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भए प्रगट कृपाला दीन दयाला..
अमर उजाला ब्यूरो/अयोध्या
Updated Fri, 15 Apr 2016 11:14 PM IST
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रामजन्म के बाद कनक भवन मे झूमते श्रद्धालु।
- फोटो : अमर उजाला
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रामनवमी पर शुक्रवार को अयोध्या में श्रीराम जन्मोत्सव आस्था का शिखर निरूपित करने वाला रहा। दोपहर 12 बजे राम जन्म की शुभ बेला तक नगरी रामरस में पूरी तरह पगी नजर आने लगी थी। नगरी के हजारों मंदिरों के गर्भगृह में घंटों पूर्व से निष्पादित राम जन्म का कर्मकांड ऐन 12 बजे तब अभिव्यक्त हुआ, जब मंदिरों के कपाट खुले और ‘भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी...’ के साथ आरती शुरू हुई।
प्रभु की एक झलक पाने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा। मंदिर प्रांगण में ढोल-नगाड़े के साथ साधु-संत व भक्तों के सोहर व बधाई गीत गूंजने लगे। पर्व पर सर्वाधिक गहमागहमी वैष्णवों की प्रधानतम पीठ मानी-जाने वाली कनक भवन पर रही। यहां सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।
राम जन्म की बेला निकट आने के साथ श्रद्धालुओं की भीड़ शिखर का स्पर्श करने के साथ राम जन्मोत्सव की प्रतीक्षा में कुछ देर के लिए स्थिर हो गई। भजन-कीर्तन की महफिल भी अभीष्ट के प्राकट्य की प्रतीक्षा में चरम पर पहुंचकर थम गई। मंदिर के प्रांगण में तिल रखने तक की जगह नहीं बची थी, जो जहां था, वहीं अटक कर राम जन्म के उल्लास में डुबकी लगाने की तैयारी में रहा।
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घड़ी की सूईयां जैसे ही 12 बजे के स्पर्श को हुई और गर्भगृह का पट खुलते ही सजीले-गर्वीले कनक बिहारी सरकार की छवि का दर्शन कर साधु-संत व श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो गए। भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी... की चिर परिचित स्तुति के साथ समर्पण की पराकाष्ठा परिभाषित हुई। भक्तों की आस्था की साक्षी अकेले कनक भवन ही नहीं बल्कि संपूर्ण नगरी बनी।
बिल्कुल उस तरह जैसी त्रेता में राम जन्म के समय रही होगी। जैसा कि गोस्वामी जी ने श्रीरामचरित मानस में वर्णित किया है, ‘गृह-गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद। हरषवंत सब जहं तहं नगर नारि नर वृंद।’ रामनगरी के हजारों मंदिरों में राम जन्म का उल्लास उत्सव के रूप में चरम पर रहा। घंटे-घड़ियाल, ढोल-नगाड़े, पटाखे गूंजे तो फिजां में अबीर-गुलाल उड़ा श्रद्धालु जन्म के क्षणों में डूबे नृत्य करते रहे।
कनक भवन के साथ ही श्रीराम जन्म भूमि, लक्ष्मण किला, मणिरामदास जी की छावनी, राजगोपाल, श्रीकालेराम मंदिर, हनुमानगढ़ी, जानकी महल, श्रीरामबल्लभा कुंज, बड़ा स्थान दशरथ महल, विअहुति भवन, सद्गुरु सदन गोलाघाट आदि मंदिरों पर भी उत्सव का विशेष उल्लास मंदिर से सड़कों तक बिखरा रहा।
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प्रभु की एक झलक पाने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा। मंदिर प्रांगण में ढोल-नगाड़े के साथ साधु-संत व भक्तों के सोहर व बधाई गीत गूंजने लगे। पर्व पर सर्वाधिक गहमागहमी वैष्णवों की प्रधानतम पीठ मानी-जाने वाली कनक भवन पर रही। यहां सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।
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राम जन्म की बेला निकट आने के साथ श्रद्धालुओं की भीड़ शिखर का स्पर्श करने के साथ राम जन्मोत्सव की प्रतीक्षा में कुछ देर के लिए स्थिर हो गई। भजन-कीर्तन की महफिल भी अभीष्ट के प्राकट्य की प्रतीक्षा में चरम पर पहुंचकर थम गई। मंदिर के प्रांगण में तिल रखने तक की जगह नहीं बची थी, जो जहां था, वहीं अटक कर राम जन्म के उल्लास में डुबकी लगाने की तैयारी में रहा।
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घड़ी की सूईयां जैसे ही 12 बजे के स्पर्श को हुई और गर्भगृह का पट खुलते ही सजीले-गर्वीले कनक बिहारी सरकार की छवि का दर्शन कर साधु-संत व श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो गए। भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी... की चिर परिचित स्तुति के साथ समर्पण की पराकाष्ठा परिभाषित हुई। भक्तों की आस्था की साक्षी अकेले कनक भवन ही नहीं बल्कि संपूर्ण नगरी बनी।
बिल्कुल उस तरह जैसी त्रेता में राम जन्म के समय रही होगी। जैसा कि गोस्वामी जी ने श्रीरामचरित मानस में वर्णित किया है, ‘गृह-गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद। हरषवंत सब जहं तहं नगर नारि नर वृंद।’ रामनगरी के हजारों मंदिरों में राम जन्म का उल्लास उत्सव के रूप में चरम पर रहा। घंटे-घड़ियाल, ढोल-नगाड़े, पटाखे गूंजे तो फिजां में अबीर-गुलाल उड़ा श्रद्धालु जन्म के क्षणों में डूबे नृत्य करते रहे।
कनक भवन के साथ ही श्रीराम जन्म भूमि, लक्ष्मण किला, मणिरामदास जी की छावनी, राजगोपाल, श्रीकालेराम मंदिर, हनुमानगढ़ी, जानकी महल, श्रीरामबल्लभा कुंज, बड़ा स्थान दशरथ महल, विअहुति भवन, सद्गुरु सदन गोलाघाट आदि मंदिरों पर भी उत्सव का विशेष उल्लास मंदिर से सड़कों तक बिखरा रहा।