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मुकदमे के निस्तारण में देरी के लिए सभी हैं जिम्मेदार
अरविंद राम त्रिपाठी, अमर उजाला, गोरखपुर।
Updated Sun, 17 Jul 2016 01:19 AM IST
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बेशर्मी भरे सवालों पर जज के खिलाफ मुकदमा
- फोटो : डेलीमेल
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अदालतों पर मुकदमों का बोझ, वादकारियों को मिलती तारीख पे तारीख, न्याय में देरी का ठीकरा वकीलों पर, दोषपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया आदि शब्दों का इस्तेमाल तकरीबन हर सेमिनार में देखने और सुनने को मिलता है। लोग न्याय मिलने में देरी को लेकर एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाते हैं। कुछ केवल वकीलों को दोष देते हैं तो कुछ संपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया को ही दोषी मानते हैं। अब तो न्याय में विलंब को लेकर सोशल साइट्स पर चुटकुले भी दिखने लगे हैं। मुकदमा दाखिल करने से लेकर निर्णय के बीच बीती हुई अवधि के लिए वास्तव में देरी का जिम्मेदार कौन है इसके बारे में कुछ अधिवक्ताओं और वादकारियों से बातचीत की गई तो साबित हुआ कि न्याय मिलने में देरी के जिम्मेदार प्रक्रिया से जुड़े सभी लोग हैं। हां यह सही है कि कोई कम जिम्मेदार है तो कोई ज्यादा।
हरेक की है जिम्मेदारी
न्याय निर्णयन में देरी के जिम्मेदार सभी हैं। जिसकी जितनी जिम्मेदारी है देरी में भागीदारी भी उसकी उतनी ही है। अभियोजन पक्ष जहां पचास फीसदी जिम्मेदार है वहीं न्यायिक अधिकारी और वकील बराबर के जिम्मेदार हैं। आपराधिक मामलों में पुलिस तेजी से काम नहीं करती आरोप पत्र लगाकर भूल जाती है। पुलिस समय से रिपोर्ट न भेजकर अदालत का समय बरबाद करती है। विवेचना और अदालती कार्यवाही के लिए पुलिस विभाग में अलग सेल होना चाहिए।
- शंकर शरण त्रिपाठी, एडवोकेट (फौजदारी मामलों के जानकार)
सरकार है जिम्मेदार
राजस्व मामलों के निस्तारण में देरी की प्रमुख वजह सरकार है। कमिश्नरी के चार जिलों के मामलों को देखने के लिए चार अपर आयुक्त हैं। वर्तमान समय में चारों न्यायालय रिक्त चल रहे हैं। अधिकारियों पर प्रशासनिक कार्यों का दायित्व ज्यादा होता है, वे न्यायिक कार्य नहीं कर पाते। अलग राजस्व न्यायालयों की मांग पुरानी है सरकार इस दिशा में कोई कार्य नहीं कर रही है। देरी में वकील का कोई दोष नहीं होता। वकील कब चाहता है कि उसका मामला लटके।
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- निकेत नारायन सेवक पांडेय, एडवोकेट (अध्यक्ष कमिश्नर्स कोर्ट बार एसोसिएशन)
पक्षकार के साथ प्रक्रिया भी दोषी
सिविल मामलों में न्यायिक प्रक्रिया ही जटिल है। इसी वजह से मुकदमों के निस्तारण में देरी होती है। सिविल मुकदमाें को पक्षकार ही ज्यादा लंबा चलाना चाहते हैं। वकील भी जिम्मेदार हैं, लेकिन उतना ही जितना न्यायिक अधिकारी। अधिकारी अगर निस्तारण की ठान लेगा तो वकील और पक्षकार कहां भाग पाएंगे।
- महेंद्र नाथ शुक्ल, एडवोकेट, (सिविल मामलों के जानकार)
वकील दोषी नहीं
मुकदमों के निस्तारण में देरी की वजह फर्जी मुकदमों की बहुलता, पक्षकारों की शिथिलता, विभिन्न कार्यों का बोझ सहित कई अन्य कारण हैं। कोटा सिस्टम के कारण न्यायिक अधिकारी कई मुकदमों पर ध्यान नहीं देते। वकील कहां दोषी है। वकील लापरवाह होगा तो पक्षकार वकील दूसरा नियुक्त कर लेगा।
- परमानंद सिंह, एडवोकेट, (फौजदारी मामलों के जानकार)
40 अदालतें, डेढ़ लाख मुकदमे
सिविल कोर्ट गोरखपुर में न्यायिक अधिकारियों के 52 पदों में से 12 रिक्त हैं, केवल 40 अदालतें कार्यरत हैं। जबकि तकरीबन एक लाख से अधिक आपराधिक मामले और 45 हजार से अधिक सिविल मामले लंबित हैं। इसके अलावा अन्य मामले भी बड़ी संख्या में हैं जिसकी सुनवाई प्रतिदिन होती है। इसमें पुलिस के रिपोर्ट न भेजने से अदालतों का समय बर्बाद होता है।
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हरेक की है जिम्मेदारी
न्याय निर्णयन में देरी के जिम्मेदार सभी हैं। जिसकी जितनी जिम्मेदारी है देरी में भागीदारी भी उसकी उतनी ही है। अभियोजन पक्ष जहां पचास फीसदी जिम्मेदार है वहीं न्यायिक अधिकारी और वकील बराबर के जिम्मेदार हैं। आपराधिक मामलों में पुलिस तेजी से काम नहीं करती आरोप पत्र लगाकर भूल जाती है। पुलिस समय से रिपोर्ट न भेजकर अदालत का समय बरबाद करती है। विवेचना और अदालती कार्यवाही के लिए पुलिस विभाग में अलग सेल होना चाहिए।
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- शंकर शरण त्रिपाठी, एडवोकेट (फौजदारी मामलों के जानकार)
सरकार है जिम्मेदार
राजस्व मामलों के निस्तारण में देरी की प्रमुख वजह सरकार है। कमिश्नरी के चार जिलों के मामलों को देखने के लिए चार अपर आयुक्त हैं। वर्तमान समय में चारों न्यायालय रिक्त चल रहे हैं। अधिकारियों पर प्रशासनिक कार्यों का दायित्व ज्यादा होता है, वे न्यायिक कार्य नहीं कर पाते। अलग राजस्व न्यायालयों की मांग पुरानी है सरकार इस दिशा में कोई कार्य नहीं कर रही है। देरी में वकील का कोई दोष नहीं होता। वकील कब चाहता है कि उसका मामला लटके।
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- निकेत नारायन सेवक पांडेय, एडवोकेट (अध्यक्ष कमिश्नर्स कोर्ट बार एसोसिएशन)
पक्षकार के साथ प्रक्रिया भी दोषी
सिविल मामलों में न्यायिक प्रक्रिया ही जटिल है। इसी वजह से मुकदमों के निस्तारण में देरी होती है। सिविल मुकदमाें को पक्षकार ही ज्यादा लंबा चलाना चाहते हैं। वकील भी जिम्मेदार हैं, लेकिन उतना ही जितना न्यायिक अधिकारी। अधिकारी अगर निस्तारण की ठान लेगा तो वकील और पक्षकार कहां भाग पाएंगे।
- महेंद्र नाथ शुक्ल, एडवोकेट, (सिविल मामलों के जानकार)
वकील दोषी नहीं
मुकदमों के निस्तारण में देरी की वजह फर्जी मुकदमों की बहुलता, पक्षकारों की शिथिलता, विभिन्न कार्यों का बोझ सहित कई अन्य कारण हैं। कोटा सिस्टम के कारण न्यायिक अधिकारी कई मुकदमों पर ध्यान नहीं देते। वकील कहां दोषी है। वकील लापरवाह होगा तो पक्षकार वकील दूसरा नियुक्त कर लेगा।
- परमानंद सिंह, एडवोकेट, (फौजदारी मामलों के जानकार)
40 अदालतें, डेढ़ लाख मुकदमे
सिविल कोर्ट गोरखपुर में न्यायिक अधिकारियों के 52 पदों में से 12 रिक्त हैं, केवल 40 अदालतें कार्यरत हैं। जबकि तकरीबन एक लाख से अधिक आपराधिक मामले और 45 हजार से अधिक सिविल मामले लंबित हैं। इसके अलावा अन्य मामले भी बड़ी संख्या में हैं जिसकी सुनवाई प्रतिदिन होती है। इसमें पुलिस के रिपोर्ट न भेजने से अदालतों का समय बर्बाद होता है।