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अयोध्या को वैदिक सिटी बनाने का काम शुरू
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अयोध्या। देवराई वन के साथ अयोध्या को वैदिक सिटी बनाने का काम शुरू हो गया। अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के पूर्व फारेस्ट मैन ऑफ इंडिया प्रदीप त्रिपाठी की मौजूदगी में वैदिक कालीन पौधों को रोपे जाने की शुरुआत की गई। शोध के बाद इन पौधों को रोपित किए जाने का फैसला लिया गया। भविष्य में अयोध्या में चित्रकूट, दंडकारण्य, पंचवटी, पुष्पवाटिका व श्रीलंका के पौधे देखने को मिलेंगे। जल्द ही अयोध्या में कई अन्य स्थानों पर भी ऐसे पौधों को रोपित किया जाएगा।
अयोध्या को विश्वस्तरीय वैदिक सिटी बनाने का लक्ष्य है। इसके लिए अयोध्या के पर्यावरण को व्यवस्थित किया जा रहा है। विश्व पर्यावरण दिवस के पूर्व देवराई वन के पौधों को रोपकर इसकी शुरुआत की गई। इसके तहत जनौरा साईंदाता कुटिया (रामायणकाल में जनक के ठहरने के स्थान जनकौरा के पास) के पास वैदिक कालीन पौधों को लगाया गया। इन पौधों का चयन शोध के बाद किया गया है।
एडीए के उपाध्यक्ष विशाल सिंह के आग्रह पर रामकाज के निमित्त इस पर फारेस्ट मैन ऑफ इंडिया के नाम से चर्चित प्रदीप त्रिपाठी ने शोध शुरू किया। उन्होंने बताया कि इनमें रामायणकाल में मौजूद रहने वाले देव वृक्ष वट (बरगद) के साथ बेर, गूलर, मौलश्री, उमर व गूलर के साथ अन्य आयुर्वेदिक पौधे शामिल हैं। इन पौधों के साथ ही जंगल ज्यादा समय तक सुरक्षित रहते हैं।
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उन्होंने बताया कि यहां लगभग ढाई हजार पौधे रोपे गए। इस पर शोध के लिए वाल्मीकि रामायण के साथ ब्रह्म संहिता, ऋग्वेद, वन उपवन संहिता सहित अन्य ग्रंथों का अध्ययन किया गया। अब इन्हें अयोध्या में रोपे जाने का काम शुरू किया गया है। इसके लिए उन्होंने टीम के साथ दौरा किया। बताया कि विभिन्न प्रकार के वृक्षों के लिए सर्वे के साथ स्थानों का चयन करने की कार्यवाही अभी चलेगी।
विशेषज्ञों व एडीए के उपाध्यक्ष का वैदिक सिटी का कांसेप्ट यह है कि अयोध्या में जगह-जगह रामायणकालीन इतने वृक्ष हों कि यहां पहुंचने वाले लोगों से जगह-जगह तितलियां टकराएं। अयोध्या में प्रवेश के साथ शहर के बाहर के तापमान से अंदर का तापमान दो से आठ डिग्री कम महसूस किया जाए। ऐसे पेड़ हों जिनकी ओर पक्षी आकर्षित हों। इनका कलरव गूंजता रहे।
यह काम यहां जल और जंगल के जरिए ही किया जा सकता है। यह आध्यात्मिक वातावरण को सृजित करेगा। यहां आने वाले लोगों को शांति की अनुभूति होगी। ग्रीन अयोध्या के कांसेप्ट में भव्य, मनोरम व दिव्य अयोध्या के लक्ष्य को पाने के लिए ऐसे पौधों को रोपित किया जाएगा जिनका संबंध किसी न किसी रूप से देवताओं से हो।
फारेस्ट मैन ऑफ इंडिया प्रदीप त्रिपाठी बताते हैं कि सोध में यह बात सामने आई कि वट (बरगद) में त्रिदेवों का वास होता है। पेड़ के तने में विष्णु का, लट और जड़ों में ब्रह्मा का और शाखाओं में शिव का वास होता है। इनके पत्तों में श्रीकृष्ण का वास होता है। यह बात शास्त्रों से पता चलती है।
देवराई वन दीर्घकाल तक मानव और पशु-पक्षियों को संरक्षण प्रदान करने वाले वन हैं। औषधि और आयुर्वेद के साथ इनमें से ज्यादा का संबंध देवी-देवताओं से होता है। इनका उपयोग धार्मिक रूप से भी किया जाता है। इनमें बरगद, गूलर, पाकड़ आदि के साथ ही कई तरह की झाड़ी और दूसरे पौधे भी होते हैं।
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अयोध्या को विश्वस्तरीय वैदिक सिटी बनाने का लक्ष्य है। इसके लिए अयोध्या के पर्यावरण को व्यवस्थित किया जा रहा है। विश्व पर्यावरण दिवस के पूर्व देवराई वन के पौधों को रोपकर इसकी शुरुआत की गई। इसके तहत जनौरा साईंदाता कुटिया (रामायणकाल में जनक के ठहरने के स्थान जनकौरा के पास) के पास वैदिक कालीन पौधों को लगाया गया। इन पौधों का चयन शोध के बाद किया गया है।
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एडीए के उपाध्यक्ष विशाल सिंह के आग्रह पर रामकाज के निमित्त इस पर फारेस्ट मैन ऑफ इंडिया के नाम से चर्चित प्रदीप त्रिपाठी ने शोध शुरू किया। उन्होंने बताया कि इनमें रामायणकाल में मौजूद रहने वाले देव वृक्ष वट (बरगद) के साथ बेर, गूलर, मौलश्री, उमर व गूलर के साथ अन्य आयुर्वेदिक पौधे शामिल हैं। इन पौधों के साथ ही जंगल ज्यादा समय तक सुरक्षित रहते हैं।
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उन्होंने बताया कि यहां लगभग ढाई हजार पौधे रोपे गए। इस पर शोध के लिए वाल्मीकि रामायण के साथ ब्रह्म संहिता, ऋग्वेद, वन उपवन संहिता सहित अन्य ग्रंथों का अध्ययन किया गया। अब इन्हें अयोध्या में रोपे जाने का काम शुरू किया गया है। इसके लिए उन्होंने टीम के साथ दौरा किया। बताया कि विभिन्न प्रकार के वृक्षों के लिए सर्वे के साथ स्थानों का चयन करने की कार्यवाही अभी चलेगी।
विशेषज्ञों व एडीए के उपाध्यक्ष का वैदिक सिटी का कांसेप्ट यह है कि अयोध्या में जगह-जगह रामायणकालीन इतने वृक्ष हों कि यहां पहुंचने वाले लोगों से जगह-जगह तितलियां टकराएं। अयोध्या में प्रवेश के साथ शहर के बाहर के तापमान से अंदर का तापमान दो से आठ डिग्री कम महसूस किया जाए। ऐसे पेड़ हों जिनकी ओर पक्षी आकर्षित हों। इनका कलरव गूंजता रहे।
यह काम यहां जल और जंगल के जरिए ही किया जा सकता है। यह आध्यात्मिक वातावरण को सृजित करेगा। यहां आने वाले लोगों को शांति की अनुभूति होगी। ग्रीन अयोध्या के कांसेप्ट में भव्य, मनोरम व दिव्य अयोध्या के लक्ष्य को पाने के लिए ऐसे पौधों को रोपित किया जाएगा जिनका संबंध किसी न किसी रूप से देवताओं से हो।
फारेस्ट मैन ऑफ इंडिया प्रदीप त्रिपाठी बताते हैं कि सोध में यह बात सामने आई कि वट (बरगद) में त्रिदेवों का वास होता है। पेड़ के तने में विष्णु का, लट और जड़ों में ब्रह्मा का और शाखाओं में शिव का वास होता है। इनके पत्तों में श्रीकृष्ण का वास होता है। यह बात शास्त्रों से पता चलती है।
देवराई वन दीर्घकाल तक मानव और पशु-पक्षियों को संरक्षण प्रदान करने वाले वन हैं। औषधि और आयुर्वेद के साथ इनमें से ज्यादा का संबंध देवी-देवताओं से होता है। इनका उपयोग धार्मिक रूप से भी किया जाता है। इनमें बरगद, गूलर, पाकड़ आदि के साथ ही कई तरह की झाड़ी और दूसरे पौधे भी होते हैं।