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मीठे पानी की आस, चंबल के पानी से बुझाते हैं प्यास

Mon, 07 Mar 2022 12:05 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Mon, 07 Mar 2022 12:05 AM IST
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The hope of sweet water quenches thirst with the water of Chambal
चंबल नदी से पानी लाती महिलाएं। - फोटो : ETAWAH
चकरनगर (इटावा)। जिस चंबल नदी में सैकड़ों की संख्या में खूंखार मगरमच्छ, जलीय जीव विचरण करते हैं, जरा सी चूक हो जाए तो पलक झपकते ये हमला बोल दें, विडंबना देखिए कि इसी नदी के पानी से सहसों गांव के ग्रामीण प्यास बुझाने के लिए मजबूर हैं।
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पेयजल के लिए ग्रामीणों को अच्छीखासी मशक्कत करनी पड़ती है। रोजाना गांव से करीब एक किमी. दूर नदी से पानी लाने के बाद गृहस्थी के काम शुरू होते हैं। ठंड तो जैसे-तैसे कट जाती हैं, गर्मी में खासी परेशानी उठानी पड़ती है। बारिश में चंबल में बाढ़ आने पर हालात और भी विषम हो जाते हैं।
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विकास के लाख दावों के बाद भी बड़ी आबादी सड़क, पानी और बिजली जैसे बुनियादी संसाधनों की कमी से जूझ रही है। चकरनगर ब्लॉक का गांव सहसों गांव चंबल और यमुना नदी के बीहड़ में स्थित है। गांव के लोग आज भी अल सुबह उठकर सबसे पहले एक किमी. दूर पानी के लिए चंबल की ओर कूच करते हैं।
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चंबल के अलावा डाल्फिन परियोजना विश्राम गृह का बोरवेल है। बरसात के समय नदी में बाढ़ आने के दौरान पेयजल की समस्या खड़ी हो जाती है। समस्या बढ़ने पर गांव से दूर जाकर बिजली चलित मोटर पंप से पानी लाना पड़ता है। बिजली न आने पर घंटों इंतजार करना पड़ता है।
गरीब तबके के लोगों को ज्यादा परेशानी होती है। कुछ संभ्रांत परिवार घरों में सबमर्सिबल लगवाए हैं। कुछ लोग बाइक से पानी ढोकर लाते हैं।
तीन हजार से अधिक आबादी वाले गांव में मीठे पानी की व्यवस्था न हो पाना बेहद शर्मनाक है। गांव में प्रधान, जिला पंचायत सदस्य हैं। बसपा से एमएलसी भीमराव आंबेडकर इस गांव के दामाद हैं।
राजनीति रसूख होने के बाद भी यहां पानी की व्यवस्था नहीं हो सकी। यहां के पास के गांवों में आरओ सिस्टम लगाए गए, लेकिन यह गांव आज भी पानी की सुविधा से वंचित है।
बुजुर्ग महिलाएं बोलीं आस में गुजर गई उम्र
सोमवती कहती हैं, सारी उम्र गुजर गई मीठा पानी का सपना अधूरा ही रह गया है। दरिया से पानी आने पर घरों में दाल पक रही है।
यहीं की लज्जावती कहतीं हैं कि सरकारें भी आकर तमाम विकास कर गईं, लेकिन सहसों गांव में पीने के पानी की समस्या का समाधान किसी ने नहीं किया। हमारी नई पीढ़ी के लिए ये दुर्भाग्य है।
यहीं की उषा देवी कहतीं हैं कि सुबह उठकर सबसे पहली चिंता घर में मीठे पानी की करनी होती है। जिससे चूल्हा जल सके। चंबल नदी का बहुत बड़ा सहारा है नहीं तो गांव के घरों में खाना बनना मुश्किल हो जाए।
साहब को पता ही नहीं ऐसी कोई समस्या भी है
खंड विकास अधिकारी चकरनगर सतीश चंद्र पांडे ने बताया गांव में पेयजल समस्या की उन्हें जानकारी नहीं है। ग्राम पंचायत स्तर पर बात करके शीघ्र ही गांव में वैकल्पिक तौर पर गर्मी के चलते पेयजल समस्या का समाधान कराया जाएगा जिससे कि ग्रामीणों को पानी के लिए परेशानी का सामना ना करना पड़े।

बोलीं प्रधान
ग्राम प्रधान सोना देवी कहती हैं कि अभी चुनाव चल रहे हैं। चुनाव खत्म होने के बाद ग्राम पंचायत स्तर से गांव में पेयजल की व्यवस्था की जाएगी।
तो ऐसे होगा समस्या का समाधान
चंबल घाटी समग्र विकास आंदोलन के अध्यक्ष सुल्तान सिंह चौहान ने बताया सहसों गांव में पेयजल के लिए प्रशासन को गहरी बोरिंग कराकर मीठे जल स्रोत से पानी उपलब्ध कराना होगा। तभी घरों में पेयजल समस्या का समाधान होगा।
उन्होंने कहा कि ओवरहेड टैंक बनवाकर भी घरों में पानी की सप्लाई की जा सकती है। इस समस्या को लेकर केंद्र व प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर अवगत कराया जाएगा।
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