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सरसों के फूलों की चादर तनी, आम बौराए
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 13 Feb 2016 12:54 AM IST
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वसंत पंचमी के त्योहार के साथ ही फागुनी बयार बहने लगी है। लेकिन, गांवों-कसबों में फागुनी बहारें गायब सी हो गईं हैं। यही वजह है कि वसंत पंचमी पर भी न तो कहीं फाग गीत सुनाई दे रहे हैं, और न बम-बम भोले के जयघोष।
प्रकृति जरूर अपने रंग बिखेरने में जुट गई है। सरसों की फसल में पीले रंग के फूलों की चादर दूर से ही लोगों का ध्यान खींच रही है। आम की बौर हवा में भीनी महक बिखेरने लगी है।
इस बार 12 और 13 फरवरी को (दो दिन) वसंत पंचमी का त्योहार मनाया गया। ग्रामीणों ने बताया कि वसंत की दस्तक के साथ शिवरात्रि और होली के त्योहारों की तैयारी करना शुरू कर देते हैं।
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बुजुर्गों ने बताया कि वसंत पंचमी के दिन से ही गांवों-कसबों में होलिका दहन वाले स्थानों पर लकड़ी और कंडे रखकर होली का श्रीगणेश किया जाता था। बाद में गांव के लोग और नवयुवक धीरे-धीरे होली बढ़ाते रहते थे। वसंत पंचमी के दिन से ही लोग देश के प्रमुख शिव मंदिरों के लिए प्रस्थान करने लगते थे।
इनमें कांवड़ लेकर पैदल जाने वालों की विशेष भागीदारी रहती थी। सवारी संसाधनों की उपलब्धता और अति व्यस्तता में समय की कमी के चलते लोग शिवरात्रि पर्व के पास आने पर ही घरों से बाहर निकलते हैं। गांवों मेें फाग गायकों की टोलियां वसंत पंचमी के बाद से फाग गीतों का अभ्यास शुरू कर देते थे।
चौपाल में अलाव के आगे बैठकर किस्सागोई के साथ नए-नए स्वर और ताल के फाग गीतों की रचना और उनके गायन की विधा पर विचार मंथन किया जाता था। वक्त के साथ वसंत से लेकर होली के एक सप्ताह बाद तक चलने वाली परंपराएं अब दम तोड़ रही हैं।
वसंत के फगुआ मौसम में इसबार मौसम की मार भारी पड़ रही है। पल-पल रंग बदल रहे मौसम से लोग परेशान हैं। सूखा पड़ जाने से फसलों की रंगत नदारद है। समय से पहले आम के पेड़ों में लगी बौर दिन में तेज धूप निकलने और गर्मी पड़ने से झड़ रही है। दलहनी-तिलहनी फसलों में रोग और कीटों का प्रकोप पूरे शबाब पर है।
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प्रकृति जरूर अपने रंग बिखेरने में जुट गई है। सरसों की फसल में पीले रंग के फूलों की चादर दूर से ही लोगों का ध्यान खींच रही है। आम की बौर हवा में भीनी महक बिखेरने लगी है।
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इस बार 12 और 13 फरवरी को (दो दिन) वसंत पंचमी का त्योहार मनाया गया। ग्रामीणों ने बताया कि वसंत की दस्तक के साथ शिवरात्रि और होली के त्योहारों की तैयारी करना शुरू कर देते हैं।
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बुजुर्गों ने बताया कि वसंत पंचमी के दिन से ही गांवों-कसबों में होलिका दहन वाले स्थानों पर लकड़ी और कंडे रखकर होली का श्रीगणेश किया जाता था। बाद में गांव के लोग और नवयुवक धीरे-धीरे होली बढ़ाते रहते थे। वसंत पंचमी के दिन से ही लोग देश के प्रमुख शिव मंदिरों के लिए प्रस्थान करने लगते थे।
इनमें कांवड़ लेकर पैदल जाने वालों की विशेष भागीदारी रहती थी। सवारी संसाधनों की उपलब्धता और अति व्यस्तता में समय की कमी के चलते लोग शिवरात्रि पर्व के पास आने पर ही घरों से बाहर निकलते हैं। गांवों मेें फाग गायकों की टोलियां वसंत पंचमी के बाद से फाग गीतों का अभ्यास शुरू कर देते थे।
चौपाल में अलाव के आगे बैठकर किस्सागोई के साथ नए-नए स्वर और ताल के फाग गीतों की रचना और उनके गायन की विधा पर विचार मंथन किया जाता था। वक्त के साथ वसंत से लेकर होली के एक सप्ताह बाद तक चलने वाली परंपराएं अब दम तोड़ रही हैं।
वसंत के फगुआ मौसम में इसबार मौसम की मार भारी पड़ रही है। पल-पल रंग बदल रहे मौसम से लोग परेशान हैं। सूखा पड़ जाने से फसलों की रंगत नदारद है। समय से पहले आम के पेड़ों में लगी बौर दिन में तेज धूप निकलने और गर्मी पड़ने से झड़ रही है। दलहनी-तिलहनी फसलों में रोग और कीटों का प्रकोप पूरे शबाब पर है।