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विजय दिवस पर विशेष

Fri, 15 Dec 2017 10:34 PM IST
Updated Fri, 15 Dec 2017 10:34 PM IST
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विजय दिवस पर विशेष
फैजाबाद। अपने पराक्रम से वर्ष 1971 में पाकिस्तान के दांत खट्टे करने वाले शूरवीरों को याद कर लोग आज भी गौरवान्वित हैं। 28 साल की उम्र में देवी प्रकाश सिंह शहीद हुए थे, जिन्हें मरणोपरांत वीर चक्र मिला। विजय प्राप्त करने वाले जिले के कुछ सैनिक आज भी जिंदा हैं। मौजूदा दौर में वे पाक पोषित आतंकवाद के चलते सीमा के हालात को लेकर उनकी चिंता तो है ही, साथ ही 1971 के युद्ध में सैनिकों की जांबाजी, जीत का जश्न और अपने सैनिकों की शहादत का अक्स भी अभी उनके जेहन में है।
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3 दिसंबर 1971 से छिड़े भारत-पाकिस्तान युद्ध जिले के वीर सपूतों ने कड़ाके की ठंड में भूखे, प्यासे रहकर व तमाम यातनाएं सहते हुए अपने पराक्रम के बल पर दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे। 16 दिसंबर को विजय की घोषणा के बाद 17 दिसंबर को सीजफायर का आदेश आने तक देश ने भी बहुत कुछ खोया। देश के लिए बहादुरी से लड़ते हुए मिल्कीपुर के रनापुर निवासी नरसिंह नारायण सिंह, बेनी गद्दोपुर निवासी जगदंबा प्रसाद यादव, बारुन खिहारन निवासी शोभनाथ पाठक, वंदनपुर गोसाईगंज निवासी आनंद प्रकाश तिवारी सहित पांच सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति भी दी थी। सोहावल तहसील के रहीमपुर बदौली निवासी देवीप्रकाश सिंह को मरणोपरांत वीर चक्र से नवाजा गया। 25 वर्ष की उम्र में शादी कर 1965 में ससुराल पहुंची फूलपती सिंह के पति देवी प्रकाश सिंह 28 वर्ष की उम्र में ही भारत-पाक युद्ध के दौरान शहीद हो गए। पत्नी फूलपती कहती हैं कि, सरकार ने मरणोपरांत बीर चक्र से नवाजा लेकिन पलटकर दुबारा कभी किसी ने सुधि नहीं ली। युद्ध में पति की शहादत पर मुझे गर्व है। पीड़ा इस बात की है कि पति व परिवार द्वारा इतनी कुर्बानी देने के बावजूद देश में सत्तारूढ़ सरकारों ने शहीदों और उनके परिजनों को नजरअंदाज कर रखा है। शहीद के भतीजे धर्मपाल सिंह, भानु प्रताप सिंह कहते हैं कि सियासी नेताओं के नाम से समाज में बहुत कुछ है। लेकिन शहीदों के नाम पर कुछ भी देखने को नहीं मिलता, यह अन्याय है। शहीदों के अधिकांश परिवार आज भी कठिनाइयों के बीच जिंदगी गुजार रहे हैं।
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जनपद के सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास केंद्र पर इस समय कुल 6060 सैनिक पंजीकृत हैं। इनमें से इस वर्ष करीब 49 सैनिकों का पुनर्वास भी हुआ है। हालांकि केंद्र से मिलने वाली अधिकांश सेवाएं सैनिक परिवार को यथासंभव मिल रही है, लेकिन यह नाकाफी साबित हो रही है।
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जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कर्नल जीएन सिंह ने बताया कि सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास केंद्र से मिलने वाली सुविधाएं जैसे द्वितीय विश्वयुद्ध में विधवाओं को पेंशन, सैनिक परिवार के हितों में विभिन्न जगहों पर किए जाने वाले पत्र व्यवहार, उनके बच्चों की शिक्षा आदि में होने वाली मदद क्षमतानुरूप किया जा रहा है।

ट्रेनिंग के समय ही आया कारगिल पर जाने का आदेश
सोहावल तहसील के शेखपुर जाफर निवासी भूतपूर्व सैनिक सूबेदार मो. रईस खान कहते हैं कि कोटा में 16 सप्ताह की ट्रेनिंग के बाद अचानक कारगिल पर जाने का आदेश आया। 121 ब्रिगेड की 7 गार्ड्स यूनिट में सौ गोली, एक रायफल सहित कड़ाके की ठंड में कारगिल पर लड़ाई में जाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था, लेकिन देश के नाम पर मर मिटने का जुनून उस पर सदैव हावी रहा। 17 दिसंबर को सीजफायर की घोषणा होने तक यूनिट के बरी 15 लोग शहीद हो गए थे। लेकिन लड़ाई में दुश्मनों को नाकों चने चबाने पर विवश करने के बाद मिली खुशी ने उन जख्मों पर मरहम का काम किया।

भूखे रहे, नारियल के फल से किया जल का प्रयोग
विकासखंड पूराबाजार के ग्रामसभा मड़ना निवासी ओमप्रकाश यादव 1971 के युद्ध में अरुणांचल के वामडीला में तैनात थे। कहते हैं कि युद्ध के दौरान हमारी यूनिट ने धर्मनगर त्रिपुरा उदयपुर से होते हुए नीलिमा, पाकिस्तान में सिख जाट रेजीमेंट के साथ प्रवेश किया। उस समय मैं वायरलेस ऑपरेटर के पद पर नियुक्त था। युद्ध के दौरान कई दिन हम लोग भूखे रहकर लड़ते रहे तथा नारियल के वृक्षों से नारियल का फल तोड़कर जल का प्रयोग करते थे। युद्ध विजयश्री के बाद हम लोग कोमिला पाकिस्तान में सिलेंडर परेड के समय भी उपस्थित रहे।

बांग्लादेशी कैदियों के सुरक्षा में लगे थे पुरुषोत्तम
ग्राम सभा दतावली निवासी पुरुषोत्तम सिंह ने बताया कि 1971 के युद्ध के दौरान उनकी पोस्टिंग लखनऊ में हवलदार के पद पर थी। वह बांग्लादेशी कैदियों के सुरक्षा में लगे थे। युद्ध के दौरान बांग्लादेशी जिलों से निकल कर इधर-उधर भागने के प्रयास में लगे थे, जिनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी हम लोगों पर थी, उस समय देश में अफरा-तफरी का माहौल था।

दुश्मन के गोले गिरते थे तो दिन जैसा होता था उजाला
1971 में दुश्मनों के दांत खट्टे कर देने वाली भारतीय सेना का हिस्सा रहे शेरवाघाट निवासी बाबा सिंह बताते हैं कि 1971 के युद्ध के समय सेना के इलेक्ट्रिकल मैकेनिकल इंजीनियर कोर में सांभा सेक्टर के करौड्डदा नामक झाड़ी के जंगल में हमारी तैनाती थी। यहां से बॉर्डर की दूरी लगभग 12 किलोमीटर थी, जहां हम लोगों ने गड्ढे के अंदर अपना मोर्चा बनाया था। रात में जब दुश्मन के गोले हमारे क्षेत्र में आकर गिरते थे तो दिन जैसा उजाला हो जाता था। एक रात बगल के नाले में एक बम आकर फटा, जिसके कंपन से हमारे मोर्चे की मिट्टी हम लोगों के ऊपर गिर गई और चारों तरफ अंधेरा छा गया। पूरे युद्ध के दौरान यह हमारे लिए सबसे भयावह स्थिति थी। कहते हैं कि सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास केंद्र से अब कोई गिला-शिकवा नहीं है। इस केंद्र की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती। काफी समय पूर्व हमें एक मेडिकल सर्टिफिकेट की जरूरत थी, जिसे केंद्र ने मना कर दिया था।


पूरा परिवार देश के लिए समर्पित
बीकापुर तहसील के देहरियांवा निवासी श्री नारायण तिवारी ने बताया कि 1971 के युद्ध के समय उनकी तैनाती मेजर के पद पर सेना की टुकड़ी के साथ लेह में थी। पाकिस्तान के दो दर्जन से अधिक सैनिकों को सीमा सुरक्षा बल ने बंधक बनाकर कैंप में रखा था। कहते हैं कि उनका पूरा परिवार देश सेवा के लिए समर्पित है। परिवार के कई लोग सेना में विभिन्न पदों पर रहकर देश सेवा कर रहे हैं। उनके पुत्र वर्तमान में ग्राम प्रधान सुदेश तिवारी ने बताया कि अधिक उम्र हो जाने के बावजूद पिताजी अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करते हैं।
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