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ऑटो की क्रमांक व्यवस्था फेल, शहर में बेतरतीब दौड़ रहे ऑटो और ई-रिक्शा
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बदायूं। शहर में यातायात व्यवस्था सुधारने के लिए बनाई गई क्रमांक व्यवस्था कुछ समय लागू रहने के बाद अब फेल हो गई। यातायात व्यवस्था के लिए यह अच्छी योजना मानी गई थी। पिछले साल अभियान चलाकर करीब 150 ऑटो पर स्टिकर चस्पा कराए गए थे लेकिन इसके बाद योजना ही बंद कर दी गई जबकि इससे यात्रियों को तमाम फायदे थे। पुलिस कुछ ही समय में ऑटो और उसके ड्राइवर का पता लगा सकती थी। अब यही कारण है कि फिर से शहर की सड़कों पर बेहिसाब तरीके से ऑटो व ई-रिक्शा दौड़ रहे हैं और यातायात व्यवस्था को ध्वस्त कर रहे हैं।
यातायात पुलिस ने पिछले साल एक व्यवस्था की थी, जिसके तहत शहर के हर ऑटो को एक नंबर देना था। प्रत्येक ऑटो पर तीन-तीन स्टिकर चस्पा कराए जाने थे। इसमें एक स्टिकर ऑटो के अंदर, एक आगे और एक स्टिकर पीछे चिपकाया गया था। जिस नंबर का स्टिकर ऑटो पर चस्पा किया जा रहा था, उसके ड्राइवर का आधार कार्ड आदि लेकर एक रजिस्टर तैयार कराया जा रहा था। उसमें ड्राइवर के संबंध में पूरी जानकारी लिखी जा रही थी। यह अभियान जनवरी से शुरू होकर मार्च तक चला।
शहर के करीब 150 ऑटो पर स्टिकर चस्पा कराए गए थे जबकि शहर में छह सौ से ज्यादा ऑटो पर स्टिकर चस्पा कराए जाने थे। इसके बाद यह योजना बंद कर दी गई। 150 के बाद स्टिकर ही नहीं प्रिंट कराए गए। जिन ऑटो पर स्टिकर चस्पा भी किए गए, उनमें भी तमाम ऑटो से स्टिकर हट चुके हैं। इसके साथ ही यातायात पुलिस का रिकॉर्ड अधूरा रह गया। यही कारण है कि अब शहर की यातायात व्यवस्था भी ध्वस्त हो चुकी है।
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क्रमांक व्यवस्था से यह थे फायदे
ऑटो में क्रमांक व्यवस्था लागू होने के बाद रजिस्टर से तुरंत उस नंबर के ऑटो ड्राइवर का नाम पता चल जाता था। यात्रियों को यह फायदा था कि अगर उनकी कोई वस्तु ऑटो में छूट जाती है, तो उन्हें केवल ऑटो का क्रमांक याद रखना पड़ता था। ऑटो किसी को टक्कर मार दे या कोई और अनहोनी हो जाए तो उस क्रमांक से पुलिस चंद मिनटों में ऑटो ड्राइवर को खोज निकालती थी। शहर में जाम लगने की स्थिति भी नहीं बनती थी। यह व्यवस्था शहर के सभी मार्गों पर लागू होनी थी। उझानी से शहर आने वाले ऑटो पर यू-1 या यू-2 स्टिकर चस्पा होता। बिनावर वालों को बी-1 या बी-2 नंबर दिया गया, दातागंज वालों को डी-1 या डी-2 नंबर दिया गया था।
पैसे की तंगी में बंद कर दी गई योजना
यह योजना बंद होने की मुख्य वजह पैसे की तंगी को बताया जा रहा है। एक ऑटो पर तीन स्टिकर चस्पा होने थे। उसमें 30 रुपये से लेकर 50 रुपये तक खर्चा आ रहा था। यातायात पुलिस को कोई बजट भी नहीं मिलता। शुरुआती दौर में चंदा करके स्टिकर छपवाए गए। इससे करीब डेढ़ सौ ऑटो पर स्टिकर चस्पा हो सके।
शहर में लागू की गई क्रमांक व्यवस्था बहुत अच्छी थी। हमने ही इसकी शुरुआत कराई थी लेकिन इसमें ज्यादा खर्चा आ रहा था। इसके अलावा यातायात पुलिस में सीमित कर्मचारी हैं। बीच-बीच में पुलिस ज्यादा व्यस्त हो जाती है। इससे इस योजना में रुकावट आ गई। अब इसे दोबारा शुरू करने के बारे में विचार करते हैं। - अब्दुल सत्तार खां, प्रभारी यातायात
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यातायात पुलिस ने पिछले साल एक व्यवस्था की थी, जिसके तहत शहर के हर ऑटो को एक नंबर देना था। प्रत्येक ऑटो पर तीन-तीन स्टिकर चस्पा कराए जाने थे। इसमें एक स्टिकर ऑटो के अंदर, एक आगे और एक स्टिकर पीछे चिपकाया गया था। जिस नंबर का स्टिकर ऑटो पर चस्पा किया जा रहा था, उसके ड्राइवर का आधार कार्ड आदि लेकर एक रजिस्टर तैयार कराया जा रहा था। उसमें ड्राइवर के संबंध में पूरी जानकारी लिखी जा रही थी। यह अभियान जनवरी से शुरू होकर मार्च तक चला।
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शहर के करीब 150 ऑटो पर स्टिकर चस्पा कराए गए थे जबकि शहर में छह सौ से ज्यादा ऑटो पर स्टिकर चस्पा कराए जाने थे। इसके बाद यह योजना बंद कर दी गई। 150 के बाद स्टिकर ही नहीं प्रिंट कराए गए। जिन ऑटो पर स्टिकर चस्पा भी किए गए, उनमें भी तमाम ऑटो से स्टिकर हट चुके हैं। इसके साथ ही यातायात पुलिस का रिकॉर्ड अधूरा रह गया। यही कारण है कि अब शहर की यातायात व्यवस्था भी ध्वस्त हो चुकी है।
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क्रमांक व्यवस्था से यह थे फायदे
ऑटो में क्रमांक व्यवस्था लागू होने के बाद रजिस्टर से तुरंत उस नंबर के ऑटो ड्राइवर का नाम पता चल जाता था। यात्रियों को यह फायदा था कि अगर उनकी कोई वस्तु ऑटो में छूट जाती है, तो उन्हें केवल ऑटो का क्रमांक याद रखना पड़ता था। ऑटो किसी को टक्कर मार दे या कोई और अनहोनी हो जाए तो उस क्रमांक से पुलिस चंद मिनटों में ऑटो ड्राइवर को खोज निकालती थी। शहर में जाम लगने की स्थिति भी नहीं बनती थी। यह व्यवस्था शहर के सभी मार्गों पर लागू होनी थी। उझानी से शहर आने वाले ऑटो पर यू-1 या यू-2 स्टिकर चस्पा होता। बिनावर वालों को बी-1 या बी-2 नंबर दिया गया, दातागंज वालों को डी-1 या डी-2 नंबर दिया गया था।
पैसे की तंगी में बंद कर दी गई योजना
यह योजना बंद होने की मुख्य वजह पैसे की तंगी को बताया जा रहा है। एक ऑटो पर तीन स्टिकर चस्पा होने थे। उसमें 30 रुपये से लेकर 50 रुपये तक खर्चा आ रहा था। यातायात पुलिस को कोई बजट भी नहीं मिलता। शुरुआती दौर में चंदा करके स्टिकर छपवाए गए। इससे करीब डेढ़ सौ ऑटो पर स्टिकर चस्पा हो सके।
शहर में लागू की गई क्रमांक व्यवस्था बहुत अच्छी थी। हमने ही इसकी शुरुआत कराई थी लेकिन इसमें ज्यादा खर्चा आ रहा था। इसके अलावा यातायात पुलिस में सीमित कर्मचारी हैं। बीच-बीच में पुलिस ज्यादा व्यस्त हो जाती है। इससे इस योजना में रुकावट आ गई। अब इसे दोबारा शुरू करने के बारे में विचार करते हैं। - अब्दुल सत्तार खां, प्रभारी यातायात