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डैमेज कंट्रोल के साथ मोदी पर भी सपा की निगाहें
प्रदीप अवस्थी/इटावा
Updated Thu, 03 Oct 2013 08:13 AM IST
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उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी की चुनावी जनसभाओं की तारीखें घोषित होने से सबसे ज्यादा हलचल समाजवादी पार्टी में मची है।
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मुजफ्फरनगर दंगे के बाद डैमेज कंट्रोल में जुटी सपा अब मोदी की जनसभाओं का जवाब देने के साथ ही प्रदेश में उनके सियासी प्रभाव को निष्क्रिय करने की रणनीति बना रही है।
इटावा और मैनपुरी में पांच अक्तूबर को मुख्यमंत्री और सपा मुखिया की होने वाली जनसभाओं को इसी रणनीति का हिस्सा मानकर देखा जा रहा है।
मुजफ्फरनगर कांड के बाद प्रदेश सरकार की जो किरकिरी हो रही है, उसका असर सपा के गढ़ माने जाने वाले इटावा के आसपास के छह जिलों में भी महसूस हो रहा है।
यही वजह है कि मोदी की कानपुर में 19 अक्तूबर को होने वाली रैली से पहले ही सपा मुखिया और मुख्यमंत्री जनता का भरोसा जीतने के लिए जनसभाओं के जरिए जी तोड़ कोशिश में जुटे हैं।
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इटावा के लाल को उत्तर प्रदेश की कमान संभाले पूरे डेढ़ साल हो गए। इस अवधि में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मुलायम सिंह अपने गृह जनपद की जनता से सीधे रूबरू नहीं हुए। विधानसभा चुनाव जीतने के बाद यह पहला मौका है, जब मुलायम सिंह और मुख्यमंत्री इटावा नगर में जनता को संबोधित करेंगे।
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मुजफ्फरनगर कांड में फंसी सरकार और पार्टी के आला नेताओं के इटावा में जनसभा करने के कई सियासी मायने हैं। इस डेढ़ साल के अंतराल में कानून व्यवस्था समेत कई मसलों पर प्रमुख विपक्षी दल बसपा और भाजपा के नेता यहां सरकार के खिलाफ कई जनसभाएं कर चुके हैं लेकिन अति आत्मविश्वास से लबरेज सपा ने किसी की परवाह नहीं की।
तब भी नहीं, जब दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम मौलाना अहमद बुखारी और बसपा नेताओं ने अलग-अलग रैलियां कर सपा के गढ़ में ही अल्पसंख्यक वोटरों पर डोरे डालने की जुगत की थी।
पार्टी के सूत्र बताते हैं कि इधर लोकसभा चुनाव की घोषणा होने से पहले पार्टी का जनसभाएं करने का कोई प्रोग्राम भी नहीं था। अचानक यह जरूरत इस वजह से आ पड़ी, क्योंकि पहले प्रदेश में कानून व्यवस्था और अब मुजफ्फरनगर कांड से पार्टी का जनाधार घटा है।
सूत्रों का कहना है कि जहां ज्यादा डैमेज है, वहां कंट्रोल करना इतना आसान नहीं, इसीलिए भरपाई की शुरुआत वहां से की जा रही है, जहां जनाधार अभी मजबूत है।