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Chitrakoot News: पेट्रोमैक्स की रोशनी और एक तंबू में होती थी रामलीला
Wed, 07 Oct 2026 11:51 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चित्रकूट
संवाद न्यूज एजेंसी, चित्रकूट
Updated Wed, 07 Oct 2026 11:51 PM IST
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07 सीकेटीपी-14-पुराने समय में आयोजन की रामलीला के तस्वीर। आर्काइव।
चित्रकूट। पेट्रोमैक्स की रोशनी, एक तंबू और संगीत की धुन... इन्हीं सीमित साधनों से पुरानी बाजार में शुरू हुई रामलीला आज 165वें साल में पहुंच गई है। समय के साथ मंच, सजावट और संगीत आधुनिक हो गए, लेकिन रामकथा के प्रसंग और धर्मनगरी की आस्था आज भी वही है।
इस परंपरा की शुरुआत 1862 में मराठा शासकों के वंशज काशीनाथ राव गोरे ने कराई थी। शुरुआती दौर में मंचन मौन शैली में होता था। कलाकार संवाद नहीं बोलते थे, बल्कि संगीत की धुनों पर प्रसंग प्रस्तुत किए जाते थे। एक तंबू में पेट्रोमैक्स जलाकर शुरू हुआ यह आयोजन धीरे-धीरे लोगों की आस्था से जुड़ता गया और शहर की धार्मिक पहचान बन गया।
अंग्रेजों के दौर में भी यह परंपरा नहीं टूटी। वर्तमान में नगर पालिका अध्यक्ष नरेंद्र गुप्ता रामलीला कमेटी के अध्यक्ष हैं। परिवार के वंशज बसंत गोरे के अनुसार उसी स्थान पर आज भी मंचन होता है। अब मथुरा-वृंदावन के कलाकार लीला का मंचन करते हैं। कमेटी के अनुसार इस बार तीन अक्तूबर से शुरू रामलीला 20 तक चलेगी। रावण वध के साथ समापन होगा। बसंत गोरे बताते हैं कि 1862 से इसी स्थान पर मंचन हो रहा है। कई दशकों तक पुरानी कमेटी ने आयोजन कराया, अब नई पीढ़ी ने जिम्मेदारी संभाल ली है।
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चंदे से बना भवन, पीढ़ियों ने संभाली परंपरा
बाद में रामलीला के लिए निजी जमीन मिली। सेठ हरवंश प्रसाद, गौरीशंकर केशरवानी समेत अन्य लोगों ने चंदा जुटाकर भवन बनवाया। पुरुषोत्तम रिछारिया, सरजू चौरसिया, महादेव शुक्ला, चुन्ना, विजय मिश्रा और बसंत गोरे के सहयोग से लंबे समय तक आयोजन चलता रहा। अब स्वरूप बदल गया है। मथुरा-वृंदावन के कलाकार मंचन करते हैं। आधुनिक लाइट, साज-सज्जा और भक्ति संगीत ने नया रूप दिया है।
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इस परंपरा की शुरुआत 1862 में मराठा शासकों के वंशज काशीनाथ राव गोरे ने कराई थी। शुरुआती दौर में मंचन मौन शैली में होता था। कलाकार संवाद नहीं बोलते थे, बल्कि संगीत की धुनों पर प्रसंग प्रस्तुत किए जाते थे। एक तंबू में पेट्रोमैक्स जलाकर शुरू हुआ यह आयोजन धीरे-धीरे लोगों की आस्था से जुड़ता गया और शहर की धार्मिक पहचान बन गया।
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अंग्रेजों के दौर में भी यह परंपरा नहीं टूटी। वर्तमान में नगर पालिका अध्यक्ष नरेंद्र गुप्ता रामलीला कमेटी के अध्यक्ष हैं। परिवार के वंशज बसंत गोरे के अनुसार उसी स्थान पर आज भी मंचन होता है। अब मथुरा-वृंदावन के कलाकार लीला का मंचन करते हैं। कमेटी के अनुसार इस बार तीन अक्तूबर से शुरू रामलीला 20 तक चलेगी। रावण वध के साथ समापन होगा। बसंत गोरे बताते हैं कि 1862 से इसी स्थान पर मंचन हो रहा है। कई दशकों तक पुरानी कमेटी ने आयोजन कराया, अब नई पीढ़ी ने जिम्मेदारी संभाल ली है।
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चंदे से बना भवन, पीढ़ियों ने संभाली परंपरा
बाद में रामलीला के लिए निजी जमीन मिली। सेठ हरवंश प्रसाद, गौरीशंकर केशरवानी समेत अन्य लोगों ने चंदा जुटाकर भवन बनवाया। पुरुषोत्तम रिछारिया, सरजू चौरसिया, महादेव शुक्ला, चुन्ना, विजय मिश्रा और बसंत गोरे के सहयोग से लंबे समय तक आयोजन चलता रहा। अब स्वरूप बदल गया है। मथुरा-वृंदावन के कलाकार मंचन करते हैं। आधुनिक लाइट, साज-सज्जा और भक्ति संगीत ने नया रूप दिया है।