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2007 दंगे के मामले में सुनवाई टली
Gorakhpur
Updated Thu, 23 Oct 2014 05:30 AM IST
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गोरखपुर। सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देकर 2007 दंगे के आरोपियों पर जल्द कार्रवाई के मामले में सोमवार को भी सुनवाई टल गई। हालांकि विलंब होने की वजह से अगली तारीख नहीं पड़ सकी। मंगलवार को इस मामले में अगली तारीख पड़ने की उम्मीद है।
सांसद योगी आदित्यनाथ समेत नौ आरोपियों के मामले में
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में आदेश दिया था कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा आठ के तहत ऐसे सीटिंग एमपी-एमएलए जिनपर आरोप तय हो गया है, उन मामलों में साल भर के भीतर कार्रवाई की जाए। इसी का हवाला देते हुए अभियोजन पक्ष ने 2007 दंगे के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार जल्द कार्रवाई के लिए सिविल कोर्ट में प्रार्थना पत्र दिया था। इस मामले में सांसद योगी आदित्यनाथ समेत नौ लोग आरोपी हैं। दंगे के आरोपियों की तरफ से उनके अधिवक्ता अशोक शुक्ला ने एक आपत्ति दाखिल की थी, जिसमें कहा गया था कि उनके मुवक्किल के मामले मेें अभी आरोप तय नहीं हुआ है। लिहाजा इस मामले में सामान्य प्रक्रिया के तहत सुनवाई हो। 13 अक्टूबर को इस आपत्ति पर न्यायिक दंडाधिकारी द्वितीय के कोर्ट में सुनवाई होनी थी लेकिन एक अधिवक्ता के निधन पर सुनवाई नहीं हो सकी और 20 अक्टूबर को अगली तारीख पड़ गई।
20 अक्टूबर को अभियोजन के मौजूद नहीं होने की वजह से उनकी जगह दूसरे सरकारी वकील उपस्थित हुए लेकिन उन्होंने अपील की कि चूंकि मामले को दूसरे सरकारी वकील देख रहे हैं लिहाजा बेहतर होगा कि उनकी मौजूदगी में ही सुनवाई हो। उनके इस अनुरोध सुनवाई टाल दी गई।
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सांसद योगी आदित्यनाथ समेत नौ आरोपियों के मामले में
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में आदेश दिया था कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा आठ के तहत ऐसे सीटिंग एमपी-एमएलए जिनपर आरोप तय हो गया है, उन मामलों में साल भर के भीतर कार्रवाई की जाए। इसी का हवाला देते हुए अभियोजन पक्ष ने 2007 दंगे के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार जल्द कार्रवाई के लिए सिविल कोर्ट में प्रार्थना पत्र दिया था। इस मामले में सांसद योगी आदित्यनाथ समेत नौ लोग आरोपी हैं। दंगे के आरोपियों की तरफ से उनके अधिवक्ता अशोक शुक्ला ने एक आपत्ति दाखिल की थी, जिसमें कहा गया था कि उनके मुवक्किल के मामले मेें अभी आरोप तय नहीं हुआ है। लिहाजा इस मामले में सामान्य प्रक्रिया के तहत सुनवाई हो। 13 अक्टूबर को इस आपत्ति पर न्यायिक दंडाधिकारी द्वितीय के कोर्ट में सुनवाई होनी थी लेकिन एक अधिवक्ता के निधन पर सुनवाई नहीं हो सकी और 20 अक्टूबर को अगली तारीख पड़ गई।
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20 अक्टूबर को अभियोजन के मौजूद नहीं होने की वजह से उनकी जगह दूसरे सरकारी वकील उपस्थित हुए लेकिन उन्होंने अपील की कि चूंकि मामले को दूसरे सरकारी वकील देख रहे हैं लिहाजा बेहतर होगा कि उनकी मौजूदगी में ही सुनवाई हो। उनके इस अनुरोध सुनवाई टाल दी गई।
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