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Gonda News: भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की कृपा से मिलता है ‘अक्षय-फल’
Fri, 21 Apr 2023 11:07 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
Updated Fri, 21 Apr 2023 11:07 PM IST
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गोंडा। अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की पूजा से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। अक्षय तृतीया का शास्त्रों व पुराणों में भी उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि इस दिन त्रेतायुग की शुरुआत हुई थी। महाभारत में भी अक्षय तृतीया की विशिष्ट तिथि का उल्लेख है।
महाभारत में बताया गया है कि इस दिन दुर्वासा ऋषि ने द्रौपदी को अक्षय पात्र दिया था। जब पांडवों को 13 वर्ष के लिए वन में जाना पड़ा तो उनके वनवास के समय में दुर्वासा ऋषि उनकी कुटिया में आए। ऐसे में सभी पांडव व द्रोपदी ने कुटिया में जो कुछ भी रखा था, उससे उनका आदर-सत्कार किया। दुर्वासा ऋषि उनके इस अतिथि सत्कार से प्रसन्न हुए व द्रौपदी को अक्षय पात्र उपहार में दिया। साथ ही कहा कि इस दिन जो व्यक्ति भक्तिभाव से भगवान विष्णु जी की पूजा करेगा व निर्धन को दान देगा, उसे अक्षय फल की प्राप्ति होगी। इस दिन भगवान विष्णु को नैवेद्य में जौ या गेहूं का सत्तू, ककड़ी व चने की दाल अर्पित की जाती है।
शहर के राजा मोहल्ला निवासी आचार्य राहुल देव त्रिपाठी के मुुताबिक इस दिन सोने की बनी सामग्री व अचल संपत्ति खरीदने का विशेष महत्व है। समुद्र मंथन में इसी दिन लक्ष्मी जी की उत्पत्ति हुई थी। इस दिन कुमारी लक्ष्मी का पूजन विशेष फल दायक है। यह युगादि तिथि है। इस दिन पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। अक्षय तृतीया भगवान वाराह व नृसिंह का चंदन उत्सव होता है। माना जाता है कि भगवान के निज रूप के दर्शन आज ही होते हैं। भगवान के वाराह व नृसिंह दोनों ही अवतार के दर्शन इस एक ही विग्रह में होते हैं। अयोध्या के राम लला निवास मंदिर के रामलखन शरण जी महाराज के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ काल में संत कुमारों द्वारा जय व विजय को दिए गए श्राप से इन्हें तीन बार इस धरा पर दैत्य बनकर आना पड़ा।
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सतयुग के प्रथम चरण में हिरणाकश्यप व हिरण्याक्ष को मारने के लिए भगवान को नृसिंह का अवतार लेना पड़ा। त्रेता युग में भगवान राम ने रावण व कुंभकर्ण का वध किया। जबकि द्वापर में भगवान श्री कृष्ण ने शिशुपाल व दंतवक्र का वध कर इन्हें श्राप से मुक्ति दिलाई। मान्यता है कि अक्षय तृतीया के ही दिन मां गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था। मां अन्नपूर्णा का जन्म भी अक्षय तृतीया को हुआ था। द्रौपदी को चीरहरण से इसी दिन कृष्ण ने बचाया था। कृष्ण और सुदामा का मिलन भी आज के ही दिन हुआ था। कुबेर को आज के ही दिन खजाना मिला था। सतयुग की समाप्ति व त्रेता युग का प्रारंभ भी आज के ही दिन हुआ था। ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज के ही दिन हुआ था। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनाथ जी का कपाट भी आज के ही दिन खोला जाता है। वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में वर्ष में केवल आज ही के दिन श्रीविग्रह चरण के दर्शन होते हैं अन्यथा वर्ष भर वो वस्त्र से ढंके रहते हैं। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था। अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। इस दिन किसी भी शुभ कार्य को प्रारंभ किया जा सकता है।
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महाभारत में बताया गया है कि इस दिन दुर्वासा ऋषि ने द्रौपदी को अक्षय पात्र दिया था। जब पांडवों को 13 वर्ष के लिए वन में जाना पड़ा तो उनके वनवास के समय में दुर्वासा ऋषि उनकी कुटिया में आए। ऐसे में सभी पांडव व द्रोपदी ने कुटिया में जो कुछ भी रखा था, उससे उनका आदर-सत्कार किया। दुर्वासा ऋषि उनके इस अतिथि सत्कार से प्रसन्न हुए व द्रौपदी को अक्षय पात्र उपहार में दिया। साथ ही कहा कि इस दिन जो व्यक्ति भक्तिभाव से भगवान विष्णु जी की पूजा करेगा व निर्धन को दान देगा, उसे अक्षय फल की प्राप्ति होगी। इस दिन भगवान विष्णु को नैवेद्य में जौ या गेहूं का सत्तू, ककड़ी व चने की दाल अर्पित की जाती है।
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शहर के राजा मोहल्ला निवासी आचार्य राहुल देव त्रिपाठी के मुुताबिक इस दिन सोने की बनी सामग्री व अचल संपत्ति खरीदने का विशेष महत्व है। समुद्र मंथन में इसी दिन लक्ष्मी जी की उत्पत्ति हुई थी। इस दिन कुमारी लक्ष्मी का पूजन विशेष फल दायक है। यह युगादि तिथि है। इस दिन पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। अक्षय तृतीया भगवान वाराह व नृसिंह का चंदन उत्सव होता है। माना जाता है कि भगवान के निज रूप के दर्शन आज ही होते हैं। भगवान के वाराह व नृसिंह दोनों ही अवतार के दर्शन इस एक ही विग्रह में होते हैं। अयोध्या के राम लला निवास मंदिर के रामलखन शरण जी महाराज के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ काल में संत कुमारों द्वारा जय व विजय को दिए गए श्राप से इन्हें तीन बार इस धरा पर दैत्य बनकर आना पड़ा।
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सतयुग के प्रथम चरण में हिरणाकश्यप व हिरण्याक्ष को मारने के लिए भगवान को नृसिंह का अवतार लेना पड़ा। त्रेता युग में भगवान राम ने रावण व कुंभकर्ण का वध किया। जबकि द्वापर में भगवान श्री कृष्ण ने शिशुपाल व दंतवक्र का वध कर इन्हें श्राप से मुक्ति दिलाई। मान्यता है कि अक्षय तृतीया के ही दिन मां गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था। मां अन्नपूर्णा का जन्म भी अक्षय तृतीया को हुआ था। द्रौपदी को चीरहरण से इसी दिन कृष्ण ने बचाया था। कृष्ण और सुदामा का मिलन भी आज के ही दिन हुआ था। कुबेर को आज के ही दिन खजाना मिला था। सतयुग की समाप्ति व त्रेता युग का प्रारंभ भी आज के ही दिन हुआ था। ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज के ही दिन हुआ था। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनाथ जी का कपाट भी आज के ही दिन खोला जाता है। वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में वर्ष में केवल आज ही के दिन श्रीविग्रह चरण के दर्शन होते हैं अन्यथा वर्ष भर वो वस्त्र से ढंके रहते हैं। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था। अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। इस दिन किसी भी शुभ कार्य को प्रारंभ किया जा सकता है।