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होली का खुमार चढ़ा, सज गई दुकानें
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बाजार में ब्रिकी के लिए रखा गुलाल,पिचकारी व अन्य।
- फोटो : FAIZABAD
अयोध्या। होली का खुमार लोगों पर चढ़ना शुरू हो गया है। वहीं, बाजारों में दुकानें सज गई है, पिचकारी, मुखौटे, रंग समेत चिप्स-कचरी आदि की दुकानों पर लोगों की भीड़ जुटने लगी है। दुकानों पर सजी बड़ी-बड़ी पिचकारी वाली बंदूकें, डोरेमोन, हनुमानजी, हाथी, बिल्ली, डायनासोर, स्पाइडरमैन व मगरगच्छ पिचकारियां बच्चों को लुभा रही हैं।
राक्षसों के डरावने मुखौटे को भी खूब खरीदे जा रहे है जिसे होली खेलने वाले अपने मुंह पर चढ़ाएंगे। मार्केट में खास यह है कि इस बार चाइनीज सामानों की अपेक्षा देसी सामान दुकानों पर अधिक दिखाई दे रहे हैं।
शहर में रीडगंज, रिकाबगंज, सिविल लाइंस, नाका मकबरा, नियांवा, फतेहगंज, देवकाली आदि विभिन्न जगहों पर विभिन्न रूपाकृतियों वाली पिचकारियां सज गई है। बच्चों ने होली को लेकर अभी से रंग, गुलाल और पिचकारी खरीदना शुरू कर दिए है।
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गणेश भगवान, टार्च, पेप्सी, कोका, रिवाल्बर आदि आकृतियों वाली पिचकारी की भी डिमांड है। हाथी, बिल्ली, डायनासोर, स्पाइडरमैन व मगरमच्छ पिचकारियां बच्चों को लुभा रही हैं। हर्बल रंग के साथ ब्रांडेड अबीर गुलाल की खरीदारी जम कर हो रही है।
मुर्गा गुलाल भी खूब बिक रहा है। आमतौर से पिचकारी 25 रुपये से शुरू होकर 300 रुपये तक है। ब्रांडेड कंपनियों के गुलाल 200 रुपये से लेकर 350 रुपये तक व अबीर 200 रुपए से लेकर 500 रुपये प्रति किलो तक मार्केट में उपलब्ध है। इसके अलावा मुखौटे 10 रुपये से लेकर 100 रुपये तक मार्केट में बिक रहा है।
शरीर बदरंग कर देंगे बाजार के सेंथेटिक रंग
अयोध्या। रंगों का त्योहार होली नजदीक आ गई। उत्साह-उमंग से सराबोर रहने वाले इस उत्सव के लिए बाजार में अबीर-गुलाल, सिंथेटिक और हर्बल रंगों से बाजार सज गए हैं। ऊंच-नीच का भेद मिटाने के लिए जाने जाना वाला इस पर्व में सभी एक रंग में दिखते हैं।
रंगों के इस त्योहार पर सिंथेटिक रंग बदरंग बना देते हैं। विशेषज्ञों की माने तो सिंथेटिक रंग त्वचा को पूरी तरह से बदरंग बना देते हैं। महज थोड़ी सी सावधानियों के से इस सिंथेटिक रंगों के दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है।
बाजार में बिकने वाले सिंथेटिक रंगों में लेड की प्रमुखता होती है। सिलिकान व एजो बेंजीन डाई को मिलाया जाता है। यही डाई रंगों को और चटख बनाती है। डाई बालों के प्रोटीन को भी नुकसान पहुंचाता है, जिससे बाल टूटने की समस्याएं बढ़ जाती हैं। रंगों में डाई के अलावा कापर, क्रोमियम, पारा रंगों में मिलने वाले ये तत्व काफी चमकीला होते हैं। चेहरे पर रंग लगने के बाद एक अजीब सी शाइनिंग उभर आती हैं।
डाई की वजह से लोगों में एलर्जी होने की संभावनाएं बढ़ जाती है। इस प्रकार के रंगों का अंगों पर लगने से लाल रंग के दाने व चकत्ते निकल आते हैं। खुजली व त्वचा में जलन भी होने लगती हैं। और तो और सिलिकान और लेड अंगों को काट देते हैं, जिसकी वजह से संक्रमित अंगों में वैक्टीरियल इन्फेक्शन होने की आशंका बढ़ जाती हैं। इस प्रकार के रंग आंखों में चले जाएं तो कार्निया को नुकसान पहुंचाते हैं।
अस्थमा के मरीजों को सिंथेटिक व सेंटेड रंग काफी नुकसान पहुंचाते हैं। जिला अस्पताल के चर्मरोग विशेषज्ञ डॉ. आरबी वर्मा ने बताया कि सेंथेटिक रंग से शरीर पर किसी प्रकार का जलन व दाने दिखे तो फौरी तौर पर सादे पानी से अंगों को धुले। एंटी एलर्जी दवाओं का प्रयोग करें और निकट किसी चर्म रोग विशेषज्ञ से इलाज कराएं। जिला अस्पताल के आई सर्जन डॉ. राजेश सिंह ने बताया कि सेंथेटिक रंग आंखों की कार्निया पर घाव कर सकते हैं। यदि आंख में माड़ा आ गया तो रोशनी कम होने की आशंका रहती है। कुछ लोगों को सेंथेटिक रंग से एलर्जी होती है, जिससे कंजेक्टाइवा लाल हो जाती और काफी दिन तक बनी रहती है।
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राक्षसों के डरावने मुखौटे को भी खूब खरीदे जा रहे है जिसे होली खेलने वाले अपने मुंह पर चढ़ाएंगे। मार्केट में खास यह है कि इस बार चाइनीज सामानों की अपेक्षा देसी सामान दुकानों पर अधिक दिखाई दे रहे हैं।
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शहर में रीडगंज, रिकाबगंज, सिविल लाइंस, नाका मकबरा, नियांवा, फतेहगंज, देवकाली आदि विभिन्न जगहों पर विभिन्न रूपाकृतियों वाली पिचकारियां सज गई है। बच्चों ने होली को लेकर अभी से रंग, गुलाल और पिचकारी खरीदना शुरू कर दिए है।
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गणेश भगवान, टार्च, पेप्सी, कोका, रिवाल्बर आदि आकृतियों वाली पिचकारी की भी डिमांड है। हाथी, बिल्ली, डायनासोर, स्पाइडरमैन व मगरमच्छ पिचकारियां बच्चों को लुभा रही हैं। हर्बल रंग के साथ ब्रांडेड अबीर गुलाल की खरीदारी जम कर हो रही है।
मुर्गा गुलाल भी खूब बिक रहा है। आमतौर से पिचकारी 25 रुपये से शुरू होकर 300 रुपये तक है। ब्रांडेड कंपनियों के गुलाल 200 रुपये से लेकर 350 रुपये तक व अबीर 200 रुपए से लेकर 500 रुपये प्रति किलो तक मार्केट में उपलब्ध है। इसके अलावा मुखौटे 10 रुपये से लेकर 100 रुपये तक मार्केट में बिक रहा है।
शरीर बदरंग कर देंगे बाजार के सेंथेटिक रंग
अयोध्या। रंगों का त्योहार होली नजदीक आ गई। उत्साह-उमंग से सराबोर रहने वाले इस उत्सव के लिए बाजार में अबीर-गुलाल, सिंथेटिक और हर्बल रंगों से बाजार सज गए हैं। ऊंच-नीच का भेद मिटाने के लिए जाने जाना वाला इस पर्व में सभी एक रंग में दिखते हैं।
रंगों के इस त्योहार पर सिंथेटिक रंग बदरंग बना देते हैं। विशेषज्ञों की माने तो सिंथेटिक रंग त्वचा को पूरी तरह से बदरंग बना देते हैं। महज थोड़ी सी सावधानियों के से इस सिंथेटिक रंगों के दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है।
बाजार में बिकने वाले सिंथेटिक रंगों में लेड की प्रमुखता होती है। सिलिकान व एजो बेंजीन डाई को मिलाया जाता है। यही डाई रंगों को और चटख बनाती है। डाई बालों के प्रोटीन को भी नुकसान पहुंचाता है, जिससे बाल टूटने की समस्याएं बढ़ जाती हैं। रंगों में डाई के अलावा कापर, क्रोमियम, पारा रंगों में मिलने वाले ये तत्व काफी चमकीला होते हैं। चेहरे पर रंग लगने के बाद एक अजीब सी शाइनिंग उभर आती हैं।
डाई की वजह से लोगों में एलर्जी होने की संभावनाएं बढ़ जाती है। इस प्रकार के रंगों का अंगों पर लगने से लाल रंग के दाने व चकत्ते निकल आते हैं। खुजली व त्वचा में जलन भी होने लगती हैं। और तो और सिलिकान और लेड अंगों को काट देते हैं, जिसकी वजह से संक्रमित अंगों में वैक्टीरियल इन्फेक्शन होने की आशंका बढ़ जाती हैं। इस प्रकार के रंग आंखों में चले जाएं तो कार्निया को नुकसान पहुंचाते हैं।
अस्थमा के मरीजों को सिंथेटिक व सेंटेड रंग काफी नुकसान पहुंचाते हैं। जिला अस्पताल के चर्मरोग विशेषज्ञ डॉ. आरबी वर्मा ने बताया कि सेंथेटिक रंग से शरीर पर किसी प्रकार का जलन व दाने दिखे तो फौरी तौर पर सादे पानी से अंगों को धुले। एंटी एलर्जी दवाओं का प्रयोग करें और निकट किसी चर्म रोग विशेषज्ञ से इलाज कराएं। जिला अस्पताल के आई सर्जन डॉ. राजेश सिंह ने बताया कि सेंथेटिक रंग आंखों की कार्निया पर घाव कर सकते हैं। यदि आंख में माड़ा आ गया तो रोशनी कम होने की आशंका रहती है। कुछ लोगों को सेंथेटिक रंग से एलर्जी होती है, जिससे कंजेक्टाइवा लाल हो जाती और काफी दिन तक बनी रहती है।