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बेनी नहीं मुलायम को झुकना होगाः तीन कारण

Thu, 21 Mar 2013 07:04 AM IST
अवनीश पाठक
अवनीश पाठक Updated Thu, 21 Mar 2013 07:04 AM IST
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dispute between beni and mualyam creates problem for congress after dmk's pullout

डीएमके के समर्थन वापसी के बाद लोकसभा में अपना गणित सही करने में जुटी कांग्रेस मुलायम सिंह यादव और बेनी प्रसाद वर्मा की आपसी उठापटक के बीच उलझ गई है।

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विपक्षी दल अविश्वास प्रस्ताव लाने के मूड में नहीं हैं, इसलिए सरकार गिरने की आशंका कम है लेकिन बजट सत्र में कई महत्वपूर्ण बिलों को पास कराने के लिए कांग्रेस को मुलायम सिंह यादव के समर्थन की सख्त जरूरत है।
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हालांकि मुलायम बेनी के इस्तीफे पर अड़ गए हैं। मंगलवार को खुद को बड़ा दिल वाला बताकर बेनी को माफ कर चुके मुलायम फिर उनसे खफा हैं।

वह बेनी के इस आरोप से आहत हैं कि समाजवादी पार्टी केंद्र सरकार को समर्थन करने के बदले कमीशन लेती है। बेनी ने मुलायम के खिलाफ दिए बयानों पर आज खेद भी जता दिया लेकिन सपा अड़ी हुई है।
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इस मुद्दे पर पार्टी की रणनीति क्या होगी, इसे कल होने वाली संसदीय बोर्ड की बैठक तक के लिए टाल दिया गया है।

सपा के बेनी के इस्तीफे पर अड़ने के बाद भी इस बात की कम ही आशंका है कि कांग्रेस उन्हें मंत्री पद से हटाएगी।

राजनीतिक गलियारों से जो बातें निकलकर आ रही हैं, उनके मुताबिक मुलायम को ही झुकना पड़ सकता है। बेनी मंत्री पद पर बने रहेंगे।

कारण 1: बसपा में जा सकते हैं बेनी

72 साल के बेनी प्रसाद वर्मा 2014 लोकसभा चुनावों मे संभवतः अपना आखिरी दांव चलेंगे। अखाड़े के पुराने माहिर मुलायम सिंह यादव उन्हें उस दांव से पहले ही पटखनी देने की कोशिश कर रहे हैं।

हालांकि संभावना यह भी है कि कांग्रेस बेनी को मंत्री पद से हटाती है तो वे बसपा में जा सकते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल के मुताबिक, ‘बेनी प्रसाद वर्मा विधानसभा चुनावों में बसपा से गठबंधन की वकालत कर चुके हैं। कांग्रेस ने उन्हें मंत्री पद से हटाया तो वे बसपा में शामिल हो सकते हैं।’

बेनी का बसपा में शामिल होना कांग्रेस के लिए तो नुकसानदेह होगा ही, सपा के लिए लोकसभा चुनावों में नई चुनौती खड़ी कर सकता है।

कांग्रेस और सपा दोनों ही इस दांव से परहेज करेंगे, इसकी पूरी संभावना है।

कारण 2: पिछड़े नेता होने का होगा फायदा

बेनी प्रसाद वर्मा उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जाति के कद्दावर नेताओं में हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में विशेषकर गोंडा, बलरामपुर, श्रावस्ती और बाराबंकी में कुर्मी वोट बैंक पर उनकी मजबूत पकड़ है।

रतन मणि लाल के मुताबिक, ‘इस बात का अंदाजा मुलायम को भी है कि बेनी के साथ एक मजबूत वोट बैंक है। ऐसे में वो ये कतई नहीं चाहेंगे कि बेनी बसपा में जाएं और उनके लिए नई चुनौती बनी।’

सत्ता विरोधी लहर के कारण उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों में कांग्रेस 2009 जैसा प्रदर्शन दोहरा पाएगी, इसकी संभावना कम ही है।

ऐसे में बेनी का कांग्रेस में होना सपा को कम नुकसान पहुंचाएगा लेकिन उनका बसपा में जाना मुलायम सिंह के प्रधानमंत्री बनने के मंसूबों पर पानी फेर सकता है।


कारण 3: कांग्रेस के पास नहीं बेनी के कद का नेता

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास बेनी प्रसाद वर्मा के कद का नेता नहीं है। कांग्रेस आला कमान को भी इस बात का अंदाजा है कि लोकसभा चुनावों में पिछला प्रदर्शन दोहराने के लिए उसे पिछड़ी जातियों के वोट की सख्त जरूरत है।

पिछड़ी जातियों का सशक्त चेहरा होने के कारण कांग्रेस यूपी चुनावों में उन्हें तुरुप के इक्के के रूप में इस्तेमाल कर सकती है।

सत्ता विरोधी लहर के बाद भी कांग्रेस मुसलमानों और कुर्मी वोट बैंक को जोड़कर कुछ हद तक फायदे में रह सकती है। ऐसे में कांग्रेस बेनी को हटाने का खतरा मोल लेगी, इसकी आशंका कम ही है।

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