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योग ने बदल दी दिव्यांग मीरा की तकदीर
Updated Thu, 02 Nov 2017 11:34 PM IST
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योग ने बदल दी दिव्यांग मीरा की तकदीर
निशक्तता को मात देकर छात्रा ग्रहण कर रही शिक्षा
फोटो-
उमानाथ तिवारी
गोंडा। जिले के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक ने योग की विधा के जरिए विद्यालय में सातवीं कक्षा में पढने वाली एक दिव्यांग छात्रा की तकदीर बदल दी है। बचपन से दोनों हाथ व पैरों से निशक्त यह छात्रा जो चलने-फिरने से लेकर भोजन तक के लिए दूसरों पर आश्रित थी, अब योग के आसनों की बदौलत न सिर्फ अपने पैरों पर चल रही है बल्कि अपने हाथो से भोजन भी कर रही है। शिक्षक के अथक प्रयास व छात्रा ने अपनी जीवटता के माध्यम से निशक्कतता को मात देकर ‘करो योग रहो निरोग’ के नारे को सच साबित कर दिखाया है। अब वह खुद ही स्कूल भी जाती है और वहां बच्चों के साथ योगभ्यास भी करती है। योग से छात्रा की तकदीर तो बदली ही है उसके गरीब परिवारीजनों के चेहरे पर मुस्कान भी लौट आई है।
झंझरी क्षेत्र के गढ़वलिया गांव के रहने वाले रामरूप बेहद सामान्य परिवार से है। रामरूप की पांच बेटियां व एक बेटा है। एक बेटी मीरा बचपन से निशक्तता का शिकार है। मीरा न तो अपने पैरों पर खड़ी हो सकती थी और न ही अपने हाथों से कोई काम कर सकती थी। इसके अलावा वह बोल व सुन भी नहीं सकती। रामरूप ने अपने सामर्थ्य के मुताबिक उसका इलाज भी कराया लेकिन आर्थिक तंगी आई तो परिवार वालों ने उसे तकदीर का खेल मानकर मौन धारण कर लिया और बेटी का इलाज बंद हो गया। निशक्त मीरा चलने-फिरने से लेकर भोजन करने तक के लिए दूसरे पर आश्रित हो गई। पढ़ने लायक हुई तो उसका नामांकन गांव के प्राथमिक विद्यालय में करा दिया गया। पिछले वर्ष जब वह पांचवी पास कर उच्च प्राथमिक स्कूल में पहुचंी तो वहां तैनात शिक्षक को उसकी हालत देखकर द्रवित हो गए। विद्यालय के प्रधानाध्यापक अफजाल अहमद बताते हैं कि स्कूल के बच्चे जब योग के आसन करते तो मीरा उन्हें बैठकर देखती रहती। एक दिन उन्होंने मीरा को भी योग सिखाने की ठानी और उसे योग के आसनों का अभ्यास करवाना शुरू किया। पहले तो वह रोती बिलखती रही लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और कुछ ही महीनों की मेहनत के बाद उनका प्रयास सफल होने लगा। निशक्त मीरा ने हाथ पांव हिलाना शुरू कर दिया तो उनका हौसला बढ़ा। धीरे-धीरे शिक्षक अफजाल ने मीरा को सूर्य नमस्कार, पद्मासन, सर्वांगासन व पश्चिमोत्तासन का अभ्यास कराया। अफजाल के मुताबिक सर्वांगासन व पश्चिमोत्तासन से मीरा की सिकुड़ी हुई मांसपेशियों में खिंचाव आने लगा और वह अपने पैरों पर खड़ी होने लगी। पहली बार उसे खड़ा देखकर अफजाल प्रफुल्लित हो उठे। एक वर्ष के नियमित अभ्यास के बाद मीरा के हाथ भी काम करने लगे वह अपना भोजन भी खुद ही अपने हाथ से करने लगी। योग की इस विधा ने मीरा की तकदीर को बदल कर रख दिया है। स्कूल में नियमित रूप से योग की पाठशाला में दिव्यांग मीरा को पद्मासन व सूर्य नमस्कार करता देखकर लोग अवाक रह जाते हैं। मीरा भी अपनी जीवटता के बदौलत निशक्कतता को मात देकर अपनी जिंदगी को संवारने में जुटी हुई है। मीरा के परिवार के लोग भी शिक्षक का आभार मान रहे हैं।
इनसेट
योग का गढ़ बन रहा यूपीएस गढ़वलिया
गोंडा। बेसिक शिक्षा परिषद के अफसर भले ही अभी परिषदीय स्कूलों में योग की शिक्षा को लागू करने की कसरत कर रहे हों, लेकिन जिले के झंझरी शिक्षा क्षेत्र का पूर्व माध्यमिक विद्यालय गढ़वलिया योग की शिक्षा का गढ़ बन चुका है। यहां तैनात प्रधानाध्यापक अफजाल अहमद की दो वर्षों की मेहनत ने आज इस स्कूल को इस मुकाम पर लाकर खड़ा किया है। यहां के छात्र-छात्राओं के योग के विभिन्न आसनों को सहजता के साथ करता देखकर इनकी मेहनत का अंदाजा लगाया जा सकता है। शीर्षासन हो या मयूरासन, सूर्य नमस्कार हो या फिर गरुड़ासन, बच्चे जिस कुशलता के साथ योग की इन क्रियाओं को करते है उसे देखकर हर कोई हैरत में पड़ जाता है। यहां के बच्चे जिले स्तर की विभिन्न प्रतियोगिताओं व कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुके हैं।
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योग ने बदल दी दिव्यांग मीरा की तकदीर
निशक्तता को मात देकर छात्रा ग्रहण कर रही शिक्षा
फोटो-
उमानाथ तिवारी
गोंडा। जिले के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक ने योग की विधा के जरिए विद्यालय में सातवीं कक्षा में पढने वाली एक दिव्यांग छात्रा की तकदीर बदल दी है। बचपन से दोनों हाथ व पैरों से निशक्त यह छात्रा जो चलने-फिरने से लेकर भोजन तक के लिए दूसरों पर आश्रित थी, अब योग के आसनों की बदौलत न सिर्फ अपने पैरों पर चल रही है बल्कि अपने हाथो से भोजन भी कर रही है। शिक्षक के अथक प्रयास व छात्रा ने अपनी जीवटता के माध्यम से निशक्कतता को मात देकर ‘करो योग रहो निरोग’ के नारे को सच साबित कर दिखाया है। अब वह खुद ही स्कूल भी जाती है और वहां बच्चों के साथ योगभ्यास भी करती है। योग से छात्रा की तकदीर तो बदली ही है उसके गरीब परिवारीजनों के चेहरे पर मुस्कान भी लौट आई है।
झंझरी क्षेत्र के गढ़वलिया गांव के रहने वाले रामरूप बेहद सामान्य परिवार से है। रामरूप की पांच बेटियां व एक बेटा है। एक बेटी मीरा बचपन से निशक्तता का शिकार है। मीरा न तो अपने पैरों पर खड़ी हो सकती थी और न ही अपने हाथों से कोई काम कर सकती थी। इसके अलावा वह बोल व सुन भी नहीं सकती। रामरूप ने अपने सामर्थ्य के मुताबिक उसका इलाज भी कराया लेकिन आर्थिक तंगी आई तो परिवार वालों ने उसे तकदीर का खेल मानकर मौन धारण कर लिया और बेटी का इलाज बंद हो गया। निशक्त मीरा चलने-फिरने से लेकर भोजन करने तक के लिए दूसरे पर आश्रित हो गई। पढ़ने लायक हुई तो उसका नामांकन गांव के प्राथमिक विद्यालय में करा दिया गया। पिछले वर्ष जब वह पांचवी पास कर उच्च प्राथमिक स्कूल में पहुचंी तो वहां तैनात शिक्षक को उसकी हालत देखकर द्रवित हो गए। विद्यालय के प्रधानाध्यापक अफजाल अहमद बताते हैं कि स्कूल के बच्चे जब योग के आसन करते तो मीरा उन्हें बैठकर देखती रहती। एक दिन उन्होंने मीरा को भी योग सिखाने की ठानी और उसे योग के आसनों का अभ्यास करवाना शुरू किया। पहले तो वह रोती बिलखती रही लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और कुछ ही महीनों की मेहनत के बाद उनका प्रयास सफल होने लगा। निशक्त मीरा ने हाथ पांव हिलाना शुरू कर दिया तो उनका हौसला बढ़ा। धीरे-धीरे शिक्षक अफजाल ने मीरा को सूर्य नमस्कार, पद्मासन, सर्वांगासन व पश्चिमोत्तासन का अभ्यास कराया। अफजाल के मुताबिक सर्वांगासन व पश्चिमोत्तासन से मीरा की सिकुड़ी हुई मांसपेशियों में खिंचाव आने लगा और वह अपने पैरों पर खड़ी होने लगी। पहली बार उसे खड़ा देखकर अफजाल प्रफुल्लित हो उठे। एक वर्ष के नियमित अभ्यास के बाद मीरा के हाथ भी काम करने लगे वह अपना भोजन भी खुद ही अपने हाथ से करने लगी। योग की इस विधा ने मीरा की तकदीर को बदल कर रख दिया है। स्कूल में नियमित रूप से योग की पाठशाला में दिव्यांग मीरा को पद्मासन व सूर्य नमस्कार करता देखकर लोग अवाक रह जाते हैं। मीरा भी अपनी जीवटता के बदौलत निशक्कतता को मात देकर अपनी जिंदगी को संवारने में जुटी हुई है। मीरा के परिवार के लोग भी शिक्षक का आभार मान रहे हैं।
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योग का गढ़ बन रहा यूपीएस गढ़वलिया
गोंडा। बेसिक शिक्षा परिषद के अफसर भले ही अभी परिषदीय स्कूलों में योग की शिक्षा को लागू करने की कसरत कर रहे हों, लेकिन जिले के झंझरी शिक्षा क्षेत्र का पूर्व माध्यमिक विद्यालय गढ़वलिया योग की शिक्षा का गढ़ बन चुका है। यहां तैनात प्रधानाध्यापक अफजाल अहमद की दो वर्षों की मेहनत ने आज इस स्कूल को इस मुकाम पर लाकर खड़ा किया है। यहां के छात्र-छात्राओं के योग के विभिन्न आसनों को सहजता के साथ करता देखकर इनकी मेहनत का अंदाजा लगाया जा सकता है। शीर्षासन हो या मयूरासन, सूर्य नमस्कार हो या फिर गरुड़ासन, बच्चे जिस कुशलता के साथ योग की इन क्रियाओं को करते है उसे देखकर हर कोई हैरत में पड़ जाता है। यहां के बच्चे जिले स्तर की विभिन्न प्रतियोगिताओं व कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुके हैं।
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