर।
डॉ. राकेश राय, अमर उजाला, गोरखपुर। Updated Sun, 19 Jun 2016 01:50 AM IST
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gorakhpur university is in trouble to make central university
गोरखपुर यूनिवर्सिटी
गोरखपुर यूनिवर्सिटी इन दिनों एक अजीब पशोपेश में फंसी हुई है। एक तरफ यूनिवर्सिटी पर केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा हासिल करने का दबाव है तो दूसरी तरफ नेशनल एसेसमेंट एक्रेडेशन काउंसिल (नैक) से मूल्यांकन कराकर अपनी स्थिति बेहतर साबित करने का संकट। यूनिवर्सिटी ने पिछले दिनों केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने संबंधी मांग पत्र तो शासन को भेज दिया लेकिन ‘नैक’  को लेकर उत्तर प्रदेश उच्च्तर शिक्षा परिषद से मांगी गई सूचना का उनके पास कोई जवाब नहीं है।
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हालांकि यूनिवर्सिटी का ‘नैक’ मूल्यांकन के सवाल पर दो-टूक जवाब है कि ‘हम तैयार हैं’। लेकिन अंदरखाने सच्चाई यही है कि बिना संसाधन यदि यूनिवर्सिटी ने ‘नैक’ मूल्यांकन करा लिया तो यूनिवर्सिटी की प्रतिष्ठा दांव पर लग जाएगी। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने दो साल पहले जिस उत्साह से ‘नैक’ मूल्यांकन के लिए आवेदन किया था, उतनी ही खामोशी से मूल्यांकन प्रक्रिया की गति पर विराम भी लगा दिया। इसके पीछे वजह शिक्षकों की 45 फीसदी से ज्यादा की कमी और शिक्षा की गुणवत्ता का गिरता स्तर सामने आई, जिसे दूर किए बिना यूनिवर्सिटी को अपनी पिछली ग्रेडिंग (B++) को कायम रखना चुनौती होगी। 
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रिटायर होते गए शिक्षक नहीं हुई नियुक्ति
2005 में जब तत्कालीन कुलपति प्रो. अरुण कुमार ने पहली बार ‘नैक’ से मूल्यांकन कराया तो भौतिक और शैक्षिक हर स्तर को बेहतर साबित करने के लिए विभागों ने दिन-रात एक कर दिया। शिक्षक पर्याप्त थे, इसलिए सफलता भी मिली और यूनिवर्सिटी को B++ ग्रेड हासिल हुई। 2010 में ग्रेडिंग की मियाद पूरी हो गई।
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इस दौरान शिक्षक रिटायर होते गए, लेकिन नई नियुक्तियां नहीं हुईं। नतीजा यह हुआ कि उसके बाद किसी कुलपति ने नैक मूल्यांकन के लिए आवेदन करने का साहस ही नहीं किया। जब प्रो. अशोक कुमार कुलपति बने तो एक बार फिर यूनिवर्सिटी को ‘नैक’ के मानक पर तौलने के लिए कमर कसी गई। लेकिन शिक्षकों की कमी के चलते अध्यापन का स्तर गिरता चला गया। ऐसे में यदि यूनिवर्सिटी ने मूल्यांकन करा लिया तो केंद्रीय यूनिवर्सिटी का दर्जा पाने के ख्वाब पर भी सवाल उठने लगेंगे। 
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