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Deoria News: सावधान! रंगों की चमक कहीं बिगाड़ न दे चेहरे की रंगत

Mon, 02 Mar 2026 12:59 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 02 Mar 2026 12:59 AM IST
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Be careful! The brightness of the colors may ruin your complexion.
बाजार में बिक रहे अबीर-गुलाल।
पडरौना। होली उत्साह का पर्व है, लेकिन कभी-कभी लापरवाही इस पर्व के उत्साह में खलल डाल देती है। बाजार में बड़ी मात्रा में केमिकलयुक्त रंग और अबीर बिक रहे हैं। इसके इस्तेमाल से त्वचा की सेहत बिगड़ सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, केमिकल युक्त रंग से त्वचा पर एलर्जी, रूखापन, दाग, जलन, खुजली, लाल निशान और पिंपल्स आने लग सकते हैं।
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होली पर हर ओर रंग अबीर-गुलाल नजर आते है। बिना रंगों की होली की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ऐसे में होली पर चारों ओर रंग अबीर की दुकानें नजर आने लगी हैं। होली के समय में रंग का कारोबार करने को लेकर बाजार में होली केमिकल वाले और नकली रंग भी बाजार पहुंच चुके हैं। दुकानदार अक्सर हर्बल रंगों के आड़ में नकली रंग बेचते हैं। केमिकलयुक्त रंग इतने खतरनाक होते हैं कि आंखों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। वहीं चेहरे को बदसूरत भी बना सकती है। इसलिए होली पर केमिकल रहित रंगों का प्रयोग करना चाहिए। होली के रंग को खरीदने से पहले इसकी परख कर लें।
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पर्व होली शहर के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों की बाजार सज चुके हैं। शहर के गुदरी बाजार, तिलक चौक, मेन बाजार, कोतवाली रोड, सुभाष चौक समेत अन्य सभी बाजारों में रंग, अबीर और गुलाल की दुकानों पर लोग खरीदारी कर रहे हैं। लेकिन खुशियों के इन रंगों में मिलावट की काली परछाईं भी घुलती दिख रही है। मोटी कमाई के लालच में कुछ कारोबारी अबीर और गुलाल में बालू मिलाकर वजन बढ़ा रहे हैं, तो रंग को ज्यादा चटक बनाने के लिए सस्ते और हानिकारक केमिकल का इस्तेमाल किया जा रहा है। महक के नाम पर रासायनिक सेंट मिलाए जा रहे हैं, जिनसे त्वचा रोग और एलर्जी का खतरा बढ़ रहा है। शहर में बिकने वाले रंग और अबीर की अधिकांश खेप गोरखपुर और वाराणसी से होती है। शहर में बिक रहे अबीर 30 रुपये किलोग्राम से लेकर 200 रुपये किलोग्राम तक के हैं। इसमें एक किलोग्राम के पैकेट के साथ 10 किलोग्राम तक की झोली में अबीर बिक रही है। वहीं, रंग की बात करें तो 700 से 1500 रुपये किलोग्राम तक का रंग बाजार में है। उसे 100 ग्राम, 50 ग्राम के हिसाब से बिक्री की जाती है। गाढ़ा और चटक करने के लिए रंग में केमिकल का प्रयोग होता है। कमोबेश इसी प्रकार का खेल पूरे जनपद में चलता है। सूत्र बताते हैं कि कम कीमत वाले रंगों में वजन बढ़ाने के लिए बालू या महीन धूल मिलाई जाती है। रंग को गाढ़ा और चटक दिखाने के लिए इंडस्ट्रियल डाई और सस्ते केमिकल डाले जाते हैं, जो त्वचा और आंखों के लिए खतरनाक हो सकते हैं।
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