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आलू ने किसानों का दिवाला निकाला
अमर उजाला ब्यूरो उझानी (बदायूं)।
Updated Mon, 27 Mar 2017 12:21 AM IST
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potato
- फोटो : amar ujala
- प्रति बीघा फसल की लागत पर तीन हजार रुपया तक घाटा
- रकबा बढ़ा और उत्पादन भी अच्छा पर रेट मिल रहा बहुत कम
सब्जियों के राजा कहे जाने वाले आलू ने इस बार उत्पादक किसानों का करारा झटका दिया है। पहले के मुकाबले रकबे में बढ़ोत्तरी और उत्पादन भी अच्छा खासा रहा लेकिन मार्केट में आलू के रेट ने लागत भी करीब नहीं आने दी। प्रति बीघा करीब 10 हजार रुपया लागत लगाने वाले किसान मार्केट से सात हजार रुपये से अधिक नहीं उठा पाए। आलू के रेट में फिलहाल आंशिक बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन अब तक फसल का 80 फीसदी से अधिक का हिस्सा मार्केट में पहुंच चुका है।
आलू की खेती इस कदर घाटे का सौदा साबित होगी, यह सोचकर उत्पादक किसान सिहर उठते हैं। पिछले साल सीजन में ही आलू ने उत्पादकों की जेब गर्म कर दी थी। उसी नतीजा रहा जो इस बार रकबे में करीब 20 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हुई थी। लागत को लेकर किसानों के एक अनुमान पर गौर करें तो प्रति बीघा खेती पर बीज, सिंचाई और खाद से लेकर खुदाई तक करीब 10 हजार रुपया खर्च हो गया। उत्पादन तो पहले अच्छा रहा, लेकिन मार्केट में निरंतर गिरते गए रेट की वजह से उत्पादकों को प्रति बीघा 20 क्विंटल के आसपास ही उत्पादन मिला जो कुल मिलाकर सात हजार रुपये से अधिक नहीं बनता। आलू के व्यापार से जुड़े राजू चौधरी कहते हैं कि किसानों को तो नुकसान हुआ ही लेकिन घाटे में थोक का व्यापार करने वाले भी रहे हैं। शीतगृहों में उत्पादन का 90 फीसदी तक हिस्सा पहुंच चुका है। ऐसे में किसानों को ज्यादा फायदे की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। खेतों में जो आलू बचा है, वह हाइब्रिड प्रजाति में सफेद-3797 और गुलाल- 250 है। इधर, बेकदरी से आहत कुछ किसानों का तो आलू से मोहभंग होने लगा है। इसके पीछे उनका तर्क है कि कर्ज डूब जाने से अच्छा है कि कैश क्राप की ओर गौर किया जाए।
आलू ने कर दिया है बेहाल
देवर मई गांव के थान सिंह आलू की खेती करके आहत नजर आए। बोले, आलू की फसल की लागत पूरी करने के लिए उन्होंने जेवरात भी गिरवीं रख दिए। अब तो सूद चुकाने लायक भी रुपये नहीं बचे हैं। पूरे साल की मेहनत पर पानी फिर गया है।
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खुशनसीब हूं जो आलू से बच गया
इलाके के गांव पीयरखंदना निवासी रायसिंह खुद को भाग्यशाली मानता है। बताया कि बच्चों ने जिद की थी कि आलू करेंगे लेकिन अचानक ही मन बदल गया। उस वक्त लागत के लिए ज्यादा पैसे भी उपलब्ध नहीं थे। आलू उत्पादकों को हाल देख परेशानी होती है।
अगले साल भी नहीं कर सकेंगे भरपाई
चंदौरा गांव के गंगा सिंह का कहना है कि आलू की खेती से उसे जो आर्थिक नुकसान हुआ है उसकी भरपाई के लिए एक-दो साल लग जाएगा। भरपाई भी तभी संभव है जब आगे चलकर आलू की फसल का रेट प्रति क्विंटल पांच-छह सौ रुपया मिले।
हिम्मत नहीं हारी है फिर करेंगे आलू
आलू की बेकदरी से परेशान किसानों में नरऊ गांव के महावीर सिंह ऐसे किसान हैं जो नुकसान के बाद भी हौसला बढ़ाए हुए हैं। बताया कि खेती में नफा-नुकसान तो चलता है, लेकिन यह तो नहीं कि खेती ही छोड़ दी जाए। अगले साल फिर आलू का उत्पादन करेंगे।
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- रकबा बढ़ा और उत्पादन भी अच्छा पर रेट मिल रहा बहुत कम
सब्जियों के राजा कहे जाने वाले आलू ने इस बार उत्पादक किसानों का करारा झटका दिया है। पहले के मुकाबले रकबे में बढ़ोत्तरी और उत्पादन भी अच्छा खासा रहा लेकिन मार्केट में आलू के रेट ने लागत भी करीब नहीं आने दी। प्रति बीघा करीब 10 हजार रुपया लागत लगाने वाले किसान मार्केट से सात हजार रुपये से अधिक नहीं उठा पाए। आलू के रेट में फिलहाल आंशिक बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन अब तक फसल का 80 फीसदी से अधिक का हिस्सा मार्केट में पहुंच चुका है।
आलू की खेती इस कदर घाटे का सौदा साबित होगी, यह सोचकर उत्पादक किसान सिहर उठते हैं। पिछले साल सीजन में ही आलू ने उत्पादकों की जेब गर्म कर दी थी। उसी नतीजा रहा जो इस बार रकबे में करीब 20 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हुई थी। लागत को लेकर किसानों के एक अनुमान पर गौर करें तो प्रति बीघा खेती पर बीज, सिंचाई और खाद से लेकर खुदाई तक करीब 10 हजार रुपया खर्च हो गया। उत्पादन तो पहले अच्छा रहा, लेकिन मार्केट में निरंतर गिरते गए रेट की वजह से उत्पादकों को प्रति बीघा 20 क्विंटल के आसपास ही उत्पादन मिला जो कुल मिलाकर सात हजार रुपये से अधिक नहीं बनता। आलू के व्यापार से जुड़े राजू चौधरी कहते हैं कि किसानों को तो नुकसान हुआ ही लेकिन घाटे में थोक का व्यापार करने वाले भी रहे हैं। शीतगृहों में उत्पादन का 90 फीसदी तक हिस्सा पहुंच चुका है। ऐसे में किसानों को ज्यादा फायदे की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। खेतों में जो आलू बचा है, वह हाइब्रिड प्रजाति में सफेद-3797 और गुलाल- 250 है। इधर, बेकदरी से आहत कुछ किसानों का तो आलू से मोहभंग होने लगा है। इसके पीछे उनका तर्क है कि कर्ज डूब जाने से अच्छा है कि कैश क्राप की ओर गौर किया जाए।
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आलू ने कर दिया है बेहाल
देवर मई गांव के थान सिंह आलू की खेती करके आहत नजर आए। बोले, आलू की फसल की लागत पूरी करने के लिए उन्होंने जेवरात भी गिरवीं रख दिए। अब तो सूद चुकाने लायक भी रुपये नहीं बचे हैं। पूरे साल की मेहनत पर पानी फिर गया है।
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खुशनसीब हूं जो आलू से बच गया
इलाके के गांव पीयरखंदना निवासी रायसिंह खुद को भाग्यशाली मानता है। बताया कि बच्चों ने जिद की थी कि आलू करेंगे लेकिन अचानक ही मन बदल गया। उस वक्त लागत के लिए ज्यादा पैसे भी उपलब्ध नहीं थे। आलू उत्पादकों को हाल देख परेशानी होती है।
अगले साल भी नहीं कर सकेंगे भरपाई
चंदौरा गांव के गंगा सिंह का कहना है कि आलू की खेती से उसे जो आर्थिक नुकसान हुआ है उसकी भरपाई के लिए एक-दो साल लग जाएगा। भरपाई भी तभी संभव है जब आगे चलकर आलू की फसल का रेट प्रति क्विंटल पांच-छह सौ रुपया मिले।
हिम्मत नहीं हारी है फिर करेंगे आलू
आलू की बेकदरी से परेशान किसानों में नरऊ गांव के महावीर सिंह ऐसे किसान हैं जो नुकसान के बाद भी हौसला बढ़ाए हुए हैं। बताया कि खेती में नफा-नुकसान तो चलता है, लेकिन यह तो नहीं कि खेती ही छोड़ दी जाए। अगले साल फिर आलू का उत्पादन करेंगे।