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बेगम की मदद करने लखनऊ पहुंचे थे गोंडा के राजा देवी बख्श सिंह

Fri, 13 Aug 2021 11:39 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Fri, 13 Aug 2021 11:39 PM IST
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Raja Devi Baksh Singh of Gonda had reached Lucknow to help the Begum.
गोंडा के महाराजा देेवीबक्स सिंह पुस्तकालय में लगी मूर्ति। - फोटो : GONDA
गोंडा। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जब पूरे देश में विद्रोह की चिंगारी फूट रही थी, तभी गोंडा व उससे सटे लखनऊ में भी विद्रोह की ज्वाला धधकने लगी थी। लखनऊ की बेगम हजरत महल अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए अवध क्रांति का नेतृत्व कर रही थीं। उन्होंने मदद के लिए गोंडा के महाराजा देेवी बक्स सिंह को पत्र भेजा जिस पर गोंडा के महाराजा ने लखनऊ की बेगम की मदद करने घाघरा पार पहुुंचे थे।
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5 जुलाई 1857 को बेगम की शाही सेना के कैप्टन गजाधर पांडेय अनुरोध पत्र लेकर राजा के पास आए थे। यह पत्र बहुत ही मार्मिक था। जिसमें उन्होंने अंग्रेजों द्वारा अन्याय पूर्वक छीने गए राज्य, अवध के अवयस्क उत्तराधिकारी व बेघर की गई एक महिला को उसका हक दिलाने के लिए अन्यायी के विरुद्ध कमान संभालने का आग्रह किया था। जिस पर यहां से गोंडा के राजा ने अपनी सेना के साथ पहुंचकर उनका साथ दिया।
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राजा देवी बख्श सिंह गोंडा-बहराइच के प्रधान नाजिम तो थे ही उन्हें बस्ती और बाराबंकी के भी आठ रजवाड़ों को मिलाकर कुल 30 रजवाड़ों के नायक के रूप में क्रांति का संचालन संभालने की जिम्मेदारी दी गई थी। फरवरी 1856 में ब्रिटिश राज्य में अवध का विलय करने के बाद जब कर्नल ब्वायलू यहां पर तैनात होकर आए तो उन्होंने राजा देवी बख्श सिंह के पास मिलने के लिए बुलावा भेजा किंतु वे आने को तैयार नहीं हुए। ब्रिटिश अमलदारी में हुए सरसरी बंदोबस्त में गोंडा के राजा के 400 गांवों में से तीस गांव कम कर दिए गए थे।
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बेगम हजरत महल के आमंत्रण पर गोंडा के राजा अपनी सेना के साथ लखनऊ गए थे। जिसमें करीब तीन हजार सैनिक थे। वहां पर पहुंचकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ जमकर लड़ाई लड़ी। यहां पर अंग्रेजों से हुए कई मुकाबलों के बाद 16 मार्च 1958 को बेगम ने चौलक्खी कोठी छोड़ दी। इसके बाद वह जहां भी ठहरीं, अंग्रेजों ने वहां पर उनका पीछा किया।
लखनऊ व चौकाघाट पर लड़ाई के बाद गोंडा राजा ने बेलवा के समीप अपना कैंप बनाया। यहां पर उन्होंने दो तोपों व 800 सैनिकों के साथ बेलवा को अपने कब्जे में कर लिया। हर मोड़ पर अंग्रेजों से मुकाबला होता रहा। ऐसे में नवंबर के प्रथम सप्ताह में गोंडा क्रांतिकारियों की गतिविधियों का मुख्य केंद्र बन गया। सत्तावन की क्रांति का आरंभ भले ही सिपाही विद्रोह से हुआ था लेकिन इसने जनक्रांति का रूप ले लिया था। कई मोर्चों पर युद्ध होता रहा। 25 नवंबर से 6 दिसंबर तक गोंडा की धरती पर अंग्रेजों और क्रांतिकारियों के बीच घमासान युद्ध हुआ। आखिरकार जनरल होपग्रांट ने विशाल सेना के साथ 25 नवंबर 1858 को घाघरा पार कर राजा गोंडा की फौज को तितर-बितर कर दिया। बावजूद इसके गोंडा राजा ने हार नहीं मानी। (संवाद)
सेना केे साथ भिड़ने निकल पड़ते थे पंचगांव के लड़ाके
महाराजा देवी बक्स सिंह के देशभक्ति के जुनून से प्रभावित होकर शहर से सटे पांच गांवों के युवा दुश्मन से लोहा लेने महाराजा की सेना के साथ निकल लेते थे। शहर से सटे केशवपुर पहड़वा, दत्तनगर विसेन, रुद्रपुरविसेन, जगदीशपुर तथा इमरती विसेन के लड़ाके युवा महाराजा देवी बक्स सिंह की सेना के साथ दुश्मन से लोहा लेने निकल पड़ते थे। माना जाता है कि बेगम हजरत महल की मदद के लिए जब महाराज लखनऊ कूच कर रहे थे तो उनके साथ इन पांच गांवों के सैकड़ों लड़ाके भी निकल पड़े थे।

इन रणबांकुरो ने भी आंदोलन में डाली थी आहुतियां
गोंडा के गांधी कहे जाने वाले बाबू ईश्वर शरण, लाल बिहारी टंडन, अयोध्या प्रसाद, अर्जुन प्रसाद, अवधराज सिंह, सोहरत सिंह, सकटू, हर प्रसाद श्रीवास्तव, अयोध्या हलवाई, ओम प्रकाश, काली प्रसाद, गया प्रसाद आजाद, गल्लू सिंह, गुरु प्रसाद, गोपीनाथ तिवारी, गौरी शंकर, चंद्रभान शरण सिंह, नंदलाल, नानक प्रसाद वर्मा, बद्री प्रसाद, बदली सिंह, बाबूराम तिवारी, वृक्षराज पांडेय, बृजनंदन ब्रह्मचारी, भगवती प्रसाद पांडेय, भभूति, महादेव मिश्र, माता प्रसाद, रखेले, रमाकांत शुक्ल, राजाराम सिंह, राम उजागर मिश्र, रामनरेश तिवारी, रामनिहोर तिवारी, राम प्यारे, रामफल, रामफेर मिश्र, राममिलन शुक्ल, यज्ञराम तिवारी, श्रीराम सिंह, श्रीराम, संत बहादुर, सूरज नारायण शुक्ल, सूरज सिंह सहित तमाम युवाओं ने देश की आजादी में अपना सक्रिय योगदान दिया।
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