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रसूल हम तेरे प्यारों का गम मनाते हैं...
अमर उजाला/गाोरख्ापुर
Updated Sun, 16 Sep 2018 11:18 PM IST
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खूनीपुर से निकले पांचवीं मुहर्रम के मातमी जुलूस को देख नम हुई आंखें
- फोटो : amar ujala
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गोरखपुर। अंजुमन हैदरी हल्लौर का पांचवी मुहर्रम का मातमी जुलूस रविवार रात को खूनीपुर से अपनी पुरानी रवायत के साथ निकला। ‘रसूल हम तेरे प्यारों का गम मनाते हैं, हर एक हाल में फर्शे अजा सजाते हैं’ नफीस हल्लौरी के इसी नौहे पर मातम करते हुए जुलूस खूनीपुर चौक पहुंचा। लोग सड़कों, गलियों और छतों पर जमा रहे। कस्बा हल्लौर से आए तमाम लोगों के जंजीरी और कमां (छोटी तलवार) के मातम देख कर अकीदतमंदों की आंखें नम हो गईं। इस दौरान हर तरफ या हुसैन, या हुसैन की सदा गूंजती रही। इससे पहले महिलाओं ने मजलिस व मातम किया।
जुलूस अंजुमन इस्लामिया से नखास चौक, रेती चौक होते हुए गीताप्रेस रोड स्थित इमामबाड़ा आगा साहेबान में पहुंचा। यहां हल्लौर एसोसिएशन की जानिब से मजलिस हुई। जुलूस के समापन पर एसोसिएशन के अध्यक्ष इंजी. कैसर रिजवी ने सभी धन्यवाद दिया। जुलूस में राशिद रिजवी, आसिफ रिजवी, आरिफ रिजवी, जव्वाद, मोजिजा, अरमान हैदर, मोहम्मद रिजवी, जौन, सुहेल, रिजवान, सुलतान, तनवीर, अहमद, दिलशाद, एडवोकेट एवं कमाल असगर का विशेष सहयोग रहा।
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जुलूस अंजुमन इस्लामिया से नखास चौक, रेती चौक होते हुए गीताप्रेस रोड स्थित इमामबाड़ा आगा साहेबान में पहुंचा। यहां हल्लौर एसोसिएशन की जानिब से मजलिस हुई। जुलूस के समापन पर एसोसिएशन के अध्यक्ष इंजी. कैसर रिजवी ने सभी धन्यवाद दिया। जुलूस में राशिद रिजवी, आसिफ रिजवी, आरिफ रिजवी, जव्वाद, मोजिजा, अरमान हैदर, मोहम्मद रिजवी, जौन, सुहेल, रिजवान, सुलतान, तनवीर, अहमद, दिलशाद, एडवोकेट एवं कमाल असगर का विशेष सहयोग रहा।
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‘इस्लाम की सीख, इंसानियत से बढ़कर कुछ नहीं’
गोरखपुर। इतिहास गवाह है कि जालिम यजीद सारे जुल्म करने के बाद भी अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सका और हार गया लेकिन इमाम हुसैन जान दे के भी जीत गए क्योंकि वह जुल्म के आगे नहीं झुके। इस्लाम अमन का मजहब है जो यह सिखाता है कि इंसानियत से बढ़कर कुछ भी नहीं। ये बातें नफ ीस रिजवी एडवोकेट ने पांचवी मुहर्रम को खूनीपुर से निकलने वाले मातमी जुलूस की मजलिस में कही। उन्होंने कहा कि दुनिया के सारे कैलेंडर नए साल के साथ खुशियों का पैगाम लेकर आते हैं लेकिन सिर्फ एक इस्लामी कैलेंडर ऐसा है जो नए साल के साथ गम का पैगाम लेकर आता है। आज से तकरीबन 1400 साल पहले 61 हिजरी के मुहर्रम महीने में पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन को उनके 72 साथियों के साथ बेदर्दी से करबला में जालिम यजीदी फ ौज द्वारा शहीद कर दिया था। मुहर्रम में उसी शहादत की याद मनाने का महीना है। नफ ीस रिजवी ने कहा कि जब कभी हम दुनिया में आतंकवाद, भ्रष्टाचार और जुल्म देखें और अपने आप को अकेला महसूस करें तो कर्बला के पैगाम को याद करें।
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