ज्ञानपुर। वेदामृतम ग्रंथमाला के माध्यम से वेदों के दुरूह ज्ञान को सरल बनाकर आम जन तक पहुंचाने के लिए डॉ. कपिलदेव द्विवेदी को 1991 में पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया। डाॅ. द्विवेदी का 28 अगस्त, 2011 को देहावसान हो गया। पद्मश्री सम्मान प्राप्त करने वाले वे भदोही जिले की एकमात्र शख्सियत हैं। बृहस्पतिवार को उनकी पुण्यतिथि मनाई जाएगी।
उनके पुत्र डॉ. भारतेंदु द्विवेदी ने बताया कि डॉ. कपिल देव द्विवेदी ने 35 वर्ष की अवस्था से ही लेखन कार्य शुरू कर दिया था। देहावसान के एक साल पहले तक वे लेखन कार्य करते रहे। 80 से अधिक रचनाओं से उन्होंने संस्कृत साहित्य को समृद्ध किया। 1991 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकटरमण रमन ने पद्मश्री से सम्मानित किया। वहीं 2012 में मरणोपरांत उन्हें राष्ट्रपति सम्मान-2010 से तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने सम्मानित किया। इसके अलावा इन्हें दिल्ली संस्कृत अकादमी की ओर से वाल्मीकि सम्मान, पं. राज जगन्नाथ पुरस्कार, उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान एवं हिंदी संस्थान की ओर से विशिष्ट पुरस्कार, बीरबल साहनी पुरस्कार, केएन भाल पुरस्कार, हजारी प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार आदि सम्मान मिले। उन्होंने अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, जर्मनी, हॉलैंड, फ्रांस, इटली, स्विट्जरलैंड, सूरीनाम, गुयान, मॉरीशस, केन्या, तंजानिया और सिंगापुर जैसे देशों में संस्कृत की पताका फहराई। उन्हें संस्कृत भाषा के सरलीकरण के लिए जाना जाता है। उनकी पुण्यतिथि पर 28 अगस्त को विश्व भारती अनुसंधान परिषद की ओर से शांति निकेतन में शाम चार बजे यज्ञ का आयोजन किया जाएगा।