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अयोध्या के छोटी देवकाली मंदिर में विराजतीं नगर देवी
Faizabad
Updated Sat, 27 Sep 2014 05:30 AM IST
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अयोध्या। वैष्णवों की नगरी अयोध्या में शक्ति परंपरा का प्रतिष्ठापित देवी स्थल छोटी देवकाली मंदिर अपने में अनूठा इतिहास समेटे है। अयोध्या की नगर देवी के रूप में स्थापित मां देवकाली के प्रति नगरवासियों के साथ ही आसपास के कई जिले के लोगों का भी अटूट विश्वास है। नवरात्र के साथ ही यहां आयोजित होने वाले अन्य धार्मिक कार्यक्रम भी विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं।
तीर्थ स्थलों में श्रेष्ठ रामनगरी का अध्यात्म जगत में अहम स्थान है। अयोध्या के मध्य स्थापित मां देवकाली मंदिर शक्ति परंपरा के वाहकों का अनूठा स्थान है। इस स्थल का इतिहास भी अपना अलग महत्व रखता है। मंदिर के इतिहास के बारे में धर्मनगरी में प्रमाणिकता तो कोई नहीं है। मगर जनश्रुतियों की मानें तो छोटी देवकाली मिथिलाधाम (जनकपुरी) की देवी सर्वमंगला पार्वती जी ही हैं। अत्रि संहिता, मिथिला खंड के अनुसार मां सीता जब पितृ गृह जनकपुरी से श्वसुर गृह अयोध्या के लिए चलीं तो पार्वती जी का विग्रह (प्रतिमा) अपने साथ ले गईं। महाराजा दशरथ ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशान कोण पर उसी समय पार्वती जी का मंदिर बनवाया जहां मां सीता तथा राजकुल की अन्य रानियां पूजन के लिए जाती थीं। उस दौरान इस मंदिर की मान्यता नगर देवी के रूप में थी। अयोध्या में आज भी ये परंपरा विद्यमान है। ऐतिहासिक तथ्यों की मानें तो कहा जाता है कि ईसा की तीसरी शताब्दी तक ये मंदिर अपनी भव्यता और श्रेष्ठता के चलते भारत में प्रमुख स्थान रखता था। हूणों और मुगलों के आक्रमण से देवकाली मंदिर दो बार ध्वस्त हुआ। पहली बार इसका पुनर्निर्माण पुष्यमित्र ने कराया। दूसरी बार जब मुगलों ने ध्वस्त किया तो बिंदु संप्रदाय के महंत ने इस मंदिर के स्थान पर छोटी कोठरी का निर्माण कराया था। मां देवकाली को उमा, कात्यायनी, गौरी, कल्याणी, दैत्यमर्दिनी, दुर्गति नाशिनी, दुर्गा, शंकर प्राणवल्लभा, अपर्णा, पार्वती, काली, स्कंद और गणेश की माता, योगिनी, भुवनेश्वरी, सर्वमंगला नाम से जाना जाता है। नगरी के मध्य में स्थित छोटी देवकाली स्थान श्रद्धालुओं में खास अहमियत रखता है।
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तीर्थ स्थलों में श्रेष्ठ रामनगरी का अध्यात्म जगत में अहम स्थान है। अयोध्या के मध्य स्थापित मां देवकाली मंदिर शक्ति परंपरा के वाहकों का अनूठा स्थान है। इस स्थल का इतिहास भी अपना अलग महत्व रखता है। मंदिर के इतिहास के बारे में धर्मनगरी में प्रमाणिकता तो कोई नहीं है। मगर जनश्रुतियों की मानें तो छोटी देवकाली मिथिलाधाम (जनकपुरी) की देवी सर्वमंगला पार्वती जी ही हैं। अत्रि संहिता, मिथिला खंड के अनुसार मां सीता जब पितृ गृह जनकपुरी से श्वसुर गृह अयोध्या के लिए चलीं तो पार्वती जी का विग्रह (प्रतिमा) अपने साथ ले गईं। महाराजा दशरथ ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशान कोण पर उसी समय पार्वती जी का मंदिर बनवाया जहां मां सीता तथा राजकुल की अन्य रानियां पूजन के लिए जाती थीं। उस दौरान इस मंदिर की मान्यता नगर देवी के रूप में थी। अयोध्या में आज भी ये परंपरा विद्यमान है। ऐतिहासिक तथ्यों की मानें तो कहा जाता है कि ईसा की तीसरी शताब्दी तक ये मंदिर अपनी भव्यता और श्रेष्ठता के चलते भारत में प्रमुख स्थान रखता था। हूणों और मुगलों के आक्रमण से देवकाली मंदिर दो बार ध्वस्त हुआ। पहली बार इसका पुनर्निर्माण पुष्यमित्र ने कराया। दूसरी बार जब मुगलों ने ध्वस्त किया तो बिंदु संप्रदाय के महंत ने इस मंदिर के स्थान पर छोटी कोठरी का निर्माण कराया था। मां देवकाली को उमा, कात्यायनी, गौरी, कल्याणी, दैत्यमर्दिनी, दुर्गति नाशिनी, दुर्गा, शंकर प्राणवल्लभा, अपर्णा, पार्वती, काली, स्कंद और गणेश की माता, योगिनी, भुवनेश्वरी, सर्वमंगला नाम से जाना जाता है। नगरी के मध्य में स्थित छोटी देवकाली स्थान श्रद्धालुओं में खास अहमियत रखता है।
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