ज्ञानपुर। सरकार की मंशा को जिले के पशुपालन विभाग के अधिकारी, कर्मचारी पतीला लगाने में जुटे हैं। मवेशियों के लिए संवेदनशील महीने में पशु डॉक्टर समय पर अस्पताल नहीं पहुंच रहे हैं। गोपीगंज में सुबह 11 बजे तक पशु अस्पताल पर ताला लटकता मिला, जबकि चौरी के दरुनहां में चपरासी के भरोसे अस्पताल संचालित होता दिखा। औराई में पशुपालकों को बाहर की दवा लिखी जा रही है। भिदिउरा पशु सेवा केंद्र पर बीते छह महीने से ताला लटक रहा है। अधिसंख्य अस्पतालों में अव्यवस्था होने के कारण पशुपालकों की मुश्किलें बढ़ गईं हैं। पशु अस्पतालों की पोल शनिवार को पड़ताल में खुल गई। अलग-अलग पशु अस्पतालों पर भ्रमण के दौरान व्यवस्था भौंचक करने वाली थी। गोपीगंज पशु सेवा केंद्र पर 11 बजे ताला लटका मिला। 10 मिनट तक इंतजार के बाद आसपास के लोगों से बातचीत की गई तो पता चला यही हाल रोज का रहता है। ओपीडी का समय सुबह 8 से 2:30 बजे तक है। औराई चौराहे से चंद कदमों की दूरी पर मिर्जापुर मार्ग के किनारे राजकीय पशु चिकित्सालय है। यहां पशुपालकों को बाहर की दवाएं लिखी जाती हैं। परिसर में चारों ओर जंगली घास का अंबार है। ऐसा लगता है कि कभी साफ-सफाई हुई ही नहीं। यहां डॉ. शिव कुमार शुक्ला ने बताया कि परिसर में आवास नहीं है, किराए के मकान में रहते हैं। जंगीगंज में एक पशु चिकित्साधिकारी के सहारे डीघ ब्लॉक के दो पशु अस्पताल संचालित होते हैं। भदोही और सुरियावां में कर्मचारी और चिकित्सक मवेशियों का उपचार करते नजर आए। जिले में 11 पशु अस्पताल और नौ उप केंद्र हैं। प्रत्येक अस्पताल में एक डॉक्टर, एक फार्मासिस्ट, एक वार्ड बॉय, एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की जरूरत है। सभी स्थानों पर कुल 44 चिकित्सक, कर्मचारियों में से कुछ केंद्रों पर कर्मचारियों की कमी हैं। जिले में गोवंश और महिषवंश की संख्या विभाग के आंकड़ों के अनुसार 2.20 लाख है। इसके अलावा तीन स्थायी और 28 अस्थायी गोशालाएं हैं, जहां करीब सात हजार गोवंश संरक्षित हैं। पशुपालकों को बेहतर उपचार मिले, इसके लिए पशु अस्पताल पर पशु डॉक्टर और उपकेंद्र पर पशुधन प्रसार अधिकारी की तैनाती की गई है। इसके बाद भी उपचार के लिए पशुपालकों को भटकना पड़ता है। पशु चिकित्सालय दरुनहां का अजीब हाल है। यहां पशु चिकित्सक के दर्शन के लिए पशुपालक तरस गए हैं। चपरासी के भरोसे अस्पताल संचालित होता है, जो प्रतिदिन अस्पताल खोलता है। पशुपालक रमेश यादव, महेश सरोज का आरोप है कि यहां दवा भी नहीं मिलती। पशुपालकों को किसी तरह का लाभ नहीं मिल रहा है। बारिश के मौसम में खुरपका, मुंहपका जैसी गंभीर बीमारी पशुओं में फैलती है। बलिया में लंपी बीमारी फैलने से पशुपालक परेशान हैं। ऐसे में पशु अस्पतालों का समय से न खुलना तमाम सवाल पैदा कर रहा है। कोई अस्पताल खुलता है तो वहां डॉक्टर गायब रहते हैं। यदि किसी मवेशी में लंपी का लक्षण दिखता है तो वह किससे बताकर दवा लेंगे। केंद्र पर डॉक्टर ही नहीं मिलते हैं।