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आस्था को संजोए 10 वृक्ष बनेंगे जिले की पहचान

Sun, 07 Feb 2021 11:15 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sun, 07 Feb 2021 11:15 PM IST
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10 trees will save the faith, identify the district
बढ़ापुरा के भाऊपुरा गाँव मे दो सौ साल पुराना बरगद का पेड़ - फोटो : ETAWHA
इटावा। पौराणिक और पारंपरिक मान्यताओं के आधार पर सदियों से लोगों की आस्था बने पुरखों के यादगार वृक्ष अब जिले की पहचान बनेंगे। प्रदेश सरकार की ऐतिहासिक वृक्ष संरक्षण योजना के तहत वन विभाग ने जिले के 10 ऐसे वृक्षों को चिह्नित किया है। इन पेड़ों को संरक्षित करके विभाग अब उनके महत्व के बारे में प्रचार प्रसार करेगा। इसके जरिए जिले में इको टूरिज्म का नया रास्ता भी तैयार किया जाएगा।
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जिला वन अधिकारी डॉ. राजेश सिंह वर्मा का कहना है कि योजना में 100 सालों से ज्यादा पुराने ऐसे वृक्षों को चिह्नित किया गया है, जिनका धार्मिक और सामाजिक महत्व भी है। इन पेड़ों की जीओ टैगिंग की जाएगी। जीपीएस लोकेशन के जरिए सर्वे किया गया है।
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डॉ राजेश सिंह वर्मा के मुताबिक पुराने पेड़ कार्बन डाई आक्साइड को ज्यादा अवशोषित करके ज्यादा मात्रा में आक्सीजन उत्सर्जन करते हैं। इनमें बरगद, पीपील और नीम काफी उपयोगी वृक्ष हैं। प्राचीन काल में इन्हें धार्मिक महत्व देकर इनके वैज्ञानिक महत्व को बचाने का प्रयास किया गया था, लेकिन आधुनिकीकरण में अंधाधुंध पेड़ों की कटान में लोग इनके महत्व को भूलते गए। इन पेड़ों के पौराणिक और वैज्ञानिक महत्व से लोगों रुबरू करवाकर इनका संरक्षण करने का प्रयास किया जा रहा।
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सदियों का अतीत संजोए खड़ा है हर पेड़
हैरिटेज ट्री की सूची में शामिल पहला पेड़ वन विभाग कार्यालय परिसर में खड़ा पारिजात (कल्पवृक्ष) का है। मान्यता है कि प्राचीन काल में इटावा जब इष्टिकापुरी था तब से इस पेड़ का अस्तित्व है। मान्यता के अनुसार पृथ्वी पर इस वृक्ष की संख्या केवल 101 है जिसमें से दो इटावा में हैं। बढ़पुरा के कोटरा भाऊपुरा गांव में लगा वट वृक्ष यानी बरगद का पेड़ सूची में दूसरे नंबर का है। इसकी उम्र 200 साल से पुराना माना गया है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक यदुवंशीयों ने यह पेड़ लगाया था। अब यह वहां के लोगों के आस्था में शामिल हो चुका है। महिलाएं हर रोज यहां इच्छापूर्ति के लिए पूजा पाठ करती हैं। जसवंतनगर के सलेमपुर गांव में एक साथ खड़े दो नीम के पेड़ों को स्थानीय लोगों ने दंपति की मान्यता दी है। वन विभाग के मुताबिक करीब 135 साल पुराने दोनों पेड़ जमीदारी प्रथा के गवाह हैं।
इनके नीचे लगने वाली पंचायतों में क्षेत्र के बड़े-बड़े फैसले सुनाए जाते थे। इसके अलावा 140 साल पुराना कंपनी गार्डन का बरगद, बढ़पुरा के सराय भगत, कुंडेश्वर मदायन और जैतपुरा गांव के 100 साल पुराने पीपल, बसरेहर स्थित भोगनीपुर नहर पुल के पास खड़ा 100 साल पुराने दो इमली के वृक्ष सूची में शामिल किए गए हैं।

हर पेड़ का अतीत बनेगा पहचान
डीएफओ डॉ. राजेश सिंह वर्मा का कहना है कि योजना के लिए शासन से बजट मिल रहा है। इससे इन वृक्षों के आसपास चबूतरा और जाली का घेरा बनाकर उनका इतिहास लिखा जाएगा। इसके साथ इनके अतीत की जानकारी से जुड़ी पत्रिकाएं छपेंगी। इन सबके साथ प्रदेश भर में इनका प्रचार-प्रसार करके इको टूरिज्म का रास्ता तैयार किया जाएगा।
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