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मर्ज से पहले न मार दे अपनों की बेरुखी
deoria
Updated Tue, 03 May 2016 10:47 PM IST
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मदद
- फोटो : anoop tiwari
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देवरिया में इस भरी दुनिया में कोई भी हमारा न हुआ, गैर तो गैर हैं अपनों का सहारा न हुआ। वर्ष 1963 में बनी ‘भरोसा’ फिल्म का यह गीत परिचालक जीतेंद्र यादव पर सटीक बैठता है। बीमारी से काम छूटा तो परिवारवालों ने भी उसका साथ छोड़ दिया है।
रुद्रपुर, परसा जंगल के जीतेंद्र यादव पिता के निधन के बाद रोडवेज में परिचालक के पद पर नौकरी पा गए। परिवार में मां, पत्नी, बच्चे और दो भाई हैं। जीतेंद्र के हृदय का वाल्व खराब हो गया है। इससे वह एक वर्ष से नौकरी नहीं कर पा रहा है। विभाग नियमों का हवाला देकर वेतन नहीं दे रहा है। उधर, जब जीतेंद्र की तबीयत बिगड़ने लगी तो पत्नी बच्चों को साथ उसे छोड़कर चली गई। भाइयों ने घर से भगा दिया है।
इसके बाद जीतेंद्र रोडवेज परिसर में आ गया। वह यहीं पर रहता है। साथ के लोग या तो उसे कुछ दे देते हैं या वह उनसे मांग लेता है। गनीमत है कि विभाग के लोग अभी उसकी मदद कर रहे हैं। जीतेंद्र का कहना है कि उसने लखनऊ पीजीआई में दिखाया तो डॉक्टर ने वाल्व बदलने की बात कहा है। इतने रुपये नहीं हैं कि वह वाल्व बदलवा सके। उसका कहना है कि उसे अपने से ज्यादा बूढ़ी मां की चिंता है। आखिर उसका सहारा कौन बनेगा? उसने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मदद की गुहार लगाई है।
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रोडवेज के लोग कर रहे मदद
रोडवेज के एक कर्मचारी नेता ने मंगलवार को उसकी मदद में जुटे थे। वह यहां के कर्मचारियों और परिचालकों से मदद के लिए रुपये मांग रहे थे। लोगों ने उसकी मदद में रुपये दिए भी, लेकिन यह इतना नहीं हो पा रहा है कि उसका उपचार कराया जा सके। इससे तो उसका भोजन और पानी ही चल पा रहा है।
कोट-
बीमार परिचालक के बारे में जानकारी है। वह यहां से रेफर हो और पीजीआई से उपचार में होने वाले खर्च का इस्टीमेट बनवाकर लाए। विभाग से रुपये पास कराकर उसके उपचार के लिए दे दिया जाएगा। - एसएन पाठक, सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक, देवरिया।
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रुद्रपुर, परसा जंगल के जीतेंद्र यादव पिता के निधन के बाद रोडवेज में परिचालक के पद पर नौकरी पा गए। परिवार में मां, पत्नी, बच्चे और दो भाई हैं। जीतेंद्र के हृदय का वाल्व खराब हो गया है। इससे वह एक वर्ष से नौकरी नहीं कर पा रहा है। विभाग नियमों का हवाला देकर वेतन नहीं दे रहा है। उधर, जब जीतेंद्र की तबीयत बिगड़ने लगी तो पत्नी बच्चों को साथ उसे छोड़कर चली गई। भाइयों ने घर से भगा दिया है।
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इसके बाद जीतेंद्र रोडवेज परिसर में आ गया। वह यहीं पर रहता है। साथ के लोग या तो उसे कुछ दे देते हैं या वह उनसे मांग लेता है। गनीमत है कि विभाग के लोग अभी उसकी मदद कर रहे हैं। जीतेंद्र का कहना है कि उसने लखनऊ पीजीआई में दिखाया तो डॉक्टर ने वाल्व बदलने की बात कहा है। इतने रुपये नहीं हैं कि वह वाल्व बदलवा सके। उसका कहना है कि उसे अपने से ज्यादा बूढ़ी मां की चिंता है। आखिर उसका सहारा कौन बनेगा? उसने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मदद की गुहार लगाई है।
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रोडवेज के लोग कर रहे मदद
रोडवेज के एक कर्मचारी नेता ने मंगलवार को उसकी मदद में जुटे थे। वह यहां के कर्मचारियों और परिचालकों से मदद के लिए रुपये मांग रहे थे। लोगों ने उसकी मदद में रुपये दिए भी, लेकिन यह इतना नहीं हो पा रहा है कि उसका उपचार कराया जा सके। इससे तो उसका भोजन और पानी ही चल पा रहा है।
कोट-
बीमार परिचालक के बारे में जानकारी है। वह यहां से रेफर हो और पीजीआई से उपचार में होने वाले खर्च का इस्टीमेट बनवाकर लाए। विभाग से रुपये पास कराकर उसके उपचार के लिए दे दिया जाएगा। - एसएन पाठक, सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक, देवरिया।