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Chitrakoot News: भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रम में शामिल करें

Wed, 19 Aug 2026 11:56 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Wed, 19 Aug 2026 11:56 PM IST
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Incorporate the Indian knowledge tradition into the curriculum.Incorporate the Indian knowledge tradition into the curriculum.
रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय में कार्यशाला में वक्ताओं ने रखे विचार
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संवाद न्यूज एजेंसी
चित्रकूट। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ एवं जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय की पंच दिवसीय राष्ट्रीय प्रमाणपत्रीय कार्यशाला में बुधवार को भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र में रही। विद्वानों ने इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के साथ जोड़कर व्यवहार में उतारने पर बल दिया।
प्रथम सत्र में महर्षि पाणिनि संस्कृत विश्वविद्यालय, उज्जैन के प्रो. तुलसीदास परौहा ने कहा, कि भारतीय शिक्षा का प्रत्येक पक्ष भारतीय ज्ञान परंपरा से अनुप्राणित है। एनईपी के सफल क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है कि इसके अनुप्रयोगों को समझकर पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाया जाए। प्रतापगढ़ से पधारी डॉ. रेणु देवी ने कहा कि वाल्मीकि रामायण का सुंदरकांड भारतीय ज्ञान परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है।
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द्वितीय सत्र में शिक्षा संकाय के डॉ. दुर्गेश कुमार मिश्र ने कहा, कि बिना चारित्रिक विकास और नैतिक शिक्षा के ज्ञान अधूरा है। प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन हमें इस तरह करना चाहिए कि हम उसे जीवन में उतारकर आदर्श समाज बना सकें। विशिष्ट अतिथि डॉ. रजनीश कुमार सिंह ने अपने शोधपरक आलेख में बताया कि भारतीय ज्ञान परंपरा की जड़ें भारत तक सीमित नहीं, विश्व के अनेक देशों तक फैली हैं।
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संगीत विभाग के डॉ. गोपाल कुमार मिश्र ने इसकी प्रासंगिकता पर जोर दिया। भाषा संकाय के अधिष्ठाता डॉ. शशिकांत त्रिपाठी ने उदाहरणों से इसके शाश्वत स्वरूप को रेखांकित किया। अध्यक्षता करते हुए अधिष्ठाता डॉ. विनोद कुमार मिश्र ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत नहीं, वर्तमान की भी आवश्यकता है। कुलपति प्रो. शिशिर कुमार पांडेय, कुलसचिव डॉ. मधुरेंद्र कुमार पर्वत, डॉ. प्रतिमा कुमारी शुक्ला, डॉ. सुमेरीलाल, डॉ. रवि प्रकाश चौधरी ने विचार रखे। संचालन डॉ. शांत कुमार चतुर्वेदी और संयोजन डॉ. प्रमिला मिश्रा ने किया।
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