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उधार के भवन में चल रहे 650 आंगनबाड़ी केंद्र
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जनपद सृजन के ढाई दशक बाद भी जिले के 60 फीसदी से अधिक आंगनबाड़ी केंद्रों को अपना खुद का भवन नसीब नहीं हो सका है। यही नहीं, 650 आंगनबाड़ी केंद्र उधारी के भवनों में संचालित हो रहे हैं। स्कूल, पंचायत भवन एवं किराये के मकानों में केंद्रों का संचालन कर बच्चों को शिक्षा दी जा रही है।
शिशु एवं मातृ मृत्यु दर रोकने के लिए सरकार की ओर से तमाम योजनाएं चलाई जा रही हैं। अति कुपोषित व कुपोषित बच्चों और धात्रियों को पोषणयुक्त सामग्री देने के लिए बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की ओर से हर गांव में आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। केंद्रों पर पोषाहार, दवाएं देने के साथ ही खेल-खेल में बच्चों को पढ़ाया भी जाता है। करीब एक से डेढ़ दशक पूर्व से चल रहे आंगनबाड़ी केंद्रो पर सुविधाओं के नाम पर हर साल लाखों रुपये खर्च होते हैं, इनमें से अधिकांश पर मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। विभागीय आंकड़ों पर पर नजर डालें तो 1496 आंगनबाड़ी केंद्रों में तीन हजार आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं तैनात हैं। इस बीच कई साल बीत जाने के बाद भी इन केंद्रों को अपना भवन नसीब नहीं हो सका है। जिले में े747 आंगनबाड़ी केंद्र प्राथमिक विद्यालयों के भवनों और 174 पंचायत भवन में चल रहे हैं। इसके अलावा 450 आंगनबाड़ी केंद्र खुद के भवन में और 150 किराए के कमरे में संचालित हो रहे है। समुचित देखरेख नहीं होने से एक से डेढ़ दशक पूर्व बने आंगनबाड़ी केंद्रों के भवन जर्जर हो चुके हैं। कई भवन तो बैठने लायक तक नहीं हैं।
जिले में आंगनबाड़ी केंद्रों की बदहाली का आलम यह है कि शून्य से पांच वर्ष तक के बच्चों को हवा पानी तक के लिए तरसना पड़ता है। जिले के 1496 आंगनबाड़ी केंद्रों में से 439 में पेयजल की व्यवस्था नहीं है और 628 में शौचालय की सुविधा तक नहीं है। इसी तरह से 859 आंगनबाड़ी केंद्रों में बिजली का कनेक्शन तक नहीं है। इससे इस प्रचंड गर्मी में बच्चों को परेशान होना पड़ता है। प्रभारी डीपीओ मंजू वर्मा का कहना है कि हर साल नए भवन सीमित संख्या में बन रहे हैं। इससे व्यवस्था बेहतर हो रही है। सभी सीडीपीओ से बिजली, पानी और शौचालय विहीन केंद्रों की सूची मांगी गई है। जल्द ही समस्याएं दूर कर ली जाएंगी।
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शिशु एवं मातृ मृत्यु दर रोकने के लिए सरकार की ओर से तमाम योजनाएं चलाई जा रही हैं। अति कुपोषित व कुपोषित बच्चों और धात्रियों को पोषणयुक्त सामग्री देने के लिए बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की ओर से हर गांव में आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। केंद्रों पर पोषाहार, दवाएं देने के साथ ही खेल-खेल में बच्चों को पढ़ाया भी जाता है। करीब एक से डेढ़ दशक पूर्व से चल रहे आंगनबाड़ी केंद्रो पर सुविधाओं के नाम पर हर साल लाखों रुपये खर्च होते हैं, इनमें से अधिकांश पर मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। विभागीय आंकड़ों पर पर नजर डालें तो 1496 आंगनबाड़ी केंद्रों में तीन हजार आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं तैनात हैं। इस बीच कई साल बीत जाने के बाद भी इन केंद्रों को अपना भवन नसीब नहीं हो सका है। जिले में े747 आंगनबाड़ी केंद्र प्राथमिक विद्यालयों के भवनों और 174 पंचायत भवन में चल रहे हैं। इसके अलावा 450 आंगनबाड़ी केंद्र खुद के भवन में और 150 किराए के कमरे में संचालित हो रहे है। समुचित देखरेख नहीं होने से एक से डेढ़ दशक पूर्व बने आंगनबाड़ी केंद्रों के भवन जर्जर हो चुके हैं। कई भवन तो बैठने लायक तक नहीं हैं।
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जिले में आंगनबाड़ी केंद्रों की बदहाली का आलम यह है कि शून्य से पांच वर्ष तक के बच्चों को हवा पानी तक के लिए तरसना पड़ता है। जिले के 1496 आंगनबाड़ी केंद्रों में से 439 में पेयजल की व्यवस्था नहीं है और 628 में शौचालय की सुविधा तक नहीं है। इसी तरह से 859 आंगनबाड़ी केंद्रों में बिजली का कनेक्शन तक नहीं है। इससे इस प्रचंड गर्मी में बच्चों को परेशान होना पड़ता है। प्रभारी डीपीओ मंजू वर्मा का कहना है कि हर साल नए भवन सीमित संख्या में बन रहे हैं। इससे व्यवस्था बेहतर हो रही है। सभी सीडीपीओ से बिजली, पानी और शौचालय विहीन केंद्रों की सूची मांगी गई है। जल्द ही समस्याएं दूर कर ली जाएंगी।
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