{"_id":"59af07714f1c1b6a078b47c1","slug":"81504642929-gorakhpur-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"गोरक्षपीठ भारत के धर्म संस्कृति का रक्षक पीठ: तरुण विजय","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गोरक्षपीठ भारत के धर्म संस्कृति का रक्षक पीठ: तरुण विजय
Updated Wed, 06 Sep 2017 01:52 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
गोरखपुर। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि पर आयोजित ‘संस्कृत एवं संस्कृति’ विषय पर आयोजित सम्मेलन में बतौर मुख्य वक्ता प्रतिष्ठित पत्रकार एवं राज्यसभा के पूर्व सांसद तरुण विजय ने कहा कि गोरक्षपीठ भारत के धर्म संस्कृति की रक्षक पीठ है। यह पीठ हमें आनंद मठ का स्मरण दिलाती है। यह पीठ वंदेमातरम् को जीती है। इस पीठ ने भारतीय संस्कृति, भारतीय धर्म और भारतीय भाषाओं की रक्षा के लिए सदैव नेतृत्व किया है। हमारी भाषा, हमारी संस्कृति हमें जीवन जीना सिखाती है। इसलिए संस्कृति को कर्मकांड से उठाकर राजभाषा बनाना होगा।
मंगलवार को संगोष्ठी के दौरान उन्होंने कहा कि संस्कृत को ज्ञान, विज्ञान, दुकान, मकान एवं विधान की भाषा बनानी होगी, तभी भारतीय संस्कृति सुरक्षित होगी और विश्व के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा और संस्कृति के बल पर इजराइल और चीन ने दुनिया में अलग-अलग दृष्टि से अपना महत्व बनाया है। हम ज्ञान, विज्ञान, दर्शन एवं जीवन जीने के श्रेष्ठतम पद्धति के विकास करने वाले पूर्वजों की संतान होकर भी आज स्मृतिहीनता के दौर से गुजर रहे हैं। मुख्य अतिथि स्वामी गोपाल जी ने कहा कि संस्कृत भाषा जीवित होगी तभी भारतीय संस्कृति अक्षुण्य होगी। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ ने कहा था कि संस्कृत भाषा समस्त ज्ञान और विज्ञान का वृहद भंडार है। इस देश के वासी तब तक प्रथम श्रेणी के वैज्ञानिक नहीं बन सकते जब तक कि वे संस्कृत में उपलब्ध प्राचीन भारतीय विज्ञानों का उचित अध्ययन नही कर लेते।
महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् के वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं पूर्व कुलपति प्रो. यूपी सिंह ने कहा कि संस्कृत भारतीय चेतना और सनातन स्रोत की धारा है। सनातन संस्कृत का आधार स्तंभ है। यदि किसी को भारत तथा भारतीयता को समझना है तो संस्कृत की शरण लेनी होगी। विशिष्ट वक्ता प्राचीन इतिहास पुरातत्व एवं संस्कृत विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रो. विपुला दूबे ने कहा कि भारत की आत्मा संस्कृति है और संस्कृति की आत्मा संस्कृत में बसती है। जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामानंददास महाराज ने कहा कि भारत की प्रतिष्ठा दुनिया में दो कारण से है- एक संस्कृति और दूसरी संस्कृत। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. शिवाजी सिंह ने कहा कि संस्कृत भारतीय संस्कृति की मूल है। भारत की राष्ट्रवादी जनता ही संस्कृत भाषा और संस्कृति की रक्षा कर सकती है। समारोह का शुभारंभ दोनों ब्रह्मलीन महाराज जी को पुष्पांजलि, वैदिक मंगलाचरण एवं गोरक्षाष्टक पाठ के साथ हुआ। महाराणा प्रताप इंटर कॉलेज और महाराणा प्रताप बालिका इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्यों एवं दोनों संस्थाओं के शिक्षकों ने माल्यार्पण के साथ अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अविनाश प्रताप सिंह ने किया।
मंगलवार को संगोष्ठी के दौरान उन्होंने कहा कि संस्कृत को ज्ञान, विज्ञान, दुकान, मकान एवं विधान की भाषा बनानी होगी, तभी भारतीय संस्कृति सुरक्षित होगी और विश्व के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा और संस्कृति के बल पर इजराइल और चीन ने दुनिया में अलग-अलग दृष्टि से अपना महत्व बनाया है। हम ज्ञान, विज्ञान, दर्शन एवं जीवन जीने के श्रेष्ठतम पद्धति के विकास करने वाले पूर्वजों की संतान होकर भी आज स्मृतिहीनता के दौर से गुजर रहे हैं। मुख्य अतिथि स्वामी गोपाल जी ने कहा कि संस्कृत भाषा जीवित होगी तभी भारतीय संस्कृति अक्षुण्य होगी। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ ने कहा था कि संस्कृत भाषा समस्त ज्ञान और विज्ञान का वृहद भंडार है। इस देश के वासी तब तक प्रथम श्रेणी के वैज्ञानिक नहीं बन सकते जब तक कि वे संस्कृत में उपलब्ध प्राचीन भारतीय विज्ञानों का उचित अध्ययन नही कर लेते।
विज्ञापन
महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् के वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं पूर्व कुलपति प्रो. यूपी सिंह ने कहा कि संस्कृत भारतीय चेतना और सनातन स्रोत की धारा है। सनातन संस्कृत का आधार स्तंभ है। यदि किसी को भारत तथा भारतीयता को समझना है तो संस्कृत की शरण लेनी होगी। विशिष्ट वक्ता प्राचीन इतिहास पुरातत्व एवं संस्कृत विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रो. विपुला दूबे ने कहा कि भारत की आत्मा संस्कृति है और संस्कृति की आत्मा संस्कृत में बसती है। जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामानंददास महाराज ने कहा कि भारत की प्रतिष्ठा दुनिया में दो कारण से है- एक संस्कृति और दूसरी संस्कृत। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. शिवाजी सिंह ने कहा कि संस्कृत भारतीय संस्कृति की मूल है। भारत की राष्ट्रवादी जनता ही संस्कृत भाषा और संस्कृति की रक्षा कर सकती है। समारोह का शुभारंभ दोनों ब्रह्मलीन महाराज जी को पुष्पांजलि, वैदिक मंगलाचरण एवं गोरक्षाष्टक पाठ के साथ हुआ। महाराणा प्रताप इंटर कॉलेज और महाराणा प्रताप बालिका इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्यों एवं दोनों संस्थाओं के शिक्षकों ने माल्यार्पण के साथ अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अविनाश प्रताप सिंह ने किया।
विज्ञापन