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अब बीते दिनों की बात हो गए कजली के कर्णप्रिय गीत
Updated Wed, 19 Jul 2017 11:03 PM IST
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सैदपुर। कभी सावन के नाम से मीठी पुलकन भर देने वाला सावन का महीना तेज भागमभाग जिंदगी और आधुनिकता के दबाव के चलते अपनी प्रासंगिकता खो रहा है। गांव की अमराइयों में झूलों से लहराते पेड़ों की डालें और लोक धुनों पर आधारित कजली के कर्णप्रिय गीत अब बीते दिनों की बात हो गए हैं। अब तो सावन रक्षाबंधन और नागपंचमी के कुछ प्रतीक आयोजनों में ही जिंदा है।
हिंदी महीनों में सावन युवा उमंग, उत्साह का प्रतीक माह है। बाग-बागीचों, खेतों, पेड़ों में यह माह जहां नवीन जीवन संचार का संकेत देता है। वहीं सावन ताल-तलैयों, नदी-नालों के यौवन उभार का माह है। रामनवमी के बाद बंद पड़े हिंदू त्योहारों की श्रृंखला सावन माह के नागपंचमी से आरंभ हो जाती है। कभी सावन आते ही गांव की अमराइयां और अखाड़े गुलजार हो जाया करते थे। अखाड़ों में जहां युवा कुश्ती, दंडबैठक, लंबी, ऊंची कूद की तैयारी कर नागपंचमी की प्रतियोगिताओं में अपना कलात्मक प्रदर्शन करते वहीं गांव के बाहर के तमाम बाग़-बागीचों में झूलों के पेंगों से हिलती पेड़ों की डाली और युवतियों की तरफ से गाए जाने वाले कजली गीतों से देर रात तक गांव गुलजार रहते थे। अब पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव और भौतिकता ने सब कुछ लील लिया है।
अमराइयों को काट कर खेत बनाया जा रहा है। पेड़ नही तो फिर झूले कहां। जिन कजली गीतों में कभी विरह-वियोग, प्रेम-मिलन और संदेश छिपे रहते थे, उन्हें आज की आधुनिक युवतियां भूल चुकी हैं। हमें मेहंदी लिया द पिया मोतीझील से, जा के साइकिल से न तथा मिर्जापुर कइला गुलजार, कचौड़ी गली सून कइला बलमू अब याद की बातें रह गई हैं। कहीं-कहीं झूलों पर बैठी युवतियां अब कजली की जगह सीरियल और मोबाइल पर फ़िल्मी गीत बजा रही है। मिला-जुला कर सावन, अमराई, झूला, कुश्ती पर अब फैशन, टीवी, मोबाइल प्रभावी हो गया है। अब युवतियों को झूला, युवाओं को अखाड़ा, आकर्षित नहीं कर पाते। फिर भी गांवों में इक्का-दुक्का जगह बच्चों की जिद पर पड़े झूले और गांव सभा की जमीन कब्जाने के चक्कर में खुदे अखाड़ों में सावनी औपचारिकता पूरी की जा रही है। नागपंचमी के दिन नाग देवता को दूध-लावा, कहीं कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन कर सावन को प्रतीक रूप से जिंदा किए हैं। हालिया दिनों में कांवड़ यात्रा और सावन पूर्णिमा को रक्षाबंधन से सावन की प्रासंगिकता बनी हुई है।
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हिंदी महीनों में सावन युवा उमंग, उत्साह का प्रतीक माह है। बाग-बागीचों, खेतों, पेड़ों में यह माह जहां नवीन जीवन संचार का संकेत देता है। वहीं सावन ताल-तलैयों, नदी-नालों के यौवन उभार का माह है। रामनवमी के बाद बंद पड़े हिंदू त्योहारों की श्रृंखला सावन माह के नागपंचमी से आरंभ हो जाती है। कभी सावन आते ही गांव की अमराइयां और अखाड़े गुलजार हो जाया करते थे। अखाड़ों में जहां युवा कुश्ती, दंडबैठक, लंबी, ऊंची कूद की तैयारी कर नागपंचमी की प्रतियोगिताओं में अपना कलात्मक प्रदर्शन करते वहीं गांव के बाहर के तमाम बाग़-बागीचों में झूलों के पेंगों से हिलती पेड़ों की डाली और युवतियों की तरफ से गाए जाने वाले कजली गीतों से देर रात तक गांव गुलजार रहते थे। अब पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव और भौतिकता ने सब कुछ लील लिया है।
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अमराइयों को काट कर खेत बनाया जा रहा है। पेड़ नही तो फिर झूले कहां। जिन कजली गीतों में कभी विरह-वियोग, प्रेम-मिलन और संदेश छिपे रहते थे, उन्हें आज की आधुनिक युवतियां भूल चुकी हैं। हमें मेहंदी लिया द पिया मोतीझील से, जा के साइकिल से न तथा मिर्जापुर कइला गुलजार, कचौड़ी गली सून कइला बलमू अब याद की बातें रह गई हैं। कहीं-कहीं झूलों पर बैठी युवतियां अब कजली की जगह सीरियल और मोबाइल पर फ़िल्मी गीत बजा रही है। मिला-जुला कर सावन, अमराई, झूला, कुश्ती पर अब फैशन, टीवी, मोबाइल प्रभावी हो गया है। अब युवतियों को झूला, युवाओं को अखाड़ा, आकर्षित नहीं कर पाते। फिर भी गांवों में इक्का-दुक्का जगह बच्चों की जिद पर पड़े झूले और गांव सभा की जमीन कब्जाने के चक्कर में खुदे अखाड़ों में सावनी औपचारिकता पूरी की जा रही है। नागपंचमी के दिन नाग देवता को दूध-लावा, कहीं कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन कर सावन को प्रतीक रूप से जिंदा किए हैं। हालिया दिनों में कांवड़ यात्रा और सावन पूर्णिमा को रक्षाबंधन से सावन की प्रासंगिकता बनी हुई है।
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