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Fatehpur News: लालटेन और मशाल से हाईमास्ट तक पहुंची खागा की रामलीला

Sat, 10 Oct 2026 12:32 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sat, 10 Oct 2026 12:32 AM IST
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Khaga Ramlila has evolved from lanterns and torches to high-mast lighting.
फाइल फोटो-01-साल 1926 में रामलीला मंच में पूजन करते भक्त। संवाद
खागा। कभी हल में लालटेन टांगकर, मशाल और अरंडी के तेल के दीयों की रोशनी में खागा की रामलीला का मंचन होता था। आज हाईमास्ट, रंगीन लाइटों और आधुनिक ध्वनि व्यवस्था से मंच जगमगाता है। करीब 180 साल के इस सफर में तकनीक और साज-सज्जा बदली, लेकिन रामभक्ति की परंपरा आज भी कायम है।
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वरिष्ठ साहित्यकार बृजमोहन पांडेय बताते हैं कि खागा की रामलीला का इतिहास वर्ष 1846 से जुड़ा है। शुरुआत में स्थानीय लोग ही पात्र बनते थे। बुजुर्ग दशरथ और जनक, जबकि युवा राम, लक्ष्मण और हनुमान की भूमिका निभाते थे।
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जनकपुरी, पंचवटी और लंका जैसे प्रसंगों के लिए अलग-अलग स्थान तय होते थे। प्रसंग बदलने पर कलाकारों के साथ दर्शक भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते थे और पूरा नगर रामकथा का सहभागी बनता था।
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विरोधी भी पहुंचते थे एक-दूसरे के दरवाजे
रामलीला धार्मिक आयोजन के साथ सामाजिक मेलजोल का माध्यम भी थी। आपसी मनमुटाव रखने वाले लोग भी एक-दूसरे के दरवाजे पर मंचन देखने पहुंचते थे। लोग साथ बैठकर रामकथा सुनते और आपसी दूरियां कम करते थे।

मिट्टी के रंगों से सजते थे पात्र
पहले कलाकारों का शृंगार मिट्टी, खड़िया, काजल और प्राकृतिक रंगों से होता था। स्थानीय कारीगर कागज की लुगदी और मिट्टी से रावण व राक्षसों के मुखौटे बनाते थे। व्यास रामचरितमानस की चौपाइयां पढ़ते और कलाकार उनके अनुरूप अभिनय करते थे। श्रीवास्तव परिवार की ओर से मुकुट पूजन की परंपरा आज भी निभाई जाती है।


मिट्टी के रावण से अयोध्या भवन तक का सफर
शुरुआत में रावण का पुतला मिट्टी से बनाया जाता था। वर्ष 1962 में पहली बार सीमेंट का रावण तैयार किया गया। नगरवासियों के सहयोग और जमीन दान में मिलने के बाद वर्ष 1920 में 9,500 रुपये से अयोध्या भवन बनवाया गया। वर्ष 1952-53 में श्रीरामलीला कमेटी का पंजीकरण हुआ, जिसकी सोसाइटी का पंजीकरण संख्या 207 बताई जाती है।

नगर में रामलीला शुरू करने की पहल विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, चंद्रपाल सिंह अमीन, बेनी माधव सिंह और भगवान दास श्रीवास्तव समेत अन्य रामभक्तों ने की थी। उनका उद्देश्य नगरवासियों को स्थानीय स्तर पर ही रामलीला दिखाना था। बाद में मेले और दंगल की परंपरा भी इससे जुड़ गई। बताया जाता है कि वर्ष 1889 से मेले में दंगल आयोजित किया जा रहा है।

सात जिलों की टीमें दिखाएंगी लाइट शो और डीजे का दम
रामलीला महोत्सव में गेट-लाइट शो और डीजे प्रतियोगिता आकर्षण का केंद्र रहेंगी। कमेटी अध्यक्ष प्रकाश पांडेय ने बताया कि कौशाम्बी, कानपुर, प्रयागराज, चित्रकूट, प्रतापगढ़, अयोध्या और जौनपुर समेत कई जिलों की टीमें हिस्सा लेंगी। कमेटी प्रतिभागियों को जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराएगी और बेहतर प्रदर्शन करने वाली टीमों को पुरस्कृत करेगी।


3.39 करोड़ से संवरेगा रावण मैदान, 13 को भूमिपूजन प्रस्तावित
रावण मैदान के जीर्णोद्धार और सुंदरीकरण के लिए 3.39 करोड़ की परियोजना तैयार की गई है। सीएंडडीएस की परियोजना प्रबंधक इकाई-55 ने निर्माण से पहले पुराने जर्जर चबूतरे को हटाने और भूमि का सीमांकन कराने को कहा है। रामलीला कमेटी के महामंत्री सूर्यप्रकाश सिंह ने बताया कि 13 अक्तूबर को राज्यमंत्री कृष्णा पासवान और जिला पंचायत अध्यक्ष अभय प्रताप सिंह के हाथों परियोजना का भूमिपूजन प्रस्तावित है।

फाइल फोटो-01-साल 1926 में रामलीला मंच में पूजन करते भक्त। संवाद

फाइल फोटो-01-साल 1926 में रामलीला मंच में पूजन करते भक्त। संवाद

फाइल फोटो-01-साल 1926 में रामलीला मंच में पूजन करते भक्त। संवाद

फाइल फोटो-01-साल 1926 में रामलीला मंच में पूजन करते भक्त। संवाद

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