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‘जिंदगी से जुड़ा है नदियों का अस्तित्व’
देविररिया, अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 05 Jun 2016 12:26 AM IST
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नदी
- फोटो : अमर उजाला
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नदी का उफान जितना खतरनाक है, उससे कहीं ज्यादा नदी का सूखना।
नदियों का जलस्तर घटने की जितनी बड़ी वजह बांध हैं, उससे ज्यादा बड़ी वजहों में शामिल है नदी की निर्मल धारा में समाता कचरा और उद्योगों का जहरीला प्रवाह।
एक और बड़ी समस्या बढ़ी है नदियों के रूप-स्वरूप से छेड़छाड़ की। नदियों के किनारे से लेकर तलहटी तक खंगाल रहे खनन माफिया के दखल और जमीन को कारोबार मानने वालों के बढ़ते कदमों ने नदी ही नहीं तटों का अस्तित्व भी खतरे में पहुंचा दिया है। तेजी से लुप्त हो रहीं रेतीली हदें न नदी को मूल स्वरूप की धार दे पा रही हैं न ही अच्छी बरसात से बढ़ने वाले जल स्तर को बांधने का माद्दा उनमें बचा है। यही वजह है कि जेठ और बैसाख की तपिश में जब इंसान से लेकर जानवर तक जल में जीवन की तलाश से चूक जाते हैं, वहीं अच्छी बरसात वाला चौमास बाढ़ की तबाही के कारण कई मास तक रुलाता है।
जिले में बह रही घाघरा, राप्ती और छोटी गंडक नदियों का आम इंसान की जिंदगी से गहरा नाता रहा है। एक दौर था कि जब लोगों की दिनचर्या नदी से शुरू होती थी। नदियों के किनारे मल्लाह जाति के लोग खरबूज, तरबूज, खीरा, ककड़ी आदि की खेती कर अपने परिवार की जीविका चलाते थे। बरहज इलाके में बहने वाली घाघरा नदी की बात करें या रुद्रपुर के सौ किलोमीटर क्षेत्र में बहने वाली राप्ती नदी की।
ये नदियां किसी जमाने में जल मार्ग से देश-विदेश में व्यवसाय का प्रमुख जरिया रहीं। इस नदी का हर घाट व्यवसायिक बंदरगाह कहा जाता है। घाघरा के बरहज तट पर कोलकाता से व्यवसाय होता था। बरहज बड़ा व्यवसायिक केंद्र था। मदनपुर में गोर्रा और राप्ती के संगम स्थल पर मालवाहक जहाज उतरा करते थे। चार दशक पहले बड़ा गल्ला मंडी था। यहां पानी के छोटे जहाज और बडे़ स्टीमर से चावल, गेहूं और कपड़े लाद कर बड़े व्यवसायी लाते थे। मदनपुर के गोलाघाट से माल जनपद के कोने में जाता था। इन नदियों में घाघरा को सरयू नदी के नाम से भी पुकारते हैं। तिब्बत के पठार में स्थित मापचाचुंग हिमनदी से निकलकर नेपाल में बहने के बाद भारत में प्रवेश करती है।
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सहायक नदी शारदा का जल लेकर छपरा के निकट गंगा नदी में मिलती है। राप्ती पूर्वी नेपाल की लघु हिमालय श्रेणियों में धौलागिरि के दक्षिण में रुकुमकोट के निकट से निकलकर पहले दक्षिण में और फिर पश्चिम में बहती है। उसके बाद दोबारा दक्षिण की ओर बहने के बाद बहराइच, गोंडा, बस्ती और गोरखपुर जिलों में बहती हुई बरहज के निकट घाघरा नदी से मिल जाती है। छोटी गंडक नेपाल से निकलकर उत्तर प्रदेश में प्रवेश करती है। महराजगंज, कुशीनगर, देवरिया जिले से होते हुए घाघरा में मिल जाती है।
नदियों का जलस्तर घटने की जितनी बड़ी वजह बांध हैं, उससे ज्यादा बड़ी वजहों में शामिल है नदी की निर्मल धारा में समाता कचरा और उद्योगों का जहरीला प्रवाह।
एक और बड़ी समस्या बढ़ी है नदियों के रूप-स्वरूप से छेड़छाड़ की। नदियों के किनारे से लेकर तलहटी तक खंगाल रहे खनन माफिया के दखल और जमीन को कारोबार मानने वालों के बढ़ते कदमों ने नदी ही नहीं तटों का अस्तित्व भी खतरे में पहुंचा दिया है। तेजी से लुप्त हो रहीं रेतीली हदें न नदी को मूल स्वरूप की धार दे पा रही हैं न ही अच्छी बरसात से बढ़ने वाले जल स्तर को बांधने का माद्दा उनमें बचा है। यही वजह है कि जेठ और बैसाख की तपिश में जब इंसान से लेकर जानवर तक जल में जीवन की तलाश से चूक जाते हैं, वहीं अच्छी बरसात वाला चौमास बाढ़ की तबाही के कारण कई मास तक रुलाता है।
जिले में बह रही घाघरा, राप्ती और छोटी गंडक नदियों का आम इंसान की जिंदगी से गहरा नाता रहा है। एक दौर था कि जब लोगों की दिनचर्या नदी से शुरू होती थी। नदियों के किनारे मल्लाह जाति के लोग खरबूज, तरबूज, खीरा, ककड़ी आदि की खेती कर अपने परिवार की जीविका चलाते थे। बरहज इलाके में बहने वाली घाघरा नदी की बात करें या रुद्रपुर के सौ किलोमीटर क्षेत्र में बहने वाली राप्ती नदी की।
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ये नदियां किसी जमाने में जल मार्ग से देश-विदेश में व्यवसाय का प्रमुख जरिया रहीं। इस नदी का हर घाट व्यवसायिक बंदरगाह कहा जाता है। घाघरा के बरहज तट पर कोलकाता से व्यवसाय होता था। बरहज बड़ा व्यवसायिक केंद्र था। मदनपुर में गोर्रा और राप्ती के संगम स्थल पर मालवाहक जहाज उतरा करते थे। चार दशक पहले बड़ा गल्ला मंडी था। यहां पानी के छोटे जहाज और बडे़ स्टीमर से चावल, गेहूं और कपड़े लाद कर बड़े व्यवसायी लाते थे। मदनपुर के गोलाघाट से माल जनपद के कोने में जाता था। इन नदियों में घाघरा को सरयू नदी के नाम से भी पुकारते हैं। तिब्बत के पठार में स्थित मापचाचुंग हिमनदी से निकलकर नेपाल में बहने के बाद भारत में प्रवेश करती है।
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सहायक नदी शारदा का जल लेकर छपरा के निकट गंगा नदी में मिलती है। राप्ती पूर्वी नेपाल की लघु हिमालय श्रेणियों में धौलागिरि के दक्षिण में रुकुमकोट के निकट से निकलकर पहले दक्षिण में और फिर पश्चिम में बहती है। उसके बाद दोबारा दक्षिण की ओर बहने के बाद बहराइच, गोंडा, बस्ती और गोरखपुर जिलों में बहती हुई बरहज के निकट घाघरा नदी से मिल जाती है। छोटी गंडक नेपाल से निकलकर उत्तर प्रदेश में प्रवेश करती है। महराजगंज, कुशीनगर, देवरिया जिले से होते हुए घाघरा में मिल जाती है।