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...ना जाने क्यूं हमें यह जिंदगी इतना सताती है
Updated Tue, 11 Sep 2018 11:32 PM IST
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...ना जाने क्यू हमें यह जिंदगी इतना सताती है
फैजाबाद। अवध साहित्य संगम की मासिक गोष्ठी संस्था के वजीरगंज कार्यालय पर हुई। मुख्य अतिथि के रूप में पं. देव प्रसाद पांडेय मौजूद रहे। सुल्तानपुर, अंबेडकरनगर व बाराबंकी से आए कवियों ने अपनी कविता का पाठ किया।
अजयवीर ने गजल पढ़ी ‘कभी यह रूठ जाती है, कभी यह मुस्कुराती है, ना जाने क्यू हमें यह जिंदगी इतना सताती है...’। रामानंद सागर ने सुनाया कहा ‘कुछ यूं भी जीने की आशा करते हैं, कूड़े में जिंदगी तलाशा करते हैं ...’।
अध्यक्षता कर रहे ब्रहा्रदेव मधुकर ने छंद पढ़ा ‘करत-करत काम चिचुक गये हैं चाम, दिन रात है भिड़ान खेती और बारी मा...’। अंबेडकरनगर से आए सुभाष चौरसिया ने सुनाया ‘कभी चिल्मन से जो देखा तो उनपे प्यार आया था, बयां कैसे करूं उसको जो पहली बार आया था...’।
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रोहित वेद राजपाल ने सुनाया ‘अपने दिल का हाल बताना भी तो बहुत जरूरी है। साथ में रहकर हाथ छुड़ाना यह कैसी मजबूरी है...’। अवधेश पाल ने कहा ‘ऊपर से जो हंसता हूं, मुस्कान हमारी नकली है, अंदर से अपनी हालत भी औरों जैसी पतली है...’।
बाराबंकी से आए आचार्य संतोष अवस्थी ने दोहा पढ़ा ‘नाम रहे संसार में जब तक सूरज चंद जन्म जगत, सादर नमन भारतेन्दु हरिश्चंद्र...’। सुलतानपुर से आऐ देशराज क्रांति ने लोकगीत पढ़ा ‘आई बरखा कै ऋतु बा सुहानी, पिया करत्या किसानी पिया न...’।
जमशेद अहमद ने सुनाया ‘जो मंजिल पर बढ़े हैं वह कदम मेरे ही हैं यारों, मगर रफ्तार पैरों की तुम्हारे हौसलों से है...’। अमित साहिल ने कहा ‘प्यार आँखों में लिए यूं रूठ कर मत जाइये, दिल में चाहत है अगर होठों पर उसको लाइये...’।
अंबेडकरनगर केे दुर्गेश श्रीवास्तव निर्मीक ने व्यंग किया ‘प्रश्नचिह्न है लोकतंत्र पर नेताओं की भाषा, लूट खजाना भरने की है मात्र एक अभिलाषा...’। मिल्कीपुर के अनुजेंद्र अनुज ने कहा ‘राष्ट्र की अखंडता को करते हों खंड-खंड, क्या तुम्हारी आँखों का मर गया पानी है...’।
बीकापुर के कविराज ने छंद पढ़ा ‘हिंदी के आकाश में देवि दिव्य प्रकाश, हिंदी को सर्वथा उजागर बनाइदे...’। इसके अलावा समीर बशर, मुजम्मिल फिदा, शिव प्रसाद गुप्त शिवम, अंजनी कुमार, आनंद शक्ति, सैय्यद असद, दिल अवधपुरी, अरविंद आजाद, वाहिद अली, अजय मौर्या आदि ने कविता पाठ किया। संचालन रामानंद सागर ने किया।
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फैजाबाद। अवध साहित्य संगम की मासिक गोष्ठी संस्था के वजीरगंज कार्यालय पर हुई। मुख्य अतिथि के रूप में पं. देव प्रसाद पांडेय मौजूद रहे। सुल्तानपुर, अंबेडकरनगर व बाराबंकी से आए कवियों ने अपनी कविता का पाठ किया।
अजयवीर ने गजल पढ़ी ‘कभी यह रूठ जाती है, कभी यह मुस्कुराती है, ना जाने क्यू हमें यह जिंदगी इतना सताती है...’। रामानंद सागर ने सुनाया कहा ‘कुछ यूं भी जीने की आशा करते हैं, कूड़े में जिंदगी तलाशा करते हैं ...’।
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अध्यक्षता कर रहे ब्रहा्रदेव मधुकर ने छंद पढ़ा ‘करत-करत काम चिचुक गये हैं चाम, दिन रात है भिड़ान खेती और बारी मा...’। अंबेडकरनगर से आए सुभाष चौरसिया ने सुनाया ‘कभी चिल्मन से जो देखा तो उनपे प्यार आया था, बयां कैसे करूं उसको जो पहली बार आया था...’।
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रोहित वेद राजपाल ने सुनाया ‘अपने दिल का हाल बताना भी तो बहुत जरूरी है। साथ में रहकर हाथ छुड़ाना यह कैसी मजबूरी है...’। अवधेश पाल ने कहा ‘ऊपर से जो हंसता हूं, मुस्कान हमारी नकली है, अंदर से अपनी हालत भी औरों जैसी पतली है...’।
बाराबंकी से आए आचार्य संतोष अवस्थी ने दोहा पढ़ा ‘नाम रहे संसार में जब तक सूरज चंद जन्म जगत, सादर नमन भारतेन्दु हरिश्चंद्र...’। सुलतानपुर से आऐ देशराज क्रांति ने लोकगीत पढ़ा ‘आई बरखा कै ऋतु बा सुहानी, पिया करत्या किसानी पिया न...’।
जमशेद अहमद ने सुनाया ‘जो मंजिल पर बढ़े हैं वह कदम मेरे ही हैं यारों, मगर रफ्तार पैरों की तुम्हारे हौसलों से है...’। अमित साहिल ने कहा ‘प्यार आँखों में लिए यूं रूठ कर मत जाइये, दिल में चाहत है अगर होठों पर उसको लाइये...’।
अंबेडकरनगर केे दुर्गेश श्रीवास्तव निर्मीक ने व्यंग किया ‘प्रश्नचिह्न है लोकतंत्र पर नेताओं की भाषा, लूट खजाना भरने की है मात्र एक अभिलाषा...’। मिल्कीपुर के अनुजेंद्र अनुज ने कहा ‘राष्ट्र की अखंडता को करते हों खंड-खंड, क्या तुम्हारी आँखों का मर गया पानी है...’।
बीकापुर के कविराज ने छंद पढ़ा ‘हिंदी के आकाश में देवि दिव्य प्रकाश, हिंदी को सर्वथा उजागर बनाइदे...’। इसके अलावा समीर बशर, मुजम्मिल फिदा, शिव प्रसाद गुप्त शिवम, अंजनी कुमार, आनंद शक्ति, सैय्यद असद, दिल अवधपुरी, अरविंद आजाद, वाहिद अली, अजय मौर्या आदि ने कविता पाठ किया। संचालन रामानंद सागर ने किया।