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पूर्वांचल में प्रीमेच्योर डिलीवरी शिशु सुरक्षा पर खतरा

Tue, 07 Nov 2017 01:31 AM IST
आशुतोष मिश्र, अमर उजाला, गोरखपुर।
आशुतोष मिश्र, अमर उजाला, गोरखपुर। Updated Tue, 07 Nov 2017 01:31 AM IST
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पूर्वांचल में प्रीमेच्योर डिलिवरी शिशु सुरक्षा पर खतरा
mother child
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के नेहरू अस्पताल के बालरोग विभाग की नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में होने वाली ज्यादातर मौतों में डॉक्टर प्रीमेच्योर डिलीवरी को अहम कारण यूं ही नहीं बताते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के नेशनल हेल्थ सर्वे में भी प्रीमेच्योर डिलीवरी के चलते प्रदेश की स्थिति बदतर मान रहा है। बालरोग विशेषज्ञ इसे पूर्वांचल में शिशु सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बता रहे हैं।
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बालरोग चिकित्सकों की संस्था इंडियन एकेडमी पीडियाट्रिक्स के गोरखपुर के सचिव डॉ. डीके भगवानी कहते हैं कि प्रीमेच्योर डिलीवरी और नवजात की मौतों के कई कारण हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी बेहतर नहीं हैं। गर्भवती घर के साथ खेतों में भी काम करती हैं, लेकिन उन्हें उचित पोषण नहीं मिल पाता। मां बनने से पहले वह कुपोषित हो जाती हैं। इससे प्रीमेच्योर डिलीवरी होती है। बच्चा लो बर्थ वेट वाला होता है। 60 से 70 फीसदी डिलीवरी सरकारी अस्पतालों में हो रही है, लेकिन यहां ट्रेंड गायनोलॉजिस्ट और पीडियाट्रिशियन के अभाव में ऐसे नवजात बचाए नहीं जा पाते। जन्म के बाद कई बार दूर से लाते वक्त प्रीमेच्योर बच्चे संक्रमण का शिकार हो जाते हैं। इससे अस्पताल आने के बाद भी उनकी जान बचानी कठिन हो जाती है।
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यूपी में 1000 नवजातों में 64 तोड़ रहे दम
बीते एक दशक में यूपी ने प्रीमेच्योर डेथ रेट थोड़ा सुधारा है, लेकिन अब भी इसकी स्थित कई गरीब अफ्रीकी देशों जैसी है। नेशनल हेल्थ सर्वे 2006 के आंकड़ों में जहां जीवित पैदा हुए हजार नवजातों में 73 बच्चे प्रीमेच्योर डिलीवरी से दम तोड़ देते थे वहीं 2016 में यह आंकड़ा थोड़ा सुधरकर 64 मौत हो गया है। वहीं गोरखपुर की बात करें तो 2016 में यूपी फैक्ट शीट के आंकड़ों में यहां प्रति 1000 प्रीमेच्योर बच्चों में 105 की मौत बताई गई थी।
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मौतें ज्यादा, खर्च भी कम
नवजात की सेहत पर खर्च किया जाने वाला बजट भी यूपी में कम है। नेशनल हेल्थ सर्वे के आंकड़ों में प्रदेश के प्रति प्रीमेच्योर बच्चे पर 452 रुपये खर्च होते हैं। यह रकम इस मद में देश की औसत से 70 फीसदी कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि हमें और बजट खर्च कर गर्भवती के बेहतर पोषण समेत नवजातों के इलाज के उच्च स्तरीय संसाधन जुटाने पर काम करना होगा।


100 प्रतिशत बर्थ अस्पताल में हो
डॉ. डीके भगवानी कहते हैं कि स्थिति में सुधार के लिए जागरूकता की भी बड़ी जरूरत है। कोशिश होनी चाहिए कि 100 फीसदी बच्चों का जन्म अस्पताल में ही हो। इससे काफी हद तक गंभीर नवजातों की जान बचाना संभव होगा। समय पर उन्हें प्राथमिक इलाज मयस्सर होगा और संक्रमण या अन्य खतरों से उन्हें महफूज किया जा सकेगा।
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