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खिलाफत से ही युवाओं ने देश आजाद कराने की पकड़ ली थी जिद
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गोंडा। वैसे तो स्वतंत्रता आंदोलन की नींव जिले में 1857 को ही पड़ गई थी। जब अंग्रेज शासन के दमन कारी नीति के खिलाफ लोगों ने आवाज उठाई थी। लोगों ने देश की रक्षा की खातिर अपने प्राणों की आहुतियां दीं। राजा देवी बख्श सिंह 1857 की क्रांति के नायकों में थे। लेकिन जब गोंडा सहित आसपास के जिलों में अंग्रेजों की हुकूमत हो गई तो देश को आजाद कराने के लिए युवाओं के बांह फड़कने लगी थी। 1857 की क्रांति विफल हो जाने के बाद अंग्रेजी राज्य के खिलाफ हर तरफ आक्रोश उभरकर सामने आ रहा था।
साहित्यकार व इतिहासकार डॉ. श्री नरायन तिवारी कहते हैं कि 1907 में गोंडा में भयंकर अकाल पड़ा था उस समय की अंग्रेज सरकार इसको लेकर उदासीन थी। तब लाला लाजपत राय गोंडा आए और बाबू श्याम शरण के यहां रुककर राजनीतिक चेतना की शुरुआत की। यही समय था जब गोंडा में कांग्रेस की शुरुआत हुई। लेकिन जलियांवाला कांड व रोलेट ऐक्ट के खिलाफ गांधी ने खिलाफत आंदोलन शुरू किया। इसमें गोंडा के मिर्जा महमूद अली वेग, रजीउद्दीन, मोहम्मद नसीर खां, मौलवी अहमद जमां और मास्टर घासीराम ने शिरकत किया। इस आंदोलन में भाग लेने के लिए गुलाम हैदरशाह ने दारोगा व परागदास भार्गव ने आबकारी की नौकरी छोड़ दी। आजादी पाने की फड़फड़ाहट उस समय और बढ़ गई जब काकोरी कांड के आरोप में राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को 17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में फांसी दे दी गई। यह फांसी 18 दिसंबर को मुकर्रर थी।
1928 में साइमन कमीशन के विरोध में गोंडा से बाबू ईश्वर शरण व लाल विहारी टंडन लखनऊ गए थे। युवाओं में आजादी की ललक देखकर 1929 में गांधी जी गोंडा आए और नगर के चौक स्थित प्रेम पकड़िया मैदान पर आंदोलनकारियों ने गांधी जी को छह हजार रुपये की थैली व आभूषण भेंट किए। प्रेम पकड़िया मैदान में ही 1930 को नमक सत्याग्रह में भाग ले रहे कामता व मालिकराम पकड़े गए और बलरामपुर से आठ लोग पकड़ कर जेल भेजे गए। 1930 में ही लखनऊ में एक आंदोलन में भाग लेने जा रहे गोंडा के बभनजोत विकास खंड से कमला प्रसाद शुक्ल, हरिहर प्रसाद वर्मा, बाबा रामखेलावन दास, रेहरा विकासखंड के पंडित वंशीधर मिश्र, वेणीधर मिश्र, उदयी सिंह, राजाराम, रोहिणी प्रसाद वर्मा, रामदुलारे, राजेश्वर सिंह, रामसमुझ सिंह, वंशराज सिंह, गया प्रसाद पांडेय तथा मनकापुर से राजा राघवेंद्र प्रताप सिंह, कुड़ासन से रघुपति शर्मा, बेलसर से सरजू सिंह, अनिरुद्ध सिंह, व रघुराज सिंह प्रमुख रूप से शामिल रहे।
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मैंने यूनियन का झंडा नहीं जलाया बल्कि तिरंगा फहराया है
जिले के तरबगंज तहसील के भानु प्रताप तिवारी को झंडेवाला पार्क लखनऊ में यूनियन का झंडा जलाने के आरोप में पकड़ा गया। पेशी हुई तो मजिस्ट्रेट ने तिवारी से पूछा कि क्या आपने झंडेवाला पार्क में यूनियन का झंडा जलाया है तो तिवारी ने कहा कि मैने झंडेवाला पार्क लखनऊ में यूनियन का झंडा जलाने का प्रयास की नहीं, बल्कि यूनियन जैक उतारकर उस पर तिरंगा फहराया है। इस पर मजिस्ट्रेट ने उन्हें छह माह की सजा सुनाई। भानु प्रताप तिवारी ऐसे सेनानी हैं जिन्हें बहुत कम लोग ही जानते हैं। वह 1941 में छह माह तथा 1942 में 13 माह तक जेल में रहे।
इन रणबांकुरों ने भी आजादी के आंदोलन में डाली हैं आहुतियां
गोंडा के गांधी कहे जाने वाले बाबू ईश्वर शरण, लाल विहारी टंडन, अयोध्या प्रसाद, अर्जुन प्रसाद, अवधराज सिंह, सोहरत सिंह, सकटू, हर प्रसाद श्रीवास्तव, अयोध्या हलवाई, ओम प्रकाश, काली प्रसाद, गया प्रसाद, गया प्रसाद आजाद, गल्लू सिंह, गुरुप्रसाद, गोपीनाथ तिवारी,गौरी शंकर, चंद्रभान शरण सिंह, नंदलाल, नानक प्रसाद वर्मा, बद्री प्रसाद, बदली सिंह, बाबू राम तिवारी, वृक्षराज पांडेय, बृजनंदन ब्रह्मचारी, भगवती प्रसाद पांडेय, भभूती, महादेव मिश्र, माता प्रसाद, रखेले, रमाकांत शुक्ल, राजाराम सिंह, राम उजागर मिश्र, रामनरेश तिवारी, रामनिहोर तिवारी, राम पियारे, रामफल, रामफेर मिश्र, राम मिलन शुक्ल, यज्ञराम त्रिपाठी, रामसिंह, श्रीराम, संत बहादुर, सूरज नारायण शुक्ल, सूरत सिंह सहित तमाम युवाओं ने 1930 के नमक सत्याग्रह से देश की आजादी तक आंदोलन की मुख्यधारा से जुड़े रहे।
परिवार से बेदखल होने के बावजूद आंदोलन से नहीं डिगे गुरु प्रसाद गुप्ता
देश की आजादी के लिए अपना जीवन उत्सर्ग करने वाले नेताओं की स्मृति को सुरक्षित करने के लिए कोई सार्थक कदम न उठाए जाने से नई पीढ़ी सेनानियों को भूल रही है। जनपद के स्वतन्त्रता सेनानियों में गुरुप्रसाद गुप्ता ऐसे ही प्रमुख सेनानी थे जिन्होंने परिवार की करोड़ों की संपत्ति से बेदखल होने के बावजूद स्वतंत्रता आंदोलन से मुंह नहीं मोड़ा। सेनानी गुरु प्रसाद गुप्ता का जन्म 19 अगस्त 1919 कृष्ण जन्माष्टमी के दिन नगर के गोलागंज मुहल्ले में एक प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार में हुआ। पिता रामेश्वर गुप्ता लोहिया धर्मशाला के संस्थापक व नगर सेठ के नाम से विख्यात थे। बचपन से ही देश प्रेम के जज्बे से कविता और साहित्य की रचना करने लगे। गांधी और सुभाष से प्रभावित गुरु प्रसाद आजादी के हर छोटे-बड़े आंदोलन में ं अग्रणी नेता के रूप में भाग लेते रहे। अंग्रेज सरकार के रिकार्ड में दर्ज खतरनाक नेता के रूप में उन्हें 11 दिसंबर 1940 को डीआईआर में गिरफ्तार किया गया।
अदालत से उन्हें नौ माह का कठोर कारावास व पचास रुपये जुर्माना की सजा मिली। जुर्माना न अदा करने पर उन्हें गोंडा कारागार में चार माह अतिरिक्त कारावास झेलना पड़ा। सजा के दौरान ही पिता ने उन्हें अपनी चल अचल संपत्ति से बेदखल कर दिया। जेल से छूटने के बाद उन्हें सक्रिय राजनीति और पारिवारिक जीवन में सामंजस्य स्थापित करने के लिए घोर संघर्ष करना पड़ा। जीविका के लिए घर छोड़कर वाराणसी में अखबार बेंचना पड़ा। आजादी के बाद वे वहीं साइकिल की घंटी बनाने वाली एक फैक्ट्री में नौकरी भी की। जादी की रजत जयंती पर 1972 में स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने पेंशन देने की घोषणा की लेकिन घोर आर्थिक संकट के बावजूद उन्होंने पेंशन फार्म नहीं भरा और 1980 में सेनानी सम्मान पेंशन घोषित होने पर भी पत्रकारिता में सक्रिय मंझले पुत्र अजय गुप्ता के अनुरोध पर स्पष्ट लहजे में कहा कि आजादी की लड़ाई में उन्होंने इसलिए नहीं भाग लिया था कि आजादी मिलने पर वह आर्थिक लाभ मिलेगा। उन्होंने उसी समय फार्म भी फाड़ दिया।
2 जुलाई 1982 को अंग्रेजों से अनवरत लडने वाले इस योद्धा का निधन हो गया। आजादी की लड़ाई में अपनी धन सम्पत्ति से लेकर सुख चैन गंवाने वाले सेनानी गुरु प्रसाद के तीनों पुत्रों में किसी के पास अपना मकान नहीं है। दो पुत्र वाराणसी में और एक गोण्डा में किराए के मकान में रहते हैं। ऐसे समर्पित सेनानी की यादगार में नगर में उनकी प्रतिमा स्थापित करने की मांग वर्षों से लालफीताशाही के कारण साकार नही हो सकी।
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साहित्यकार व इतिहासकार डॉ. श्री नरायन तिवारी कहते हैं कि 1907 में गोंडा में भयंकर अकाल पड़ा था उस समय की अंग्रेज सरकार इसको लेकर उदासीन थी। तब लाला लाजपत राय गोंडा आए और बाबू श्याम शरण के यहां रुककर राजनीतिक चेतना की शुरुआत की। यही समय था जब गोंडा में कांग्रेस की शुरुआत हुई। लेकिन जलियांवाला कांड व रोलेट ऐक्ट के खिलाफ गांधी ने खिलाफत आंदोलन शुरू किया। इसमें गोंडा के मिर्जा महमूद अली वेग, रजीउद्दीन, मोहम्मद नसीर खां, मौलवी अहमद जमां और मास्टर घासीराम ने शिरकत किया। इस आंदोलन में भाग लेने के लिए गुलाम हैदरशाह ने दारोगा व परागदास भार्गव ने आबकारी की नौकरी छोड़ दी। आजादी पाने की फड़फड़ाहट उस समय और बढ़ गई जब काकोरी कांड के आरोप में राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को 17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में फांसी दे दी गई। यह फांसी 18 दिसंबर को मुकर्रर थी।
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1928 में साइमन कमीशन के विरोध में गोंडा से बाबू ईश्वर शरण व लाल विहारी टंडन लखनऊ गए थे। युवाओं में आजादी की ललक देखकर 1929 में गांधी जी गोंडा आए और नगर के चौक स्थित प्रेम पकड़िया मैदान पर आंदोलनकारियों ने गांधी जी को छह हजार रुपये की थैली व आभूषण भेंट किए। प्रेम पकड़िया मैदान में ही 1930 को नमक सत्याग्रह में भाग ले रहे कामता व मालिकराम पकड़े गए और बलरामपुर से आठ लोग पकड़ कर जेल भेजे गए। 1930 में ही लखनऊ में एक आंदोलन में भाग लेने जा रहे गोंडा के बभनजोत विकास खंड से कमला प्रसाद शुक्ल, हरिहर प्रसाद वर्मा, बाबा रामखेलावन दास, रेहरा विकासखंड के पंडित वंशीधर मिश्र, वेणीधर मिश्र, उदयी सिंह, राजाराम, रोहिणी प्रसाद वर्मा, रामदुलारे, राजेश्वर सिंह, रामसमुझ सिंह, वंशराज सिंह, गया प्रसाद पांडेय तथा मनकापुर से राजा राघवेंद्र प्रताप सिंह, कुड़ासन से रघुपति शर्मा, बेलसर से सरजू सिंह, अनिरुद्ध सिंह, व रघुराज सिंह प्रमुख रूप से शामिल रहे।
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जिले के तरबगंज तहसील के भानु प्रताप तिवारी को झंडेवाला पार्क लखनऊ में यूनियन का झंडा जलाने के आरोप में पकड़ा गया। पेशी हुई तो मजिस्ट्रेट ने तिवारी से पूछा कि क्या आपने झंडेवाला पार्क में यूनियन का झंडा जलाया है तो तिवारी ने कहा कि मैने झंडेवाला पार्क लखनऊ में यूनियन का झंडा जलाने का प्रयास की नहीं, बल्कि यूनियन जैक उतारकर उस पर तिरंगा फहराया है। इस पर मजिस्ट्रेट ने उन्हें छह माह की सजा सुनाई। भानु प्रताप तिवारी ऐसे सेनानी हैं जिन्हें बहुत कम लोग ही जानते हैं। वह 1941 में छह माह तथा 1942 में 13 माह तक जेल में रहे।
इन रणबांकुरों ने भी आजादी के आंदोलन में डाली हैं आहुतियां
गोंडा के गांधी कहे जाने वाले बाबू ईश्वर शरण, लाल विहारी टंडन, अयोध्या प्रसाद, अर्जुन प्रसाद, अवधराज सिंह, सोहरत सिंह, सकटू, हर प्रसाद श्रीवास्तव, अयोध्या हलवाई, ओम प्रकाश, काली प्रसाद, गया प्रसाद, गया प्रसाद आजाद, गल्लू सिंह, गुरुप्रसाद, गोपीनाथ तिवारी,गौरी शंकर, चंद्रभान शरण सिंह, नंदलाल, नानक प्रसाद वर्मा, बद्री प्रसाद, बदली सिंह, बाबू राम तिवारी, वृक्षराज पांडेय, बृजनंदन ब्रह्मचारी, भगवती प्रसाद पांडेय, भभूती, महादेव मिश्र, माता प्रसाद, रखेले, रमाकांत शुक्ल, राजाराम सिंह, राम उजागर मिश्र, रामनरेश तिवारी, रामनिहोर तिवारी, राम पियारे, रामफल, रामफेर मिश्र, राम मिलन शुक्ल, यज्ञराम त्रिपाठी, रामसिंह, श्रीराम, संत बहादुर, सूरज नारायण शुक्ल, सूरत सिंह सहित तमाम युवाओं ने 1930 के नमक सत्याग्रह से देश की आजादी तक आंदोलन की मुख्यधारा से जुड़े रहे।
परिवार से बेदखल होने के बावजूद आंदोलन से नहीं डिगे गुरु प्रसाद गुप्ता
देश की आजादी के लिए अपना जीवन उत्सर्ग करने वाले नेताओं की स्मृति को सुरक्षित करने के लिए कोई सार्थक कदम न उठाए जाने से नई पीढ़ी सेनानियों को भूल रही है। जनपद के स्वतन्त्रता सेनानियों में गुरुप्रसाद गुप्ता ऐसे ही प्रमुख सेनानी थे जिन्होंने परिवार की करोड़ों की संपत्ति से बेदखल होने के बावजूद स्वतंत्रता आंदोलन से मुंह नहीं मोड़ा। सेनानी गुरु प्रसाद गुप्ता का जन्म 19 अगस्त 1919 कृष्ण जन्माष्टमी के दिन नगर के गोलागंज मुहल्ले में एक प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार में हुआ। पिता रामेश्वर गुप्ता लोहिया धर्मशाला के संस्थापक व नगर सेठ के नाम से विख्यात थे। बचपन से ही देश प्रेम के जज्बे से कविता और साहित्य की रचना करने लगे। गांधी और सुभाष से प्रभावित गुरु प्रसाद आजादी के हर छोटे-बड़े आंदोलन में ं अग्रणी नेता के रूप में भाग लेते रहे। अंग्रेज सरकार के रिकार्ड में दर्ज खतरनाक नेता के रूप में उन्हें 11 दिसंबर 1940 को डीआईआर में गिरफ्तार किया गया।
अदालत से उन्हें नौ माह का कठोर कारावास व पचास रुपये जुर्माना की सजा मिली। जुर्माना न अदा करने पर उन्हें गोंडा कारागार में चार माह अतिरिक्त कारावास झेलना पड़ा। सजा के दौरान ही पिता ने उन्हें अपनी चल अचल संपत्ति से बेदखल कर दिया। जेल से छूटने के बाद उन्हें सक्रिय राजनीति और पारिवारिक जीवन में सामंजस्य स्थापित करने के लिए घोर संघर्ष करना पड़ा। जीविका के लिए घर छोड़कर वाराणसी में अखबार बेंचना पड़ा। आजादी के बाद वे वहीं साइकिल की घंटी बनाने वाली एक फैक्ट्री में नौकरी भी की। जादी की रजत जयंती पर 1972 में स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने पेंशन देने की घोषणा की लेकिन घोर आर्थिक संकट के बावजूद उन्होंने पेंशन फार्म नहीं भरा और 1980 में सेनानी सम्मान पेंशन घोषित होने पर भी पत्रकारिता में सक्रिय मंझले पुत्र अजय गुप्ता के अनुरोध पर स्पष्ट लहजे में कहा कि आजादी की लड़ाई में उन्होंने इसलिए नहीं भाग लिया था कि आजादी मिलने पर वह आर्थिक लाभ मिलेगा। उन्होंने उसी समय फार्म भी फाड़ दिया।
2 जुलाई 1982 को अंग्रेजों से अनवरत लडने वाले इस योद्धा का निधन हो गया। आजादी की लड़ाई में अपनी धन सम्पत्ति से लेकर सुख चैन गंवाने वाले सेनानी गुरु प्रसाद के तीनों पुत्रों में किसी के पास अपना मकान नहीं है। दो पुत्र वाराणसी में और एक गोण्डा में किराए के मकान में रहते हैं। ऐसे समर्पित सेनानी की यादगार में नगर में उनकी प्रतिमा स्थापित करने की मांग वर्षों से लालफीताशाही के कारण साकार नही हो सकी।