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अधिग्रहीत क्षेत्र में न्यास की एक इंच भी जमीन नहीं
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मुस्लिम पक्षकारों ने कहा, असली मालिकों को लौटाई जाए जमीन
अयोध्या। विवादित ढांचा ध्वंस के बाद अधिग्रहीत की गई 67 एकड़ जमीन वापस करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है। केंद्र सरकार ने याचिका दायर कर अधिग्रहीत क्षेत्र वापस मांगा है और न्यास को देने की बात कही है।
जिस पर मुस्लिम पक्ष ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा है कि जब अधिग्रहीत क्षेत्र में रामजन्मभूमि न्यास की एक इंच भी जमीन ही नहीं है तो वह उसे कैसे दी जा सकती है? केंद्र सरकार यदि जमीन वापस ही करना चाहती है तो वह उसके असली मालिकों को वापस की जाए।
मुस्लिम पक्षकार हाजी महबूब बताते हैं कि 67 एकड़ अधिग्रहीत जमीन में रामजन्मभूमि न्यास की एक इंच भी जमीन नहीं है। न्यास है क्या? अधिग्रहीत क्षेत्र में कई लोगों की जमीनें हैं, यदि सरकार लौटाना चाहती है तो जो जमीन के असली मालिक को लौटाए।
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हमें कोई आपत्ति नहीं है। अधिग्रहीत क्षेत्र में कब्रिस्तान भी है। कल्याण सिंह सरकार ने मनमाने ढंग से रामजन्मभूमि न्यास को एक रुपये की लीज पर जमीन दी थी।
1993 में बने अयोध्या एक्ट में साफ कहा गया है कि जिसके पक्ष में फैसला आएगा उसे अधिग्रहीत जमीन दी जाएगी। इससे केंद्र सरकार का कोई लेना देना नहीं है। ऐसे में रामजन्मभूमि न्यास को जमीन कैसे दे जा सकती है। सरकार ने यह चुनावी शिगूफा छोड़ा है।
हेलाल कमेटी के कन्वेनर व अयोध्या मामले के जानकार खालिक अहमद खां बताते हैं कि केंद्र सरकार की याचिका हिंदुओं को मूर्ख बनाने का प्रयास है।
1 मार्च 2003 को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका देकर असलम उर्फ भूरे की याचिका पर 13-14 मार्च 2002 को दिए गए निर्णय को वापस लेने व अधिग्रहीत क्षेत्र में पूजा-पाठ की अनुमति मांगी थी।
जिस पर 31 मार्च 2003 को पांच जजों की बेंच ने कहा था कि जब तक विवादित भूमि पर निर्णय नहीं आ जाता अधिग्रहीत क्षेत्र में कुछ भी नहीं किया जाए।
खालिक अहमद बताते हैं कि 2010 में विवादित भूमि पर एक निर्णय आ चुका है लेकिन इस निर्णय के विरोध में अपील दायर की जा चुकी है जिसका मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है इसलिए यह फाइनल जजमेंट नहीं माना जाएगा।
जब तक फाइनल जजमेंट नहीं आ जाता अधिग्रहीत भूमि पर कुछ नहीं किया जा सकता। अधिग्रहीत क्षेत्र में रामजन्मभूमि न्यास की कोई जमीन नहीं है।
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अयोध्या। विवादित ढांचा ध्वंस के बाद अधिग्रहीत की गई 67 एकड़ जमीन वापस करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है। केंद्र सरकार ने याचिका दायर कर अधिग्रहीत क्षेत्र वापस मांगा है और न्यास को देने की बात कही है।
जिस पर मुस्लिम पक्ष ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा है कि जब अधिग्रहीत क्षेत्र में रामजन्मभूमि न्यास की एक इंच भी जमीन ही नहीं है तो वह उसे कैसे दी जा सकती है? केंद्र सरकार यदि जमीन वापस ही करना चाहती है तो वह उसके असली मालिकों को वापस की जाए।
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मुस्लिम पक्षकार हाजी महबूब बताते हैं कि 67 एकड़ अधिग्रहीत जमीन में रामजन्मभूमि न्यास की एक इंच भी जमीन नहीं है। न्यास है क्या? अधिग्रहीत क्षेत्र में कई लोगों की जमीनें हैं, यदि सरकार लौटाना चाहती है तो जो जमीन के असली मालिक को लौटाए।
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हमें कोई आपत्ति नहीं है। अधिग्रहीत क्षेत्र में कब्रिस्तान भी है। कल्याण सिंह सरकार ने मनमाने ढंग से रामजन्मभूमि न्यास को एक रुपये की लीज पर जमीन दी थी।
1993 में बने अयोध्या एक्ट में साफ कहा गया है कि जिसके पक्ष में फैसला आएगा उसे अधिग्रहीत जमीन दी जाएगी। इससे केंद्र सरकार का कोई लेना देना नहीं है। ऐसे में रामजन्मभूमि न्यास को जमीन कैसे दे जा सकती है। सरकार ने यह चुनावी शिगूफा छोड़ा है।
हेलाल कमेटी के कन्वेनर व अयोध्या मामले के जानकार खालिक अहमद खां बताते हैं कि केंद्र सरकार की याचिका हिंदुओं को मूर्ख बनाने का प्रयास है।
1 मार्च 2003 को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका देकर असलम उर्फ भूरे की याचिका पर 13-14 मार्च 2002 को दिए गए निर्णय को वापस लेने व अधिग्रहीत क्षेत्र में पूजा-पाठ की अनुमति मांगी थी।
जिस पर 31 मार्च 2003 को पांच जजों की बेंच ने कहा था कि जब तक विवादित भूमि पर निर्णय नहीं आ जाता अधिग्रहीत क्षेत्र में कुछ भी नहीं किया जाए।
खालिक अहमद बताते हैं कि 2010 में विवादित भूमि पर एक निर्णय आ चुका है लेकिन इस निर्णय के विरोध में अपील दायर की जा चुकी है जिसका मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है इसलिए यह फाइनल जजमेंट नहीं माना जाएगा।
जब तक फाइनल जजमेंट नहीं आ जाता अधिग्रहीत भूमि पर कुछ नहीं किया जा सकता। अधिग्रहीत क्षेत्र में रामजन्मभूमि न्यास की कोई जमीन नहीं है।